विशेष : आखिर कब तक वास्तु की बलि चढ़ती रहेंगी सरकारें? - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

विशेष : आखिर कब तक वास्तु की बलि चढ़ती रहेंगी सरकारें?

  • उत्तराखंड, असम, अरुणाचल के मुख्यमंत्रियों के सरकारी आवासों की गाथा
  • रुपये के सिंबल में वास्तु दोष से चौपट होती देश की अर्थनीति
  • वास्तु दोषों की वजह से झंझावातों में राम मंदिर का निर्माण

किसी भी राज्य या राष्ट्र के सतत विकास और उज्ज्वल भविष्य के लिए एक स्थिर सरकार बहुत महत्वपूर्ण है। यदि किसी राज्य या राष्ट्र की 5 वर्षों के लिए चुनी गई सरकार हर दूसरे-तीसरे साल या हर चार-छह महीने में गिरती है, तो यह उस राज्य या राष्ट्र के विकास में बड़ा रोड़ा बन जाती है। सत्ता की इसी उठापटक का ताजातरीन उदाहरण है भारत का नवीनतम राज्य उत्तराखंड, जहाँ 10 मार्च 2021 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले तीरथ सिंह रावत के सिर्फ 116 दिनों बाद ही कुर्सी गंवा देने तथा महज 20 साल पहले अस्तित्व में आये उत्तराखंड में 11 मुख्यमंत्रियों का असमय ही तख्तापलट होने की घटनाओं से इस राज्य में राजनीतिक, सामाजिक व उद्योग-वाणिज्य सहित हर क्षेत्र कितना प्रभावित हो रहा है, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। मजे की बात यह है कि हर-दूसरे तीसरे साल होने वाले सत्ता परिवर्तन के इस खेल में राजनीति के बजाय वास्तु की ही मुख्य भूमिका मानी जा रही है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में राजनीतिक हलकों में यह बात वर्षों से चर्चित है कि राज्य के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में वास्तु दोष की वजह से इस बंगले में रहने वाला कोई मुख्यमंत्री अपना 5 सालों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता। तीरथ सिंह रावत से पूर्व मुख्यमंत्री बने त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अफवाहों और अंधविश्वासों में विश्वास नहीं करते हैं और इस सरकारी बंगले में रहेंगे, जिसे मनहूस कहा जाता है। नवरात्र के दूसरे दिन पत्नी व दोनों बेटियों के साथ 2 घंटे पूजा करने के बाद शुभ मुहूर्त में उक्त बंगले में प्रवेश करने के बावजूद उन्हें कार्यकाल पूरा होने से पहले ही सीएम की कुर्सी गंवानी पड़ी. उनके बाद तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के महज 116 दिन बाद ही कुर्सी गंवा दी, तो एक बार फिर मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले का वास्तु दोष लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास का निर्माण नारायणदत्त तिवारी के कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ था, जो तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी के पहले कार्यकाल के दौरान पूरा हुआ था। इस संबंध में तो यहां तक कहा जाता है कि इसके निर्माण के बाद ही नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान ही मुख्यमंत्रियों की कुर्सियां खिसकती रहीं हैं। यह सिलसिला राज्य में कांग्रेस की तिवारी सरकार से शुरू हुआ था। उनके समय में यह बंगला निर्माणाधीन था। तिवारी इस बंगले में प्रविष्ट होते उससे पहले ही उनकी सरकार गिर गई। बाद में खंडूड़ी ने इस अधूरे बंगले का निर्माण अपनी पसंद के अनुसार पूरा करवाकर सर्वप्रथम इसमें प्रवेश किया, लेकिन लगभग ढाई साल में ही उनकी भी कुर्सी खिसक गयी। 13 मई 2011 को मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने वाले डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को मात्र 4 माह बाद, 2012 में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी को 6 महीने बाद, मार्च 2012 में मुख्यमंत्री बनने वाले विजय बहुगुणा को एक साल 11 महीनों बाद और 2014 में राज्य के मुख्यमंत्री बने हरीश रावत को 2 साल बाद ही मुख्यमंत्री का पद छोडऩा पड़ा।


ऐसा नहीं है कि सिर्फ उत्तराखंड की राजनीति ही वास्तु से प्रभावित रही है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले की रामकहानी तो और भी विचित्र है। दोर्जी खाण्डू ने इटानगर के नीतिविहार इलाके में 59.55 करोड़ की लागत से मुख्यमंत्री का नया बंगला बनवाकर 14 नवंबर 2009 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा द्वारा विशेष पूजा के बाद उसमें प्रवेश किया था। लेकिन अपना कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही वे 30 अप्रैल 2011 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गये। तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा का विशेष पूजा-पाठ धरे का धरा रह गया। उनके बाद मुख्यमंत्री बने जारबोम गामलिन सिर्फ 6 महीने ही अपने पद पर रह पाये और अपने पद से इस्तीफा देने के बाद इसी आवास में रहते ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और सिर्फ 53 वर्ष की उम्र में 30 नवंबर 2014 को उनका अकाल वियोग हो गया। 1 नवंबर 2011 को मुख्यमंत्री बने नवाम टुकी ने रोज-रोज की परेशानियों से मुक्त होने के लिए मुझे मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले का वास्तु देखने ईटानगर बुलवाया था। नवाम टुकी ने मेरी सलाह के अनुसार उसमें सुधार करवाने की हामी भी भरी थी, लेकिन किया कुछ नहीं, जिसका परिणाम उन्हें दिसंबर 2015 में विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान मुख्यमंत्री पद से हटाने के रूप में मिला। 47 वर्षीय कालिखो पुल ने 19 फरवरी 2016 को मुख्यमंत्री का पद संभाला और महज 145 दिन बाद 13 जुलाई 2016 को उनकी भी गद्दी चली गई तो उन्होंने 9 अगस्त 2016 को मुख्यमंत्री आवास के कमरे में पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली। 17 जुलाई 2016 को पेमा खांडू ने राज्य की बागडोर संभाली और अब वे भारतीय जनता पार्टी के नेता के रुप में अरुणाचल में सरकार चला रहे हैं। दोर्जी खांडू से कालिखो पुल तक जितने भी मुख्यमंत्री हुए उन सभी ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में डेरा डाला था और उनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। इस बंगले में 3 मुख्यमंत्रियों की अकाल मृत्यु हो गई और एक कर्मचारी ने फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली तो पेमा खांडू ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय अपने आवास से ही मुख्यमंत्री का कार्यभार चलाने का निर्णय लिया तथा इसी बीच जनता के बीच भूतबंगले के रूप में प्रचारित हो चुके मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले को सरकारी गेस्ट हाऊस में तब्दील कर दिया।


असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी ऐसे ही वास्तु दोषों का शिकार रही है। मेघालय के अलग राज्य का दर्जा हासिल करने के बाद असम की राजधानी शिलांग से दिसपुर स्थानांतरित कर दी गयी। असम की राजधानी दिसपुर में निर्मित मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में जितने भी मुख्यमंत्री रहे, उनमें से कोई भी अपना 5 सालों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। 12 मार्च 1978 को मुख्यमंत्री बने गोलाप बोरबोरा को 18 महीने, 9 सितम्बर 1979 को मुख्यमंत्री बने जोगेन्द्र नाथ हजारिका को 3 महीने, 6 दिसम्बर 1980 को मुख्यमंत्री बनी सैयदा अनवरा तैमूर को 7 महीने, 13 जनवरी 1982 को मुख्यमंत्री बने केशव चंद्र गोगोई को 3 महीने, 27 फरवरी 1983 को मुख्यमंत्री बने हितेश्वर सैकिया को 2 साल 10 महीने बाद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से महरूम होना पड़ा था। 24 दिसम्बर 1985 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले प्रफुल्ल कुमार महंत को दिसपुर स्थित मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में रहते ही कार्यकाल पूरा होने से पूर्व राष्ट्रपति शासन लगाकर मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया। दूसरी बार जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय विधायक आवास से ही कार्य करते हुए अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया। 30 जून 1991 को दूसरी बार मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले हितेश्वर सैकिया 4 साल 9 महीने तथा 22 अप्रैल 1996 को मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले भूमिधर बर्मन सिर्फ 22 दिन ही मुख्यमंत्री के पद पर कायम रह पाये थे। उनके बाद मुख्यमंत्री बने तरुण गोगोई ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय सरकारी गेस्ट हाऊस में रहकर काम किया और लगातार 3 बार मुख्यमंत्री बनकर राज्य के सर्वाधिक लंबी अवधि तक मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड कायम किया। उनके बाद सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने और उन्होंने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के बजाय सरकारी गेस्ट हाऊस से कार्य कर अपना 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा कर लिया।


ये चंद उदाहरण हैं, जिनसे पता चलता है कि वास्तु का मानव जीवन में कितना प्रभाव होता है। राजा-प्रजा सभी को जीवन में सुख, शांति, समृद्धि हेतु वास्तु को अपनाना अवश्यंभावी है। सन् 2010 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने रुपये का नया सिंबल लागू किया था, तब मैंने उन्हें पत्र लिखकर चेताया था कि इस सिबंल में भयंकर वास्तु दोष है, अगर इसे नहीं सुधारा गया तो इससे न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल होगी, अपितु रुपये का भी अवमूल्यन होगा। लेकिन न तो डॉ. मनमोहन की सरकार ने और न ही मोदी सरकार ने इस चेतावनी पर गौर किया और उसका परिणाम देश की अर्थव्यवस्था के चौपट होने तथा रुपये के ऐतिहासिक अवमूल्यन के रूप में हमारे सामने है। रुपये के सिंबल के लागू होने के बाद एक-दो नहीं पूरे 10 साल से देश की अर्थनीति हिचकोले खा रही है और उसके उत्थान की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। राम मंदिर ट्रस्ट ने जब अयोध्या में प्रस्तावित राम मंदिर का नक्शा सार्वजनिक किया था, तो उसका मुआयना करने पर मुझे उसमें कई वास्तुदोष नजर आये थे। तब मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा राममंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष को पत्र लिखकर सूचित किया था कि इस नक्शे में भयंकर वास्तु दोष होने की वजह से मंदिर निर्माण में बाधाएं और अवांछित समस्याएं आयेंगी। लेकिन किसी ने भी चेतावनी पर गौर नहीं फरमाया और उसी का परिणाम है कि आज मंदिर का निर्माण कार्य पग-पग पर बाधित हो रहा है। आधारशिला का समय कई बार टालने के बाद मंदिर के प्रथम तीन खंभे जब ढाले गये तो वे जमीन में धंस गये, जिससे मंदिर निर्माण की पूरी योजना ही खटाई में पड़ गई और नये सिरे से योजना बनानी पड़ी। पहले जिस मंदिर के निर्माण पर 300 करोड़ रुपयों की लागत आनी थी, अब उसी मंदिर के निर्माण पर 1200 करोड़ की राशि खर्च होने का अनुमान है। अब 50 फीट जमीन खोदकर नींव की ढलाई करनी पड़ रही है। इसी बीच ट्रस्ट द्वारा जमीन की खरीद में घोटाले की बात सार्वजनिक होने से मंदिर निर्माण के कार्य से जुड़े लोगों की नियत पर भी राम भक्तों में अविश्वास पैदा हो गया है। अगर राम मंदिर का निर्माण वास्तुसम्मत नियमों के तहत किया जाता तो मंदिर के निर्माण में इतनी बाधाएं भी नहीं आती और आज मंदिर निर्माण का काम काफी आगे बढ़ चुका होता।


विगत 25 सालों से वास्तु अध्ययन तथा 16,000 परिवारों को घर-घर जाकर नि:शुल्क वास्तु सलाह देने से प्राप्त अनुभव के आधार पर मैंने उपरोक्त बातें लिखी हैं। अगर देश की अर्थनीति को सुधारना है, तो रुपये के सिंबल में मौजूद वास्तु दोष को दूर करना ही होगा। अगर देश को सोने की चिडिय़ा बनाना है, राज्यों का चहुंमुखी विकास करना है, आम जनता को सुखी और समृद्ध बनाना है तो सरकार हो या आम जनता सभी को वास्तु को अपनाना ही होगा। धरती माता न सिर्फ मनुष्य को जीवन धारण करने के लिए अन्न, ऑक्सीजन और पानी नि:शुल्क देती है, अपितु उसने मनुष्य का जीवन सुधारने और बिगाडऩे की पूरी क्षमता भी खुद मनुष्य के हाथ में ही दी है। लेकिन फिर भी मनुष्य धरती को नहीं मानता, धरती को नहीं पूजता, और तो और धरती को ही विध्वस्त करने पर जुटा हुआ है और यही दुनिया में अशांति का मूल कारण है। मनुष्य ने अपने-अपने धर्म गढ़ लिए, अपने-अपने भगवान, अल्लाह, गॉड गढ़ लिये। प्रति क्षण, प्रति पल धरती की कृृपा पर जीवित रहने के बावजूद धरती के बजाय इन अस्तित्वहीन भगवान, अल्लाह, गॉड की पूजा, अर्चना, भक्ति में ही अपना जीवन न्यौछावर करने लगा, धरती के सिस्टम के बजाय शनि ग्रह, मंगल ग्रह के सिस्टम से चलने लगा, जिसका परिणाम दुख, दर्द, तकलीफों भरी दुनिया के रूप में हमारे सामने है, जिसका परिणाम दरिद्र, भूखी, रोगग्रस्त, चिंताग्रस्त, अवसाद ग्रस्त, हताशाग्रस्त मानव जाति के रूप में हमारे सामने है। अगर मनुष्य सुख, शांति, समृद्धि का जीवन हासिल करना चाहता है तो उसे धरती के सिस्टम से चलना होगा, न कि नकली अल्ला, ईश्वर, गॉड या शनि ग्रह, मंगल ग्रह, बुध ग्रह के सिस्टम से, तभी एक सर्वांग सुंदर दुनिया का सपना साकार किया जा सकता है।




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- राजकुमार झाँझरी

- अध्यक्ष, रि-बिल्ड नॉर्थ ईस्ट, गुवाहाटी

- संपादक, आगमन (मासिक पत्रिका)

- संपादक, सम्मेलन समाचार (मासिक पत्रिका)

मोबाईल नं: 70025 96500

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