बिहार : जनांदोलन 2018 की तैयारी जोरशोर से2 अक्टूबर से परवल से दिल्ली कूच - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

बिहार : जनांदोलन 2018 की तैयारी जोरशोर से2 अक्टूबर से परवल से दिल्ली कूच

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पटना। जन संगठन एकता परिषद व समान विचारधारा वाला जन संगठन राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति समेत अन्य मांगों को लेकर सत्याग्रह पदयात्रा करने का निश्चय किया है। यूपीए सरकार के दौरान ग्वालियर से दिल्ली तक  जनादेश 2007 और ग्वालियर से आगरा तक जन सत्याग्रह  2012 में सत्याग्रह पदयात्रा की गयी। अब एनडीए सरकार के दौरान हरियाणा के परवल से दिल्ली तक जनांदोलन 2018 की तैयारी जोरों पर है। बता दे कि जल, जंगल और जमीन पर अधिकार की मांग को लेकर गांधी जयंती के दिन ग्वालियर से शुरू हुई जन सत्याग्रह पदयात्रा को बीच रास्ते में ही मंजिल मिल गई। 40 हजार से अधिक भूमिहीनों का नेतृत्व कर रहे राजगोपाल पीवी ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से प्रस्तुत समझौते को स्वीकार करते हुए उस पर हस्ताक्षर कर दिए। केंद्र सरकार ने सत्याग्रहियों की सभी दस मांगें मान ली हैं। राजगोपाल ने पदयात्रा स्थगित करने की घोषणा कर दी। वहीं करार पर अमल न हुआ तो आगरा से ही दिल्ली कूच होगा। जो हरियाणा से दिल्ली कूच होगा। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर आगरा के सीओडी मैदान में 26 प्रांतों के भूमिहीनों के सामने केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और कांग्रेस सांसद राज बब्बर ने सभी मांगें मानने की घोषणा की। इनमें हर भूमिहीन को घर और खेती की जमीन के अधिकार की बात शामिल है। दस्तखत होते ही वातावरण में 'जय जगत' के नारे गूंजने शुरू हो गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तक्षेप के बाद वार्ता सफल हुई।

लगभग 12.15 बजे जयराम रमेश मसौदा लेकर आगरा पहुंचे। उसके बाद गांधीवादी नेता व एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल पीवी ने समझौते के सभी दस बिंदुओं की जानकारी मंच से दी। सत्याग्रहियों ने समझौते को स्वीकार करके 'हां' की आवाज बुलंद की, तब राजगोपाल व जयराम रमेश ने मसौदे पर हस्ताक्षर किए। राजगोपाल ने कहा कि झंडा लहराकर जीत का जश्न मना लें, क्योंकि यह आसानी से नहीं मिली। आंदोलन की सफलता के पीछे गरीबों के भूखे रहने, नंगे पैर चलने, खुले आसमान के नीचे सोने की शक्ति है। यह कमजोरी नहीं, बल्कि वह ताकत है, जो देश की तस्वीर बदलेगी। जयराम रमेश ने कहा कि आज ऐतिहासिक दिन है। हम ग्वालियर में ही समझौता करना चाहते थे, लेकिन कुछ कारणों से नहीं हो सका। यह हस्ताक्षर तो छोटा सा मुकाम है। अब आगे बहुत काम करना है। समझौते के तहत जो कार्य दल बनाया गया है, उसकी पहली बैठक 17 अक्टूबर को होगी, जिसमें रोडमैप तैयार होगा। अब आगे आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। जयराम यह कहने से नहीं चूके कि राजगोपाल ने सिर्फ केंद्र सरकार को निशाना बनाया, जबकि संविधान के अनुसार भूमि सुधार का जिम्मा राज्य सरकारों का है। राजगोपाल राज्यों पर भी दबाव बनाएं। समझौते के वक्त मंच पर प्रख्यात गांधीवादी एन सुब्बाराव, जलपुरुष राजेंद्र सिंह, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश, बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, पूर्व सांसद संतोष भारती, समाजसेवी डॉ. देव हरडे, ज्योति बहन और बाल विजय भी मौजूद थे।

आगरा समझौते के मुख्य बिंदु:-
-राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का छह माह में मसौदा तैयार होगा।
-भूमि सुधार संबंधी कार्यदल का केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता में गठन। 
-कृषि एवं आवासीय भूमि के वैधानिक अधिकार : हर भूमिहीन को कृषि और रहने के लिए भूमि की गारंटी होगी।
-वास भूमि : इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत रहने के लिए लगभग 4350 वर्ग फुट जमीन।
-गरीबों, सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए भूमि उपलब्धता और भूमि अधिकारों में बढ़ोतरी।
-भूमि के मामलों में न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन।
-पंचायत अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन।
-वन अधिकार अधिनियम 2006 का प्रभावी कार्यान्वयन।
-वन तथा राजस्व सीमा विवाद : वन एवं राजस्व विभागों के संयुक्त दल का गठन।
-सामुदायिक संसाधनों का सर्वेक्षण एवं नियंत्रण

सफर सत्याग्रह का
-वर्ष 2006 : 500 सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।
-वर्ष 2007 : 25 हजार सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।
-वर्ष 2010 : 12500 सत्याग्रहियों का संसद के बाहर तीन दिन धरना।
-वर्ष 2011 : देश में 80 हजार किमी यात्रा कर जागरूकता अभियान।
-वर्ष 2012 : चालीस हजार सत्याग्रहियों के साथ ग्वालियर से दिल्ली कूच। आगरा में समझौता।

भूमिहीनों के बाद राज्यों को मनाने की बारी
केंद्र सरकार समझौता कर भूमिहीन आदिवासियों को मनाने में भले ही सफल हो गई हो, लेकिन अब उसकी राह और कठिन हो गई है। राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति तैयार करने पर सहमति तो बन गई है, लेकिन जमीन संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए राज्यों को ही आगे आना होगा। समझौता-पत्र में दर्ज मांगों में ज्यादातर का ताल्लुक राज्यों से है, जिन्हें पूरा कर पाना अकेले केंद्र के बस की बात नहीं है। जो काम केंद्र सरकार अब तक नहीं कर पाई, उसे अगले छह महीने में पूरा करना होगा। आगरा के समझौता-पत्र में सभी 10 मांगों को पूरा करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निश्चित किया गया है। इसी निर्धारित समय में केंद्र सरकार राज्यों को मनाएगी भी। गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें भला केंद्र की मंशा कैसे पूरा होने देंगी? इससे आने वाले दिनों में राजनीतिक रार के बढ़ने के आसार हैं। हालांकि भाजपा शासित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक दिन पहले ही भूमिहीन आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की मांगों को पूरा करने के लिए तमाम वायदे कर चुके हैं। समझौते के मुताबिक अधिकतर मांगों पर राज्यों को ही काम करना है। एकता परिषद के नेता पीवी राजगोपाल का स्पष्ट कहना है कि केंद्र सरकार इन मांगों के लिए राज्यों पर दबाव बनाए। इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री और उनके आला अफसरों के साथ विचार-विमर्श करे।

मौजूदा नियम व कानूनों को धता बताकर बड़ी संख्या में आदिवासियों की जमीनों पर गैर आदिवासियों के कब्जे को हटाकर उन्हें उनका हक दिलाना एक बड़ी समस्या है। अनुसूचित जातियों और आदिवासियों को आवंटित जमीनों का हस्तांतरण करना भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मसला है। उद्योगों को लीज अथवा अन्य विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत जमीनों का बड़ा हिस्सा सालों-साल से उपयोग नहीं हो रहा है। खाली पड़ी इन जमीनों को दोबारा भूमिहीनों में वितरित करना होगा और आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की परती और असिंचित भूमि को मनरेगा के माध्यम के उपजाऊ बनाने पर जोर देना होगा। केंद्र की एडवाइसरी को राज्य सरकार नहीं पालन किया। 2014 में सरकार भी बदल गयी. यूपीए को सफाया कर केंद्र में एनडीए की सरकार है। अब गेंद एनडीए सरकार के पाले में है। जन संगठन एकता परिषद व समान विचारधारा वालों की मांग मान ले अथवा जनांदोलन की शक्ति झेलने को तैयार रहे.

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