चर्चित उपन्यास जया गंगा फ्रेंच इंस्टिट्यूट के सहयोग से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 29 जून 2021

चर्चित उपन्यास जया गंगा फ्रेंच इंस्टिट्यूट के सहयोग से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित

  • · यह उपन्यास प्रेम की तलाश में एक ऐसे सफर की कहानी है जहां बाहरी और आंतरिक दुनियाओं का विलय हो जाता है।
  • · आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास में जितना रहस्य है, उतना ही रोमांस और शृंगार भी है ।
  • · इस पुस्तक का प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल द्वारा हिंदी अनुवाद किया गया है।
  • · अंग्रेजी और फ्रेंच में यह पुस्तक जबरदस्त लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। इस पर आधारित फिल्म भी इंग्लैंड और फ्रांस में दर्शकों से असाधारण प्रशंसा पा चुकी है। 

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नई दिल्ली : प्रख्यात लेखक, फिल्मकार और पटकथा लेखक विजय सिंह के बहुप्रशंसित उपन्यास ' जया गंगा'  राजकमल प्रकाशन से हिंदी में प्रकाशित हुई है। अंग्रेजी और फ्रेंच में प्रकाशित होते ही इस किताब ने इन भाषाओं के पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की थी। इस पर बनी फिल्म भी फ्रांस और इंग्लैंड में पसंद की गई, जबकि करीब 40 देशों में प्रदर्शित हुई। राजकमल प्रकाशन ने भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित इस नायाब उपन्यास को हिंदी  पाठकों के लिए प्रकाशित किया है। हिंदी में 'फ्रेंच इंस्टिट्यूट इन इंडिया' के सहयोग से प्रकाशित यह उपन्यास पेरिस में रहने वाले एक युवा भारतीय निशांत की हिमालय में गंगा के उद्गम से शुरू की गई यात्रा की कहानी है। उपन्यास के हिंदी में प्रकाशन के बारे में भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनैन ने कहा, जया गंगा का हिंदी में अनुवाद एक चक्र के पूरा होने और भारतीय व फ्रांसीसी संस्कृतियों के बीच परस्पर आदान प्रदान का एक आदर्श उदाहरण है। इसके लेखक विजय सिंह को विभिन्न क्षेत्रों में महारत  हासिल है और वे सांस्कृतिक आदान प्रदान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति हैं। फ्रांस सरकार इस सहयोग  को लेकर उत्साहित है और इसका पूरा समर्थन करती है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि इस पुस्तक के प्रकाशन से हिंदी भाषियों को प्रसन्नता होगी। यह उपन्यास प्रत्यक्ष तौर पर प्रेम की खोज की यात्रा की कहानी है, लेकिन यह यात्रा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों धरातलों पर एक साथ चलती है। इसका नैरेटर निशांत गंगा के प्रवाह के साथ यात्रा करता हुआ अपनी आत्मीय जया की स्मृति से भी गुजरता जाता है। इसी दौरान उसकी मुलाकात जेहरा से होती है जो तवायफ है।  मन के भीतर जया और जेहरा की छवियां लिये वह अपने मार्ग में साधुओं, नाविकों, इंजीनियरों, स्थानीय पत्रकारों, तवायफों और दलालों से भी रू-ब-रू होता है। इसके साथ ही यह यात्रा जीवन और संबंधों के प्रति एक बिलकुल अलहदा नजरिया पेश करने वाले रूपक में बदल जाती है।


उपन्यास के हिंदी में प्रकाशन पर प्रसन्नता जताते हुए इसके लेखक विजय सिंह ने कहा,  इस किताब को दुनिया में बसते हुए आज 35 साल हो चुके हैं. इसकी फ्रेंच और इंग्लिश में काफी चर्चा भी हुई है। लेकिन इस दौरान मैंने हमेशा महसूस किया है कि इस किताब की जो आत्मा है, जो इसकी रूह है, वह हिंदी में ही पहचानी जा सकती है  मंगलेशजी , जिन्होंने इस किताब का हिंदी में अनुवाद किया, भी इस बात से सहमत थे। 'जया गंगा' के आज हिंदी अनुवाद में आने की मुझे अनहद खुशी है, लेकिन अफसोस यह है कि मंगलेशजी आज मेरे साथ नहीं हैं। आत्मकथात्मक यात्रावृत्त की शक्ल में लिखा गया यह उपन्यास जब पहली बार फ्रांस में छपा था तब वहां के साहित्यिक दायरे में इसको काफी प्रशंसा मिली। इसको ऐसी कृति बताया गया जिसमें बाहरी और आंतरिक दुनिया अभूतपूर्व रूप से आपस में घुल मिल गई है। आगे चलकर लेखक ने इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बनाई जो फ्रांस और इंग्लैंड के सिनेमाघरों में रिकॉर्ड 49 सप्ताह चली, जबकि दुनिया के 40 देशों में इसे प्रदर्शित किया गया। वास्तव में यह फिल्म एक कल्ट इंडोफ्रेंच फिल्म साबित हुई, जिसके पीछे निश्चित ही इसकी असाधारण कहानी है।  'जया गंगा' के हिंदी में प्रकाशन को एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परिघटना करार देते हुए राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, हम इस बात से काफी रोमांचित हैं कि  'जया गंगा' भारत में राजकमल द्वारा हिंदी में प्रकाशित हो रही है। यह हमारे लिए एक विशेष मार्मिक क्षण भी है क्योंकि यह प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित अंतिम किताब है। उन्होंने कहा, हमें विश्वास है इसमें लिखे हुए शब्द और गंगा दोनों की यात्रा हमेशा चलती रहेगी और पाठक के मन पर निरंतर नए-नए छाप छोड़ेगी’। गौरतलब है कि 'जया गंगा' पहली बार फ्रेंच भाषा में वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद यह अंग्रेजी में आई। अब करीब 35 साल बाद, इसका नया अंग्रेजी संस्करण भी जल्द ही प्रकाशित होने वाला है।

 

लेखक के बारे में 

विजय सिंह

भारतीय लेखक और फिल्मकार विजय सिंह पेरिस में रहते हैं. सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली और इतिहास अध्ययन केन्द्र, जे.एन.यू. से इतिहास अध्ययन के बाद आप अपने शोधकार्य के लिए इकोले दे हॉट्स एटीट्यूड एन साइंसेज सोशिएल्स, पेरिस चले गए. विद्यार्थी जीवन से ही आपने ल मोंदे, ल मोंदे डिप्लोमेटिक लिबरेशन और गार्डियन आदि पत्रों में लेखन आरम्भ कर दिया था जो आज तक जारी है.रंग निर्देशक के रूप में आपने 1976 में ‘वेटिंग फॉर बैकेट बाइ गोदो’ नाटक का निर्देशन किया। इसके कुछ वर्षों बाद आपने ‘मैन एंड एलिफैंट’ फिल्म का निर्देशन(1989) किया, जिसे सौ से ज्यादा टीवी चैनलों पर दिखाया जा चुका है। पटकथा लेखक और फिल्म निर्माता के रूप में आपको ‘जया गंगा’ तथा ‘वन डॉलर करी’ फिल्मों के निर्देशन का श्रेय जाता है। ‘जया गंगा’ फिल्म पेरिस के सिनेमाघरों में लगातार 49 सप्ताह चली. आपकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘जया गंगा’ (1990), ‘ल नुइट पोइग नार्दे’ (1987), ‘व्हर्लपूल ऑफ़ शैडोज़’ (1992), ‘द रिवर गॉडेस’ (1994) आदि शामिल हैं। आपकी पुस्तकों के अनुवाद फ्रांसीसी तथा अन्य भाषाओं में भी हो चुके हैं। साहित्यिक लेखन के लिए आपको प्रिक्स विला मेडिसिस हॉर्स लेस मुर्स तथा फिल्म पटकथा लेखन के लिए बोर्स लिओनार्दो डि विंसी पुरस्कार मिल चुके हैं.


अनुवादक के बारे में

मंगलेश डबराल

मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई, 1948 को उत्तराखंड में टिहरी जिले के गाँव काफलपानी में हुआ. विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम करने के बाद वे तीन वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार रहे. उनके पांच कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज़ भी एक जगह है’, ‘नये युग में शत्रु’; तीन गद्य-संग्रह ‘एक बार आयोवा’, ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ और साक्षात्कारों का एक संकलन प्रकाशित हैं. उन्होंने बेर्टोल्ट ब्रेश्ट, हांस माग्नुस ऐंत्सेंसबर्गर, यानिस रित्सोस, ज़्बिग्नीयेव हेर्बेत, तादेऊष रूज़ेविच, पाब्लो नेरूदा, एर्नेस्तो कार्देनाल, डोरा गाबे आदि की कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद किया है. वे बांग्ला कवि नवारुण भट्टाचार्य के संग्रह ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ के सह-अनुवादक भी हैं. अरुंधति रॉय के उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद ‘अपार खुशी का घराना’ अत्यन्त चर्चित रहा. कवि के रूप में अनेक महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित. 9 दिसम्बर, 2020 को नई दिल्ली में निधन.

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