बिहार : नागरिकों के अधिकार देने के पीछे कारक - Live Aaryaavart

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बुधवार, 20 मार्च 2019

बिहार : नागरिकों के अधिकार देने के पीछे कारक

  • प्रोजेक्ट ग्रोथ को प्रभावित करते हैं कारक

चुनावी समय तक ही ‘प्रजा‘ राजा बनकर रहते हैं। उसके बाद ‘रंक‘ हो जाते हैं। जो चुनावी समय तक ‘रंक‘ रहते हैं। चुनाव के बाद ‘राजा‘ बन जाते हैं। कल का राजा तो आज के ‘रंक‘ के पास 5 साल साल गिड़गिते रहते हैं। इसी तरह से लोग प्रोजेक्ट के प्रति सोच बना लेते हैं। कुछ साल का ही मेहमान प्रोजेक्ट वाले होत है। ये भी राजनीतिकज्ञों द्वारा करेंगे। आएंगे और चले जाएंगे। फिर मुलाकात ही नहीं। इसके बाद प्रोजेक्ट का ग्रोथ प्रभावित हो जाता है।
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पटना,20 मार्च। राजनीतिक कारक से बेहाल हैं आम आदमी। हम लोग 72 साल से आजाद हैं। हमलोगों का देश कल्याणकारी राज्य है। हमलोग प्रजातंत्रिक देष में रहते हैं। हमलोग मतदान करके सरकार को निर्वाचित करते हैं। हमलोगों की बहुमूल्य मत हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों के प्रत्याशी आते हैं और आश्वासन देते हैं। उस समय सर्वाग्रीण विकास करने का वादा करते हैं। अधिकाधिक हरियाली सब्जबाग दिखाते हैं। वोट लेकर चले जाते हैं और आश्वासन को पूरा नहीं करते हैं। चुनावी समय तक ही ‘प्रजा‘ राजा बनकर रहते हैं। उसके बाद ‘रंक‘ हो जाते हैं। जो चुनावी समय तक ‘रंक‘ रहते हैं। चुनाव के बाद ‘राजा‘ बन जाते हैं। कल का राजा तो आज के ‘रंक‘ के पास 5 साल साल गिड़गिते रहते हैं। इसी तरह से लोग प्रोजेक्ट के प्रति सोच बना लेते हैं। कुछ साल का ही मेहमान प्रोजेक्ट वाले होत है। ये भी राजनीतिकज्ञों द्वारा करेंगे। आएंगे और चले जाएंगे। फिर मुलाकात ही नहीं।ं इसके बाद प्रोजेक्ट का ग्रोथ प्रभावित हो जाता है। 

ग्रामीण कारक
सभी लोग जानते हैं कि गांव में अधिक जमीन रखने वाले ही ग्रामीण लोगों पर दबदबा जमा कर रखते हैं। इनके साथ यहां पर महाजन, चिकित्सक, नेता, पुजारी, पुलिस आदि का बोलबाला रहता है। इनके अधीन ही लोग रहते हैं। इनके ही नीति ग्रामीण क्षेत्र में संचालित होता है। इनके नीति नहीं मानने वाले महाजन सबक सीखाते लगते हैं। बीमार पड़ने पर रोगी के चेहरे देखकर चिकित्सक झोली भरने लगता है। लोगों का नेता बनकर सब के साथ मिलकर कार्य करता है। उनलोगों को खुश रखने का प्रयास करते रहते हैं। भगवान का प्रकोप बतलाकर पुजारी लोगों को कमजोर बना देता है। इनके विरूद्ध चलने और बोलने वालों को ठीक करने का दायित्व पुलिस पर रहता है। इन ग्रामीण कारकों से प्रोजेक्ट ग्रोथ प्रभावित होता है।

जाति व्यवस्था कारक 
देश में जाति व्यवस्था बरकरार है। आज भी समाज के हाशिए पर हैं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोग। कुछ लोगों का विकास हुआ है। आज भी अधिकांष लोग गरीबी के दलदल में फंसे हैं। यह सच है कि मानव विकास करने वाले लोग समाज के किनारे रहने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के विकास करने को लेकर चिंतित रहते हैं। देश-विदेश के डोनर लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल्य क्षेत्र में ही कार्य करने की योजना बनाते हैं। प्रोजेक्ट बनाकर गरीबी के दलदल में फंसे लोगों एवं गांव में योजना भेजते हैं। बहुसंख्यक नहीं चाहते हैं कि अनुसूचित में दर्ज लोगों का विकास और कल्याण न हो। ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि प्रोजेक्ट के कार्य में सहयोग न करें। ऐसे लोग अनुसूचित वालों पर ताना भी मारते हैं। सरकार ने नहीं कर सकी तो प्रोजेक्ट वाले क्या करेंगे? यह भी बड़ा कारक है।  

शिक्षा का अभाव कारक
शिक्षा का अभाव के कारण आज भी ग्रामीण अंचल में अज्ञानता और अंधविश्वास बोलबाला है। यहां के लोग संक्रामक बीमारी को देवी प्रकोप मान लेते है। वहीं इसके कारण अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इसके कारण गरीबों के बीच जनसंख्या अधिक हैं। जो आर्थिक समस्या दूर करने में लग जाते हैं। अपना  आर्थिक स्थिति सुधारने में दूसरों पर निर्भर रहते हैं। इसके कारण ‘बचपन‘ से ही बच्चे आर्थिक स्थिति सुधारने में लग जाते हैं। उसी राह पर युवा भी लग जाते हैं। नौकरी की तलाष में पलायन कर जाते हैं। इन कारणों पढ़ाई बाधित हो जाती है। अशिक्षा और जागरूकता के अभाव के कारण ही प्रोजेक्ट के ग्रोथ करने में सहायक नहीं हो पाते हैं।वहीं इन परिस्थितियों से बाहर नहीं निकालना चाहते हैं। केवल आर्थिक स्थिति सुधारने में लगे रहते हैं। आर्थिक परिस्थितियों को सुधार करने का उपाय समझने का प्रयास नहीं करते हैं। कारण कि इनके पास समय का अभाव है। आवासीय भूमि नहीं है। खेती करने वाली जमीन नहीं है। इसके कारण भी लोग उदासीन है। यहां पर आजीविका संबंधित कार्य करने में असफल हो जाते हैं। आर्थिक स्थिति सुधारने में मौसम के अधीन रहते हैं। खेती समय खेत में लगे रहते हैं। इसके पलायन करके अन्यंत्र चले जाते हैं। जो ग्रोथ करने में प्रभावित कारक है। 

सरकारी कार्यक्रमों में दलाली कारक
सरकार की ओर से संचालित कार्यक्रमों से लाभ नहीं उठा पाते हैं। जन्म से लेकर मरण तक योजना है। मगर कागजी जटिलता व अधिक समय बर्बाद होने के कारण सरकारी कार्यक्रमों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं। सरकारी विकास के कार्य में दलालों का राज है। इंदिरा आवास योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंषन, परिवार लाभ योजना, मनरेगा आदि मेें दलालों का प्रवेश है। विकास कार्य में दलालों के द्वारा सेंधमारी कर दी जाती है। इस बीच अधूरा कार्य को संपादित करवाने का दायित्व प्रोजेक्ट के कार्यकर्ता को देते हैं। जो काफी जटिल होता है। और तो और समय भी खत्म रहता है। सीमित दायरे में कार्यकर्ता करता है। अंजाम नहीं दे सकने के कारण प्रोजेक्ट का कार्य प्रभावित हो जाता है। 

दफ्तरों के पदाधिकारी का सहयोग नहीं
अभी यह हाल है कि जल्दी-जल्दी दफ्तरों में पदाधिकारियों का स्थानान्तरण हो जाता है। एक पदाधिकारी दो जगहों पर प्रतिनियुक्त रहते हैं। जो कार्य निष्पादन करने में समय नहीं दे पाते हैं। इस कारक से कार्यालय में जल्दी से काम नहीं होता है। डिजिटल इंडिया के नाम पर कार्यालय में कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है। जानकारी लेने पर कहा जाता है कि यहां पर कर्मचारी का अभाव है। इसके कारण मजबूर हैं।कार्य में विलम्ब होने से लोगों में प्रोजेक्ट के प्रति अंसतोष हो जाता है। इससे भी प्रोजेक्ट के ग्रोथ प्रभावित होता है। 

नागरिकों के अधिकार देने के पीछे कारक
महात्मा गांधी नरेगा के अंदर काम मांगने के 15 दिनों के बाद काम मिलता है। सूचना का अधिकार के तहत सूचना मांगने पर 30 दिनों के अंदर सूचना दिन जाती है। अन्तर विभागीय सूचना होने पर 45 दिनों के बाद सूचना दी जाती है। बिहार लोक सेवाओं का अधिकार के तहत 30 दिनों के बाद कार्य किया जाता है। बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार कानून के तहत 60 दिनों के अंदर कार्य किया जाता है। आजकल साकारात्मक कार्य परिणाम नहीं दिया जाता है। दाखिल खारिज नहीं हो पा रहा है। इस तरह से कार्य प्रभावित हो रहा है।

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