ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त प्रसाद किस्पोट्टा की 60वीं पुण्यतिथि - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त प्रसाद किस्पोट्टा की 60वीं पुण्यतिथि

  • अन्ततः संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ, राँची की स्थापना औपचारिक रूप से राँची में 26 जुलाई 1897 को तत्कालीन कलकत्ता महाधर्मप्रान्त के महाधर्माध्यक्ष पौल गोथल्स, ये.स. के द्वारा समय की माँग के अनुसार की गई जिसकी नींव माता मेरी बेर्नादेत्त ने डाली जो धर्मसंघ की संस्थापिका है..

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रांची. संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ राँची की संस्थापिका ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त प्रसाद किस्पोट्टा की 60वीं पुण्यतिथि, 16 अप्रैल को संत मरिया महागिरजाघर राँची में मनायी गई. रोमन कैथोलिक चर्च ने अपने इतिहास में पहली बार छोटनागपुर की एक आदिवासी महिला, संत अन्ना धर्म समाज की संस्थापिका माता मेरी बेर्नादेत्त प्रसाद किस्पोट्टा को संत बनाने की प्रक्रिया शुरू की है़. कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो ने संत मरिया महागिरजाघर में इसकी घोषणा की थी. उन्हें संत घोषणा के लिए संत अन्ना धर्म समाज के निवेदन पर कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो ने झारखंड व अंडमान के 11 बिशपों से परामर्श के बाद वेटिकन से इसकी अनुशंसा की थी.चर्च से एनओसी मिलने के साथ ही माता बेर्नादेत्त को सर्वेंट ऑफ गॉड (ईश सेविका) का दरजा मिल गया. छोटानागपुर के किसी अन्य आदिवासी स्त्री या पुरुष को यह दरजा नहीं मिला है़ कार्डिनल ने बताया कि एक ट्रिब्यूनल का गठन किया है.जो माता बेर्नादेत्त के पवित्र जीवन से जुड़े दस्तावेज व साक्ष्य जुटायेगा तथा वेटिकन को अवगत करायेगा. ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त की धन्यता की पोस्टूलेटर डॉ. सिस्टर मरियम अनुपा कुजूर डी.एस.ए. ने बतलाया कि 16 जून 2016 को महामहिम कार्डिनल अंजेलो अमातो एस.डी.बी, रोम में परमधर्मपीठीय संत प्रकरण परिषद के अध्यक्ष ने माता मेरी बेर्नादेत किस्पोट्टा को "निहिल ओबस्तात" (कोई बाधा नहीं) प्रदान कर, उन्हें संत घोषणा के रास्ते पर आगे बढ़ाया, तत्श्चात् 7 अगस्त 2016 को राँची के महामहिम कार्डिनल तेलेस्फोर पी. टोप्पो डी.डी. ने संत मरिया महागिरजाघर में उन्हें ईश सेविका घोषित किया. स्थानीय कलीसिया के शीर्ष प्रतिनिधि होने के हैसियत से महामहिम तेलेस्फोर पी. कार्डिनल टोप्पो डी.डी. ने मान्यवर सहायक धर्माध्यक्ष थेओदोर मस्करेनहास एस.एफ.एक्स को माता मेरी बेर्नादेत की धन्यता की प्रक्रिया में धर्माध्यक्षीय प्रतिनिधि नियुक्त किया.इस प्रक्रिया को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय कलीसिया के अधिकारियों द्वारा न्यायाधिकरण समिति एवं इतिहास समिति का गठन किया गया. कार्डिनल तेलेस्फोर पी. टोप्पो की सेवानिवृति के बाद अब राँची के नये महाधर्माध्यक्ष फेलिक्स टोप्पो ये.स.,स्थानीय कलीसिया के शीर्ष अधिकारी के रूप में समिति में शामिल हुए हैं.इस प्रकार कलीसिया के विभिन्न अधिकारियों के मार्गदर्शन में यह प्रक्रिया निरंतर आगे बढ़ रही है. वेटिकन द्वारा इसे स्वीकार करने पर माता बेर्नादेत्त को वेरेनेबल (श्रद्धेय) का दरजा मिलेगा. इसके बाद वेटिकन द्वारा उनके नाम पर एक चमत्कार होने की पुष्टि पर उन्हें 'धन्य' और इसके बाद एक अन्य चमत्कार की पुष्टि होने पर 'संत' का दरजा दिया जायेगा.


माता मेरी बेर्नादेत्त किसपोट्टा की जीवनी

माता मेरी बेर्नादेत्त किसपोट्टा का जन्म पिता पूरन प्रसाद किस्पोट्टा और माता पौलिना के लूथरन परिवार में 2 जून 1878 ई. को मांडर प्रखण्ड के सरगाँव में हुआ था.लूथरन कलीसिया में उसे बपतिस्मा में ख्रीस्त आनन्दित रूथ नाम दिया गया था.उसने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लूथरन मिशन, राँची के बेथेसदा विद्यालय से प्राप्त की. बाद की पढ़ाई उसने लोरेटो स्कूल से की जो उस समय पुरूलिया रोड राँची में स्थित था, वर्तमान में यहाँ उर्सुलाइन की धर्मबहनों की संस्था है. विद्यार्जन करते हुए लोरेटो धर्मबहनों की संगति में रहकर उसने उनकी सेवा-कार्यो से प्रेरित होकर सदा कुँवारी रहने, गरीब, दीन-दुःखी, लाचार एवं पीड़ितों की सेवा में अपने आप को समर्पित करने का निर्णय लिया.वे अपने संस्मरण में कहती हैं- "अगर ये मदर लोग येसु के प्रेम से अपने माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, सगे-संबंधियों, यहाँ तक कि अपने देश को भी छोड़कर हम गरीब एवं लाचार लोगों की सेवा में अपने को दे सकती हैं तो क्या हम भी अपने देश और अपने लोगों की सेवा में ऐसा नहीं कर सकेंगी?" माता अन्ना मेरी बेर्नादेत्त का जन्म सरगांव में हुआ था. पांच वर्ष की आयु में बेथेसदा प्राइमरी स्कूल में उसका दाखिला कराया गया. 31 जुलाई 1890 को उन्होंने कैथोलिक विश्वास को स्वीकार करते हुए प्रथम प्रसाद ग्रहण किया. 24 मई 1897 को कलीसिया के अधिकारियों ने उन्हें उनके तीन सहेलियां माता मेरी बेर्नादेत्त ने अपनी तीन सहयोगी बहनों - माता सेसिलिया, माता बेरोनिका और माता मेरी के साथ इस मुक्तिकारी योजना को आगे बढ़ाया. 26 जुलाई 1897 को चारों को संत अन्ना की पुत्रियां रांची के धर्म संघ में प्रथम प्राथनियों के रूप में ग्रहण किया.आठ अप्रैल 1901 को चारों ने प्रथम व्रत धारण किया.उन्होंने कहा कि वे दो बार धर्म संघ की प्रथम द्वितीय सुपीरियर जनरल नियुक्त की गई.16 अप्रैल 1961 को उन्होंने अंतिम सांसें ली. उस समय 83 साल की थीं.


बुलाहट की प्रेरणा

अन्तरतम की यह प्रेरणा इतनी शक्तिशाली थी कि माता बेर्नादेत्त ने येसु के प्रेम से प्रज्वलित होकर अपना सर्वस्व येसु को दे डाला.येसु के प्रेम से सदा कुँवारी रहकर लोगों की सेवा करने का निर्णय उसके लिए एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि उस समय की आदिवासी संस्कृति के अनुसार लड़कियाँ बिना शादी नहीं रह सकती थीं. उनका यह कदम समाज तथा काथलिक मिशनरियों को झकझोर दिया.उत्साही मिशनरियों ने सोचा कि बेर्नादेत्त और उनकी तीन सहेलियों के इस प्रकार के निर्णय से उनका मिशन का काम रुक जाएगा. माता-पिता अपनी लड़कियों को स्कूल नहीं भेजेंगे.

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