मेरी कविताएँ अनरिपोर्टेड दुनिया की चिट्ठियाँ हैं - विनोद विट्ठल - Live Aaryaavart

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रविवार, 16 सितंबर 2018

मेरी कविताएँ अनरिपोर्टेड दुनिया की चिट्ठियाँ हैं - विनोद विट्ठल

बनास जन का शिमला में लोकार्पण
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शिमला। "बावजूद इस तथ्य के कि बहुत सारी कविताएँ लिखी जा रही हैं, इस समय कविताएँ लिख पाना मुश्किल है। एक ही समय में बहुत सारे समय ओवरलैप कर रहे हैं। पशु-पक्षियों, पुरातत्व की चीज़ों और भाषाओं को लेकर जहाँ चिन्ताएँ दिख रही हैं वहीं दूसरी ओर मनुष्य सबसे नाज़ुक दौर में है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स और डेटा ने मनुष्य को न केवल विस्थापित किया है बल्कि पहले के किसी भी दौर की तुलना में अधिक अकेला, डरा हुआ और असहाय भी बनाया है। सीधे कहूँ तो मनुष्य को हैक किया जा चुका है.” उक्त विचार देश के जाने-माने युवा कवि और पत्रकार विनोद विट्ठल ने बनास जन द्वारा प्रकाशित विशेष कविता अंक  “पृथ्वी पर दिखी पाती” के विमोचन कार्यक्रम एवं एकल काव्यपाठ में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच, शिमला द्वारा किया गया था। अपने वक्तव्य में विनोद विट्ठल ने कहा कि सभ्यता का विकास मनुष्य ने जिस सह-अस्तित्व, सहयोग और सहजीवन के मूल्यों के साथ किया था उन्हें भूमंडलीकरण पर सवार होकर आती इम्पीरीयलिस्टिक तकनीकी ताक़तों ने ख़तरे में डाल दिया है और इतना शोर कर रही हैं कि अधिकांश इस ख़तरे को महसूस ही नहीं कर पा रहे हैं। बाबाओं का बाज़ार है, धार्मिक उन्माद है, जातियाँ हैं, मॉब लिंचिंग है, खाप पंचायतें हैं, फ़्री डाटा है, वट्सएप्प-फ़ेसबुक हैं, टीवी के रीऐलिटी शो हैं, ख़बरिया चैनल हैं, हर-एक के अपने चैनल हैं, ख़ूब सारा प्रसारण-प्रकाशन है लेकिन सबसे ज़्यादा अनरिपोर्टेड समय है।

विनोद विट्ठल ने अपनी कविताओं की भूमिका बाँधते हुए कहा कि भूख से ज़्यादा लोग, ज़्यादा खाने से मर रहे हैं। युद्ध और महामारियों का काम अब दुनिया की बीस-तीस बड़ी कम्पनियाँ रही हैं जो अपने मुखौटे में सबसे ज़्यादा मानवीय और पीपल-सेंट्रिक लगती हैं। ग्लोबल होते समय में लोकल की हैसियत और राष्ट्रवाद की प्रासंगिकता में तरंगों पर चलते बाज़ार पर विवेक का बटन म्यूट पर कर दिया गया है। अब न आँख देखती है न मुँह बोलता है। कान वही सुनते हैं जो बाज़ार चाहता है। मन के अंधेरे में रोती हुई आत्मा की सुबकियों के बीच कृत्रिम रोशनी में चल रहे आईपीएल या ऐसे ही किसी कार्निवल के टिकट ऑनलाइन बिक रहे हैं, लोग पैकिज टूर पर घूम रहे हैं, गैजेट्स इस्तेमाल कर रहे हैं, डीपी बदल रहे हैं। सब कुछ डिज़ाइनर है और बिकाऊ भी। बस आपके खाते में पैसा हो।  काव्यपाठ करते हुए विनोद विट्ठल ने कहा की पत्रकारिता ने मेरी समझ को ज़्यादा धार दी है । छिनते हुए रोज़गार, ज़हर में बदलते खाद्य पदार्थ, हाँफती और लाचार अर्थव्यवस्थाएँ, ढहते हुए देश, ख़त्म होती खेती, छीजते हुए प्राकृतिक संसाधन, प्रदूषित कचरे और प्रतिबंधित दवाओं को ग़रीब मुल्कों के पेट में डालने का लगातार चल रहा गोरखधंधा, वायरस-एंटी वायरस और सैटेलाइट बनाने के उद्योग, दवाओं की खपत के लिए आविष्कृत बीमारियों और रोज़ बदलती तकनीक की भीषणता से कराहता मानव मस्तिष्क जैसी कितनी ही चीज़ें हैं जो अनरिपोर्टेड हैं। मेरी कविताएँ अनरिपोर्टेड दुनिया की चिट्ठियाँ हैं। इन चिट्ठियों को सम्भालिए।

इस अवसर पर विनोद विट्ठल ने अपनी कविता अड़तालीस साल का आदमी, टी-शर्ट, लेटर बॉक्स, जवाब, पृथ्वी पर दिखी पाती, अच्छे दोस्त और रफ़ कापी का पाठ किया ।कार्यक्रम में चर्चा करते हुए हिंदी के ख्यतिनाम कवि आत्मा रंजन ने विनोद विट्ठल की कविताओं को इस समय लिखी जा रही विश्व की श्रेष्ठतम कविताओं में शामिल करते हुए कहा की ये कविताएँ हमारे जटिल वर्तमान को पूरी बेबाक़ी और गहनता के साथ व्यक्त करती हैं। विनोद स्मृति , सूचना , ज्ञान और विवेक के मिश्रणवाली ऐसी कविताएँ रचते हैं जो बहुत काम दिखती हैं। इसीलिए जहाँ भाषा के स्तर पर इनका मुहावरा अलग है वहीं विषय और बिम्ब भी पूरी तरह से नए हैं । विनोद की कविताओं के लिए हिंदी कविता आलोचना के पास अभी तक प्रतिमान ही नहीं है । ये एक नई समीक्षा-दृष्टि की माँग करती हैं। कवि गुप्तेश्वरनाथ उपाध्याय ने विनोद को आत्मीय जरूरतों का कवि बताते हुए कहा कि अपनी संस्कृति और सभ्यता से जुडी उनकी कविताएं असल में परम्परा का वृहद् आख्यान प्रस्तुत करती हैं। 

आयोजन में हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच, शिमला के अध्यक्ष और विख्यात कथाकार एस आर हरनोट ने कहा कि विनोद विट्ठल पत्रकार की आत्मा में एक ऐसे कवि हैं जो अपनी पत्रकारीय समझ का इस्तेमाल साहित्य में बख़ूबी करते हैं और समृद्ध करते हैं। बनास जन ने पृथ्वी पर दिखी पाती को प्रकाशित कर एक बार फिर पुस्तिकाओं की तरफ़ हिंदी को लौट चलने का आह्वान किया है । ये पुस्तिका हिंदी के परम्परागत प्रकाशन प्रतिष्ठान को चुनौती देती नज़र आती है । आयोजन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक और कवि श्रीनिवास श्रीकांत ने कहा कि लघु पत्रिकाओं द्वारा समय समय पर जड़ताभंजक हस्तक्षेप किये गए हैं।  बनास जन ने विनोद विट्ठल की कविताओं पर अंक निकालकर फिर इसी तरह का काम किया है जो साहित्य के क्षेत्र में देर तक याद किया जाता रहेगा।  आयोजन में बडी संख्या मे लेखकों और संस्कृति कर्मियों यथा कुल राजीव पंत, विद्या निधि, सतीश सोनकर, अश्वनी गर्ग, राकेश कुमार सिंह, दिनेश शर्मा, सुनीला शर्मा, देव कन्या ठाकुर, भारती कुठियाला, आंनद प्रकाश शर्मा, अंजली दीवान, शांति स्वरूप शर्मा, मोनिका छट्टू, अश्वनी कुमार, यादव चंद, निर्मल शर्मा, दीपक भारद्वाज, वंदना राणा आदि शामिल रहे। मंच संचालन युवा कवि कौशल मुंगटा ने किया। इसके साथ ही लगाईं गई लघु पत्रिका प्रदर्शनी का लाभसाहित्य प्रेमियों और पाठकों ने लिया। 
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