बिहार : कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन गहरी क्षति : माले - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 12 जनवरी 2021

बिहार : कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन गहरी क्षति : माले

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पटना. मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव व पोलित ब्यूरो के सदस्य पूर्व विधायक गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन हो गया है.सोमवार की देर रात बिहार की राजधानी पटना के रूबेन अस्पताल में अंतिम सांस ली.वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वे बिहार के नवादा जिले के रजौली के रहने वाले थे.वे 97 वर्ष के थे.बिहार में पहली पंक्ति के वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और सीपीआईएम के पूर्व राज्य सचिव कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है. पार्टी के राज्य सचिव कॉमरेड कुणाल ने कहा कि यह पूरे वाम आंदोलन के लिए एक अपूरणीय क्षति है. अपने बयान में भाकपा-माले के नेताओं ने कहा कि कुछ दिन पहले वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी अस्वस्थ चल रहे थे, तब महासचिव कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य, राज्य सचिव कॉमरेड कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य कॉमरेड राजाराम सिंह और राज्य कमिटी के सदस्य उमेश सिंह रुबन हॉस्पिटल पहुँचे और उनका हाल चाल लिया. 97 वर्ष की आयु और बीमारी की अवस्था में भी गणेश दा तमाम राजनीतिक घटनाओं के प्रति पूरी तरह चौकन्ना और एक सच्चे कम्युनिस्ट की मिसाल पेश कर रहे थे.राजनीतिक तौर पर पूरी तरह सक्रिय थे. उनसे चल रहे विधानसभा चुनाव पर लंबी बातचीत हुई. उनकी चाहत थी कि वाम आंदोलन बिहार को एक नई दिशा दे. वे वाम एकता के भी प्रबल समर्थक थे.स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भागीदारी के बाद उन्होंने बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई. वे नवादा जिले से कई बार विधायक बने और एमएलसी के रूप में भी बिहार विधानमंडल में दलितों-गरीबों की आवाज सशक्त करते रहे. उन्होंने कई महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों का नेतृत्व किया. गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म रजौली में एक बड़े जमींदार परिवार में वर्ष 1924 को हुआ था. उनका परिवार इलाके में काफी प्रतिष्ठित था। बताया जाता है कि गणेश शंकर विद्यार्थी वर्ष 1952 से ही राजनीतिक में आए थे. उनका पूरा परिवार कांग्रेसी था.परिवार में वह इकलौता ऐसे शख्‍स थे जो कम्युनिस्ट पार्टी के साथ खड़े होकर अंतिम सांस तक चलते रहे. उन्होंने 12 दफा चुनाव लड़ा, जिसमें दो बार ही उन्हें जीत मिली थी. नवादा विधानसभा क्षेत्र से 1977 और 1980 में उन्हें जीत मिली थी. बताया जाता है कि गणेश शंकर विद्यार्थी अल्प आयु से ही लोगों के लिए काम करना चाहते थे. 12 वर्ष की उम्र में ही अंग्रेजी हुकूमत के समय अंग्रेजी हुकूमत के इमारत पर नवादा में तिरंगा फहराने वाले वामपंथी थे. गणेश शंकर विद्यार्थी 97 वर्ष की उम्र में भी लोगों के लिए सेवा भावना से काम करने को तत्पर रहते थे. कोई भी व्यक्ति उनके दरवाजे पर अगर पहुंचता था तो वे मना नहीं करते थे.लाठी के सहारे पर चलते हुए वह किसी बाबू के ऑफिस में पहुंच जाते थे और उनके साथ गए लोग बाबू के ऑफिस में उनका आदर और सम्मान देखकर गदगद हो जाते थे.काम हो या ना हो, लेकिन उनको जो सम्मान पूरे बिहार में मिलता था, इससे सभी लोग संतुष्ट रहते थे.

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