बिहार : आवासीय भूमिहीनों का घर का अधिकार मिले तो कानून बनाना जरूरी: प्रियदर्शी - Live Aaryaavart

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शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

बिहार : आवासीय भूमिहीनों का घर का अधिकार मिले तो कानून बनाना जरूरी: प्रियदर्शी

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पटना,16 फरवरी। कई जन संगठनों के द्वारा 18 फरवरी को 11 बजे से गांधी मैदान,पटना में भूमि अधिकार जन जुटान रैली आयोजित किया गया है। इसको लेकर शनिवार को पटना में प्रेस वार्ता की गयी।  मौके पर मौजूद वक्ताओं ने कहा कि मजदूरों-कारीगरों के श्रम से भवन-अपार्टमेंट बनते हैं पर उन्हें ही रहने को घर नहीं है। एक अनुमान के अनुसार बिहार में 35 लाख परिवारों के पास आवासभूमि नहीं है। आवास की वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना गांव और शहरों में सड़क के किनारे ,तटबंध और सरकारी जमीन पर बनी गरीबों की झोपड़ी उजाड़ देना लोकतंत्र और मानवता का क्रूर मजाक है। भूमि अधिकार जन जुटान के संयोजक प्रदीप प्रियदर्शी ने कहा कि18 फरवरी को भारी संख्या में आवासीय भूमिहीन लोग शामिल होने आ रहे हैं। इस जन जुटान की पहली मांग है कि बिहार सरकार गांव और शहर के प्रत्येक आवासहीन परिवार के लिए ऐसा कानून बनाए जिससे सभी जरूरतमंद घराड़ी की जमीन का हकदार बन सके।

उन्होंने कहा कि  नदियों के कटाव से विस्थापन के कारण आवासीय भूमिहीन परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद 2 लाख 36 हजार 632 बर्बाद घरों के बदले सरकार ने लगभग 60 हजार घरों के निर्माण के बाद अपने हाथ खींच लिए। नदियों के कटाव से विस्थापित परिवारों को एक समय सीमा के अन्तर्गत वासभूमि एवं घर देकर पुनर्वासित कराना हमारी मांगों में शामिल है। रूपेश ने कहा कि पिछले 30-40 वर्षों से हजारों भूमिहीन भू-हदबंदी अधिनियम के तहत फाजिल घोषित भूमि का पर्चा लेकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं। वर्ष 2011 के सामाजिक-आर्थिक-जातीय जनगणना के अनुसार बिहार अनुसूचित जाति के 81 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं। भूमि सुधार कानून और उसके उद्देश्य को परास्त करने में भूधारी,नेता,वकील और अफसर जी जान से जुटे हुए हैं। भू-हदबंदी के 260 मुकदमे पटना उच्च न्यायालय में लम्बित हैं। जिलों की राजस्व अदालतों में सैकड़ों सिलिंग केस पड़े हुए हैं। बिहार भूमि सुधार कोर कमिटी के सुझाव पर सरकार ने बिहार भूमि सुधार ( अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम 1961 की उप धारा 45 बी को समाप्त कर दिया पर दो साल चार महीने बीत जाने के बाद भी मुक्त हुए मुकदमे से जुड़ी भूमि वितरण नहीं हुआ। बिहार में वनाधिकार कानून भी लागू हो रहा है। वनभूमि के पट्टे के लिए वर्षों से सैकड़ों आवेदन धूल फांक रहे हैं। पिछले दिनों पटना हाईकोर्ट के आदेश से वनभूमि के दावेदारों को राहत मिली है। अब उनके आवेदन का आखिरी तौर पर निष्पादन होने तक उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता। भूमि सुधार और वनाधिकार कानून को लागू कराना हमारी प्रमुख मांग है।

किसान अपने खून-पसीने से अन्न पैदा करते हैं। पर किसान को न तो फसल पर का वाजिब दाम मिलता है और ना ही बटाईदार किसानों की समस्या का स्थायी हल तो खेती को लाभकारी बनाना है। गन्ना किसानों की हालत और भी खराब है। नापी, पूर्जी वितरण,गन्ने की खरीद में उसके प्रकार को लेकर बखेड़ा, घटतौली और गन्ने के मूल्य का समय पर भुगतान नहीं होने से गन्ना किसान परेशान हैं।  18 फरवरी के जन जुटान की तीसरी मांग स्वामीनाथन आयोग की खेती-किसानी के विकास से संबंधित सिफारिशें अविलम्ब लागू कराते हुए खेती को लाभकारी बनाने और गन्ना किसानों को चीनी मिलों की मनमानी से मुक्त कराने की है। हम सभी जानते हैं कि एक पिछड़े, गरीब और असंगठित समाज में कमजोर वर्गों के पक्ष में बने कानून यूं ही लागू नहीं हो जाते। संघर्ष और संवाद के रास्ते पर ही चल कर मेहनतकश मजदूर,कारीगर,किसाने,बेघर-विस्थापित और बटाईदार किसान अपना हक हासिल किये हैं और करेंगे। हमने इन्हीं सवालों को लेकर 18 फरवरी 2019 को पटना के गांधी मैदान में भूमि अधिकार जन जुटान का फैसला लिया है। इस जन जुटान में कुछ साथी पश्चिमी चम्पारण के भितिहरवा आश्रम और पटना के मसौढ़ी से पदयात्रा और बांका से साइकिल चलाकर शामिल होंगे।  हमारा यह संघर्ष लोकतंत्र को मात्र वोट का उत्सव या एक हद तक चुनावी खेल से आगे ले जाते हुए भारतीय संविधान में दर्ज गरिमा के साथ जीने के अधिकार और बिना किसी भेदभाव (लिंग,जाति या सम्प्रदाय) के जीने के नैसर्गिक अधिकार को जमीन पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है। जन संगठन एकता परिषद, जन मुक्ति वाहिनी (जसवा), दलित अधिकार मंच, लोक समिति, लोक मंच, असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन, लोक परिषद, शहरी गरीब विकास संगठन,मुसहर विकास मंच,भूमि सत्याग्रह अभियान, कोशी नवनिर्माण मंच, लोक संघर्ष समिति, महिला कृषक मंच, महिला अधिकार मोर्चा, भूमि अधिकार मोर्चा, मजदूर किसान समिति, आदिवासी मजदूर किसान संघर्ष  वाहिनी, महिला किसान मंच, शहरी गरीब मोर्चा, दलित मुक्ति मिशन।

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