दरभंगा : मिथिला में शास्त्रार्थ की पूर्व से जारी परंपरा विलुप्त होने के कगार पर : कुलपति

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दरभंगा 22 जनवरी, बिहार के कामेश्वर सिंह, दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सर्व नारायण झा ने आज कहा कि मिथिला में शास्त्रार्थ की परपंरा पूर्व से रही है और मण्डन मिश्र एवं उनकी विदूषी पत्नी भारती के साथ शंकराचार्य के बीच हुए शास्त्रार्थ की चर्चा आज भी लोग करते हैं, लेकिन अब यह परपंपरा कैसे और किन कारणों से विलुप्त हो रही है इस पर मंथन जरूरी है। श्री झा ने यहां विश्वविद्यालय के 58 वे स्थापना दिवस के अवसर पर दानवीर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की स्मृति में आयोजित पांच दिवसीय शास्त्रार्थ सभा की अध्यक्षता करते हुए कहा कि हमारी विद्वत परम्परा का बहुत ही सुदीर्घ इतिहास है। उन्होंने कहा कि मण्डन मिश्र एवं उनकी विदूषी पत्नी भारती के साथ शंकराचार्य के बीच हुए शास्त्रार्थ की चर्चा हमलोग आज भी करते हैं और उसी विद्वत परम्परा को हम फिर से शुरू करना चाहते हैं। वैसे भी विद्या के सम्बर्धन में शास्त्रार्थ की महत्ता अनुपम है। इससे पूर्व कुलपति प्रो0 झा, विशिष्ठ अतिथि प्रति कुलपति डॉ चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह, जिलाधिकारी डॉ चन्द्रशेखर प्रसाद सिंह, डॉ विश्वनाथ झा, डॉ उपेंद्र झा ने संयुक्त रूप से यहां के बहुउद्देशीय भवन में शास्त्रार्थ सभा का उद्घाटन किया। शास्त्रार्थ को आज के सन्दर्भ में रेखांकित करते हुए प्रो0 झा ने संस्कृत के विकास एवं उसकी संरक्षा के अलावा नए-नए छात्रों का संस्कृत से जुड़ाव का बढ़िया साधन बताया। उन्होंने कहा कि पहले शास्त्रार्थ के माध्यम से ही पक्षीय एवं विपक्षियों द्वारा नए-नए अनुसंधान हुआ करता था जो आजकल शोध के माध्यम से प्रकाशित हो रहे हैं। गौरतलब है कि कुलपति प्रो0 झा को शास्त्रार्थ करने का लंबा अनुभव है और कुलपति बनने से पूर्व प्रधानाचार्य के रूप में वह अगरतल्ला, दिल्ली, इलाहाबाद समेत कई स्थानों पर शास्त्रार्थ सभा की समीक्षा की है। यही कारण रहा है कि कुलपति का पदभार ग्रहण करने के बाद से ही विश्वविद्यालय में संस्कृत का माहौल सुदृढ़ हो इसके लिये वह सतत प्रयास कर रहे हैं। 
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