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बुधवार, 11 अगस्त 2021

आलेख : कौन चाहता है : भृष्टाचार ख़त्म हो ?

भृष्टाचार का विषय किसी पद विशेष, व्यक्ति-विशेष, संस्था-विशेष अथवा शासकीय-तंत्र मात्र से ही जुड़ा हुआ नही है बल्कि आम जन-मानस की मानसिकता मे परिवर्तन लाये जाने का विषय है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एवं विख्यात अभिभाषक श्री अश्विनी उपाध्याय जी, जिन्होंने देश हित में लगभग 100 पीआईएल  सुप्रीम कोर्ट में दायर की हैं। उनका एक इन्टरव्यू देश में व्याप्त भृष्टाचार को लेकर यूट्यूब पर है, जो उन्होंने मुझे भेजा है। उनका सुझाव है कि सौ रुपए के ऊपर के नोट बन्द होना चाहिए। अच्छा सुझाव है। लेकिन प्रश्न तो यह है कि यह करेगा कौन ? जब एक हजार के नोट के स्थान पर दो हजार का नोट आ गया, इससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि करप्शन कम करने में बड़े नोट बंद करने का कोई रुझान सरकार का नहीं है।  


देश में भृष्टाचार प्रत्येक स्तर पर फ़ैल चुका है। इस विषय पर सरकार में या विपक्ष में, किसी की भी मानसिकता चर्चा करने की नहीं है। कारण यह है कि "सत्ता से पैसा, और पैसे से सत्ता" अर्जित करने का तन्त्र स्थापित हो चुका है। बाजार में वस्तुओं का क्रय-विक्रय होना तो ठीक है, लेकिन अब तो जनप्रतिनिधियों, नियुक्तियों, पदस्थापनाओं का भी बाजार है। वे कहते हैं "हम बिकाऊ हैं, ये कहते हैं हम खरीददार हैं, आओ बिजनिस करैं।  करप्शन की स्थिति यह है कि यह राजनीति, सरकार व शासकीय तन्त्र का महात्वपूर्ण अंग बन गया है। चिन्ता का विषय तो यह है कि सामाजिक संगठनों, एनजीओ में भी करप्शन अपना स्थान बना चुका है। इस विषय पर कोई भी कथित जिम्मेदार लोग सारगर्भित चर्चा करना पसन्द नहीं करते हैं। मैं 14 वर्ष सरकारी वकील रहा हूं और मेरे सामने आए प्रकरणों में मैंने अवैधानिकता व करप्शन की बू प्रकट होने पर जिम्मेदार सरकारी अफसरों को एक्शन लेने के लिए पत्र लिखे, लेकिन कोई कार्रवाई होते नहीं दिखीं। सन् 1995 में बोहरा समिति ने अपराध और भृष्टाचार के संदर्भ में अपनी रिपोर्ट उजागर की थी, जिसका यह निष्कर्ष था कि ’अपराधिक गिरोहों ने देश के विभिन्न भागों में अपना प्रभुत्व जमा लिया है और इन्होंने राजनीतिज्ञों, सरकारी उच्चाधिकारियों व अन्य प्रभावशाली लोगों से सांठ-गांठ कर रखी है, जिसके फलस्वरूप वे खुलकर धन और बल का प्रयोग कर रहे हैं। सी.बी.आई. और इन्टैलीजैन्स ब्यूरो से राजनीतिज्ञों तथा अपराधियों के सम्बन्धों के बारे में जानकारियां मिलती रहती हैं। लेकिन ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि यह जानकारी किसी एक स्थान पर जमा हो।’ इस जानकारी के होते हुए भी उसका कभी सकारात्मक स्तेमाल नहीं किया गया। भ्रष्टाचार से सभी परेशान हैं और भ्रष्टाचार से कोई परहेज भी नहीं कर रहा है। यह एक ऐसी कहकहे की दीवार है की जिसमे हर रोता हुआ व्यक्ति झांकता हैं और  दीवार फांद कर उसी में शामिल हो जाता है। कुछ खुशी-खुशी और कुछ अपने अस्तित्व की सुरक्षा में मजबूरी के कारण।


भृष्टाचार के विरुद्ध एक जन जाग्रति उत्पन्न करने का समय है। यह सरकारी स्तर पर सफल होना सम्भव नहीं है, क्यों कि सरकारी तन्त्र भृष्ट हो चुका है और इसी कारण उसमें इच्छा शक्ति नहीं है। हम-आप जैसे लोगों को युवाओं में एक वातावरण का निर्माण करना होगा। कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि हम भृष्ट व्यक्ति का सम्मान नहीं करेंगे। शासकीय स्तर पर, सामाजिक स्तर पर, राजनीतिक स्तर पर भृष्ट कौन है, यह किसी से छिपा नहीं रहता है। एक मुहिम चलाना होगी कि भृष्ट व्यक्ति से नमस्कार नहीं करेंगे, उससे हाथ नहीं मिलाएंगे, उसका किसी मंच पर सम्मान समारोह नहीं करेंगे, उसे इग्नोर करेंगे। उसे आभास कराएंगे कि वह भृष्ट है और मेरे द्वारा वह सम्मान का पात्र नहीं है। इसके विपरीत ईमानदार व्यक्ति का भरपूर धूमधाम से सम्मान करेंगे। इससे भृष्ट व्यक्ति स्वयं को अपमानित अनुभव करेगा। सम्मान पैसे से नहीं खरीदा जा सकता। जो पैसे से सम्मान खरीदने का दम भरते हैं, तो वह ऐसे ही है, कि चोर स्वयं का सम्मान चोरों से ही करवा रहा है। यदि हम सच में ही भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं तो अपने बच्चों को सत्य व ईमानदारी का पाठ पढ़ाना होगा, उन्हें संस्कारित करना होगा। बच्चे वही तो सीखेंगे और करेंगे, जो वह देखेंगे। आम जनमानस को यह समझना होगा कि पैसा जिस रास्ते से आता है, उसी रास्ते से ब्याज सहित बापिस जाता है। गलत माध्यम से अर्जित धन बीमारियों को भी साथ लेकर आता है और उन्हीं के इलाज में व्यय हो कर चला भी जाता है। हम धनार्जन क्यों करते हैं ? पेट को रोटी, तन को कपड़े, रहने को घर और सम्मान प्रतिष्ठा के लिए ही तो धन का अर्जन आवश्यक है। अब यदि धन की आवक ऐसी है कि जिससे सम्मान व प्रतिष्ठा क्षीण होती हो, या स्वयं अपनी नजरों में ही गिरते हों, तो ऐसा धन निरर्थक है। कोई भी पुरुषार्थी भूख से नहीं मरता, और नंगा भी नही फिरता। जीवन में पुरुषार्थ ही महत्वपूर्ण है। हमें अपने बच्चों को पुरुषार्थी बनने की शिक्षा देना चाहिए। शेष सब-कुछ ईश्वर, प्रारब्ध व भाग्य पर निर्भर है। “तिजोरियां भरते हैं लोग उम्र भर के लिए, मगर अफसोस, मौत का फरिश्ता धन नहीं लेता।“  




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लेखक - राजेन्द्र तिवारी, अभिभाषक

दतिया, मध्य प्रदेश

फोन : 07522&238333, 9425116738

email- rajendra.rt.tiwari@gmail.com

नोट - लेखक एक पूर्व शासकीय एवं वरिष्ठ अभिभाषक व राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक,  आध्यात्मिक विषयों के चिंतक व समालोचक हैं।

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