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शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2019

बिहार : अब राजधानी पटना में रहने वालों को डेंगू से डर सताने लगा

dengue-patna
पटना (आर्यावर्त संवाददाता)  राजधानी पटना में रहने वालों को डेंगू से डर सताने लगा है। डेंगू के विरूद्ध खबर लिखने वाले बीरेंद्र बरियातु व डेंगू पीड़ितों के बीच कार्य करने वाली ए.एन. एम. दीदी मेरीकुट्टी जौर्ज भी डेंगू की चपेट में आ गयी है। कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल में 500 रू.में टेस्ट की गयी है। इस बीच पानी पथ पर चलने वाले जननायक पप्पू यादव ने घोषणा की है कि डेंगू पीड़ितों की नि:शुल्क जांच करवाने की व्यवस्था करेंगे।पी.एम.सी.एच. के डेंगू वार्ड में पप्‍पू यादव मरीजों से मिले और स्थिति का जायजा लिया, जहां जलजलाव के बाद डेंगू के मरीजों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। पी.एम. सी.एच.में 77 लोगों को जांचोपरांत पता चला कि इसमें 76 लोग पटना के ही हैं। इस फीगर से डरना स्वाभाविक है।इस समय पटना में 738 मरीज हैं। बिहार में कुल 1086 आक्रांत हैं। स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय सिंह ने जानकारी दी है कि 22 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डेंगू की जांच की व्यवस्था की गयी है। 10 से 12 अक्टूबर तक पी.एम.सी. एच.और एन.एम.सी.एच.में शिविर लगाया जा रहा है। बिहार के लोगों पर भारी बारिश और जलभराव के बाद अब एक और मुसीबत टूट बड़ी है। बारिश से जमा हुआ पानी जाते-जाते पटना में लोगों को बीमार कर रहा है। कई दिनों तक ठहरे पानी में डेंगू और चिकनगुनिया के मच्छर पैदा हो रहे हैं, जिसका सीधा असर पटना के हॉस्पिटल में दिखाई दे रहा है। अब तक यहां सैकड़ों लोग डेंगू और तेज बुखार की शिकायतें लेकर आ चुके हैं. इसी को लेकर पटना साहिब से सांसद और केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने हॉस्पिटल पहुंचकर हालात का जायजा लिया। जल भराव के बाद पैदा होने वाली बीमारियों से निपटने के लिए सरकार पूरी तैयारियों का दावा कर चुकी है। लेकिन मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब तक पटना में करीब 738 से ज्यादा लोग डेंगू का शिकार हो चुके हैं।वहीं कई लोग चिकनगुनिया को लेकर भी हॉस्पिटल में भर्ती हैं। 


गंदे पानी से पनप रही बीमारियां
बिहार में बाढ़ के बाद हालात काफी खराब होते जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि डेंगू का प्रकोप बढ़ गया है। पटना के राजेंद्र नगर, गोला रोड, पाटलिपुत्र जैसी पॉश कालोनियों में बारिश के कई दिनों बाद भी गंदा और बदबूदार पानी भरा हुआ था। अब भी कुछ इलाकों में जलभराव है. पानी में कई चीजें सड़ चुकी हैं। इसीलिए ये बीमारियों का एक अड्डा बन चुका है। हालांकि पटना के ज्यादातर इलाकों से पानी निकल चुका है।


प्रशासन के फूले हाथ-पैर
पटना में लगातार बढ़ती बीमारियों के बाद अब एक बार फिर नीतीश सरकार के हाथ-पैर फूलने लगे हैं। बाढ़ को लेकर राज्य सरकार की काफी किरकिरी हुई। आरोप लगाया गया कि सरकार ने पानी निकालने के लिए कोई भी जरूरी कदम नहीं उठाए।अब बाढ़ के बाद एक बार फिर हालात बिगड़ते दिख रहे हैं। ऐसे में प्रशासन ने हर गली-मोहल्ले में फॉगिंग शुरू कर दी है।साथ ही पानी में भी दवाएं डाली जा रही हैं। अस्पतालों को भी अलर्ट पर रखा गया है।

प्लेटलेट काउंट कम होने पर आपको कब और कितना डरना चाहिए?
प्लेटलेट काउंट गिरने और इसी से जुड़े प्लेटलेट ट्रांस्फ्यूजन को लेकर आम लोगों में ही नहीं, कई डॉक्टरों में भी तरह-तरह की गफलत पाई जाती हैं। जब से डेंगू और डेंगू जैसे अन्य वायरल बुखार की बीमारियां कुछ ज्यादा होनी शुरू हुई हैं, तब से आम लोगों के बीच प्लेटलेट का नाम कुछ ज्यादा ही जाना-पहचाना हो गया है। अब लगभग हर शख्स जानता है कि इन जैसी कई बीमारियों में यदि मरीज के खून में प्लेटलेट्स की मात्रा कम हो जाए तो उसके शरीर में कहीं से भी ब्लीडिंग होने की आशंका पैदा हो जाती है। डर लगता है कि अगर खून में प्लेटलेट्स बहुत ही कम हो गईं तो पेट, आंत, नाक या दिमाग के अंदर भी रक्तस्राव अर्थात ब्लीडिंग हो सकती है और यह ब्लीडिंग जानलेवा तक हो सकती है। ऐसे में मरीज के साथ आये लोगों को आमतौर पर अचानक ही अस्पताल द्वारा यह कहा जाता है कि चूंकि आपके मरीज की प्लेटलेट्स बहुत कम हो गई हैं, उसे प्लेटलेट्स देने पड़ेंगे तो आप तुरंत ही ट्रांसफ्यूजन के लिए प्लेटलेट्स की व्यवस्था करें वरना मरीज की जान को जोखिम हो सकता है। इन बातों के चलते धीरे-धीरे प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन को लेकर लोगों के बीच एक हौवा-सा बन गया है। इसे लेकर बड़े-बड़े भ्रम हैं. और ये भ्रम न केवल सामान्य जन के बीच हैं, बल्कि ज्यादातर डाक्टरों के बीच भी खूब देखे जा सकते हैं। मरीज को कब प्लेटलेट्स दी जानी चाहिए, कब नहीं और कब बहुत कम होने पर भी प्लेटलेट्स देना मरीज को नुकसान पहुंचा सकता है, ये बातें अक्सर डॉक्टरों को भी पता नहीं रहतीं. इसीलिये इस विषय में थोड़ी बुनियादी जानकारी आपको देता हूं ताकि इस हौवे से कम से कम आप तो निजात पा ही लें।

खून में प्लेटलेट्स के कम होने का मतलब यह है कि या तो शरीर में ये कम बन रही हैं या फिर ठीक मात्रा में बनने के बावजूद शायद किसी कारण से नष्ट होती जा रही हैं। सामान्यतौर पर तो ये डेंगू या ऐसे ही किसी इन्फेक्शन से नष्ट होती हैं, लेकिन कभी-कभी यह अपने आप में एक बुनियादी बीमारी भी हो सकती है।ऐसे में प्लेटलेट्स बनती तो पर्याप्त मात्रा में हैं, लेकिन बिना किसी अन्य कारण के, यूं ही हमारा शरीर इन्हें साथ-साथ लगातार नष्ट भी करता जाता है। इस बीमारी (इडियोपैथिक थोम्बोसाइटोपीनिया) में प्लेटलेट्स कम होने के बावजूद प्लेटलेट्स देना कोई इलाज नहीं होता। हां, कैंसर की कीमोथेरेपी देते हुए भी कई बार दवाई के दुष्प्रभाव से प्लेटलेट्स कम होने लगती हैं।यह एक मुश्किल स्थिति है। अब कीमोथेरेपी देना भी जरूरी है, और कहीं इस कीमोथेरेपी से उत्पन्न प्लेटलेट्स की कमी के कारण शरीर में कहीं कोई खतरनाक ब्लीडिंग न हो जाए इसके लिए प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देना भी उतना ही जरूरी हो जाता है। डेंगू और इसी तरह की अन्य वायरल बीमारियों में तो प्लेटलेट्स खतरनाक हद तक कम हो ही सकती हैं। इस स्थिति में भी मरीज को प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देने की आवश्यकता बन जाती है। डॉक्टर के तौर पर आपको बता सकता हूं कि एक बार मरीज के शरीर में प्लेटलेट्स कम होनी शुरू हो जायें तो मरीज और मरीज के रिश्तेदारों की पूछताछ और चिंताओं के रहते कई बार डॉक्टर के अवचेतन मन पर भी इसका एक निरंतर दबाव बना रहता है कि न हो तो भी एकाध प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देने में बुराई ही क्या है। यह अवैज्ञानिक तरीका है पर कई बार होशियार डॉक्टर भी ऐसे दबाव में आकर वहां भी प्लेटलेट्स दे डालते हैं जहां विज्ञान के अनुसार नहीं देना चाहिए थीं। खासकर तब, जब गूगल से प्राप्त अधूरे से ज्ञान में लिथड़ा मरीज का कोई रिश्तेदार आकर यह बोलता है कि हमारे मरीज के प्लेटलेट्स तो रोज-रोज कम होते जा रहे हैं, फिर आपने अभी तक इसे प्लेटलेट्स क्यों नहीं दीं?

ऐसे ज्ञानी समझने को तैयार ही नहीं होते, डॉक्टर को धमकी-सी देते हैं कि प्लेटलेट देने के बहुत स्पष्ट संकेत होने के बावजूद आप जो इसे प्लेटलेट्स नहीं दे रहे हैं, यह ठीक बात नहीं हैं. वो नहीं मानता कि यूं ही थोड़ी बहुत प्लेटलेट्स के कम होने से ही किसी को प्लेटलेट्स नहीं दे दी जातीं. देनी भी नहीं चाहिए. पर होते-होते, इस सब के चलते, मेडिकल प्रेक्टिस में अंधेर यह हुआ है कि मरीज की प्लेटलेट्स थोड़ी-सी भी कम हुई हों तो भी कई बार डॉक्टर स्वयं ही प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की कह देते हैं। यूं तकनीकी तौर इसकी कतई आवश्यकता नहीं थी पर ये डॉक्टर भी वही अवैज्ञानिक बात कहने लगते हैं कि साहब हम यहां प्रेक्टिस में बैठे हैं, कल के दिन मरीज को कहीं कोई ब्लीडिंग वगैरह हो ही गई तो फिर हमारी बात कोई नहीं सुनने वाला कि हमने वैज्ञानिक कारण से ही प्लेटलेट्स नहीं दी थीं।

वैसे चिकित्सा विज्ञान में प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन के इंडिकेशन एकदम साफ दर्ज हैं और इस तरह से हैं :
1. यदि प्लेटलेट काउंट 10,000 से नीचे आया हो तब, और 5000 के बाद तो पक्का ही, जरूर दें।
2. यदि प्लेटलेट काउंट पहले की तुलना में 50% से कम हो गया है तो सतर्कभर रहें।अब यदि काउंट और भी नीचे जाता है तो हमें प्लेटलेट्स देने पड़ सकती हैं। ऐसे में हमें लगातार स्थिति पर नजर रखनी होगी। अगर आगे फिर से और भी पचास पर्सेंट काउंट कम हो जाए या साथ में कहीं से भी ब्लीडिंग होने लगे तो प्लेटलेट्स जरूर देनी होंगी।
3.यदि प्लेटलेट काउंट एक लाख से कम हों परंतु मरीज की न्यूरो सर्जरी या आंखों की सर्जरी करनी पड़ रही है तो काउंट इतना कम न होने पर भी हमें प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देना ही होगा।
4.किसी भी अन्य सर्जरी में भी यदि प्लेटलेट काउंट 50,000 से कम हैं तो भी प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की व्यवस्था करनी होगी।
5. प्लेटलेट्स अगर नॉर्मल से कम हैं , फिर वे चाहे बहुत कम न भी हों परंतु यदि मरीज को कहीं से भी कोई ब्लीडिंग हो रही है तब भी प्लेटलेट्स देनी होंगी।

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