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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

जो करना है, आज और अभी करें !


इंतजार न करें रिटायरमेंट का !!


भविष्य की कल्पनाओं का ताना-बाना बुनने में हमसे आगे कोई नहीं है। हम सभी उसी मिट्टी के बने हैं जिसमें ही वह तासीर है कि भविष्य की लकीरों को खींचते हुए हम वर्तमान को अच्छे से गुजारने का गुर सीख गए हैं वहीं भावी सुकूनों के स्वप्न देखना भी बहुत सुखद होता है। इससे हम वर्तमान में कर्म करने के बोझ से अपना बचाव भी कर लिया करते हैं और सब कुछ भविष्य पर टाल देकर कुछ हल्कापन भी महसूस कर लेते हैं। बात उन लोगों की है जो किसी सरकारी, अद्र्ध सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों और काम-धंधों में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकांश लोगों ने अपने जीवन को एक निश्चित समयावधि की फ्रेम में फिट कर लिया होता है जहाँ से इंच भर भी बाहर सरकना या हिलना-डुलना इन्हें अच्छा नहीं लगता है। ये लोग इसी फ्रेम के चारोें ओर चक्कर काटते रहते हैं। थके हारे होने पर कभी कोनों पर दुबक कर बैठ जाते हैं तो कभी थोड़ी-बहुत परायी ताकत आ जाने पर चतुर्दिक दौड़ लगाते रहते हैं। इन नौकरीपेशा और नौकरशाह लोगों में से अधिकांश के मन में कई सारे ऎसे काम होते हैं जो वे करना तो चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने रोजमर्रा के रूटीन कामों और बंधे-बंधाये ढर्रे से मुक्ति चाहिए होती है। इसीलिये वे रोजाना खूब सोचते-विचारते हैं, इष्ट मित्रों और घरवालों से चर्चा भी करते हैं और अन्ततः बात वहीं आकर अटक जाती है कि रिटायरमेंट के बाद देखेंगे, तब ये ही तो काम करेंगे, जो आज सोच रहे हैं।

जो लोग अपने जीवन के स्वप्नों और कल्पनाओं को रिटायरमेंट के बाद पूरा करने की सोचते हैं, उनमें से दो तिहाई लोग ऎसा नहीं कर पाते। रिटायरमेंट की अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते इनकी सोच और कल्पनाओं का दायरा तो विराट हो जाता है किन्तु कर्म करने की क्षमताएं धारण करने वाला शरीर क्षीण होने लगता है। और कई बार परिस्थितियां भी प्रतिकूल होने लगती हैं। तब शरीर और मन-मस्तिष्क में अजीब सा असंतुलन पैदा हो जाता है। ऎसे में रिटायरमेंट के बाद भी ये लोग कुछ खास नहीं कर पाते हैं और अन्ततः अधूरी आशाओं और आकांक्षाओं के साथ वहीं पहुंच जाते हैं जहाँ से आये होते हैं। जो लोग जीवन में सद्कर्म या किसी महान उद्देश्य को पाना चाहते हैं और इसके लिए रिटायरमेंट की प्रतीक्षा करते हैं, उनमें से दो-चार फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो शेष सभी लोग रिटायरमेंट के बाद कुछ नहीं कर पाते हैं। हमारे अपने क्षेत्र में या आस-पास ऎसे बहुतेरे रिटायर्ड महानुभाव हैं जिन्होंने अपनी नौकरीपेशा जिन्दगी में रिटायरमेंट के बाद की नई जिन्दगी जीने के कई सपने बुने थे लेकिन उनमें से एक भी कार्य अब नहीं कर पा रहे हैं और सिवाय डेरों पर भीड़ की तरह जमा होने और पुराने जमाने में पनघट पर पानी भरने आयी महिलाओं की घर-गृहस्थी की चर्चाओं की तरह पारस्परिक समूह बनाकर संवाद करते रहने और टाईमपास जिन्दगी जीने के सिवा उनमें कुछ करने का जज्बा ही शेष नहीं रह गया है। वरना इन लोगों के पास ज्ञान और अनुभवों की कोई कमी थोड़े ही है। लेकिन बुजुर्गियत की अवस्था ही कुछ ऎसी होती है कि कुछ नया कर पाने का साहस रिटायरमेंट होते ही कुछ दिन में पलायन कर जाता है और पूरा जीवन यथास्थितिवादी और आरामतलब हो जाता है जहां आगे कुछ भी करने की सारी इच्छाएं यौवन पर आते-आते ही मर जाया करती हैंं।

रिटायरमेंट से पहले और बाद की स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है। जो स्वप्न रिटायर होने से पहले आदमी बुनता है, रिटायर हो जाने के बाद वे तकरीबन सारे नेपथ्य में चले जाते हैं। शरीर की स्थिति कमजोरी के साथ ही कई बीमारियों का घर हो जाती है, थकान ज्यादा सताने लगती है। कई बार रिटायर आदमी भला-चंगा भी हो तो घर वाले उसे इतना परेशान कर देते हैं कि बेचारा कुछ भी नहीं कर पाता, और जैसे-तैसे जिन्दगी की गाड़ी आगे बढ़ते रहने का इंतजार करता रहता है। कइयों के साथ उनके जीवन संगी-संगिनी ऎसे होते हैं जो चाहते हुए भी आगे नहीं बढ़ने देते और भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद कितने सारे गृह कलहों या घरेलू कामों में फाँद देते हैं। रिटायरमेंट के बाद कुछ कर लेने का स्वप्न देखने वालों में से कई तो रिटायर होने से पहले या कुछ माहों बाद ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं, कई दूसरी नौकरियों या धंधों को अपनी प्राथमिकता बना कर फिर उन्हीं कामों में लग जाते हैं जो बरसों से करते आ रहे थे।

बहुत सारे लोग रिटायरमेंट को मृत्यु के परिक्रमा स्थल मेंं प्रवेश मानकर आत्महीनता के दौर में जीने को नियति मान लेते हैं। बहुत थोड़े लोग ही ऎसे होते हैं जो पूरे जीवट के साथ सामाजिक सेवा के उन कार्यों में भागीदार हो जाते हैं जिनके लिए वे रिटायर होते समय अपना मानस बना चुके होते हैं। जो भी लोग कहीं रमे हुए हैं उन्हें चाहिए कि समाज की सेवा या रचनात्मक कर्म में जुटने का काम करने के लिए रिटायर होने का  इंतजार न करें बल्कि किसी भी तरह समय निकाल कर धीरे-धीरे अपनी समाजोन्मुखी एवं लोकचेतना गतिविधियों का सूत्रपात करना आरंभ कर दें ताकि रिटायर होने के बाद वे स्वच्छन्द और मुक्त होकर इन्हें और अधिक व्यापकता के साथ संचालित कर सकें। जो लोग इंतजार करते रहते हैं उन्हें यह भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि एक तरफ जहां वे रिटायरमेंट के बाद नया काम शुरू करने के लिए नये आकाश का निर्माण करते हैं और इसके लिए रिटायर होने की प्रतीक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर मौत भी मुक्त होकर कभी भी हमला कर सकती है या शरीर, मन-बुद्धि आदि कोई भी जवाब दे सकता है।  ऎसे में कल के कामों को आज ही शुरू करने की आदत डालें और अच्छे कामों के लिए रिटायरमेंट की प्रतीक्षा न करें।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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