परिवारवादी राजनीति की अंतर्निहित लिप्सा को मतदाता समझने लगा है। - Live Aaryaavart

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शनिवार, 27 नवंबर 2021

परिवारवादी राजनीति की अंतर्निहित लिप्सा को मतदाता समझने लगा है।

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शुक्रवार को देश के संसद-भवन के सेंट्रल हॉल में संविधान-दिवस पूर्ण गरिमा के साथ मनाया गया।इसी दिन यानी 26 नवम्बर,1949 को भीमराव अम्बेडकर द्वारा भारत के संविधान को तैयार किया गया था जिसे तैयार करने में 2 वर्ष, 11 माह 18 दिन लगे थे। तत्पश्चात 26 जनवरी, 1950 को भारत-गणराज्य का यह संविधान लागू हुआ।विश्‍व का सबसे बड़ा लिखित संविधान हमारे देश का है। भारतीय संविधान लिखने वाली सभा में 299 सदस्य थे, जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। इसे बनाने के लिए 10 प्रमुख देशों के अलावा उस समय मौजूद 60 से अधिक संविधानों की सहायता ली गई। भारतीय संविधान 22 भागों में विभाजित है तथा इसमें 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियां हैं।


भारतीय संविधान में ‘लोकतंत्र’ की परिभाषा,मौलिक अधिकारों और उनके स्वरूप आदि का विस्तार से जिक्र किया गया है। भारतीय संविधान में हमारे लोकतांत्रिक देश के लिए ‘परिवार’ के वर्चस्व की कल्पना कहीं भी नहीं की गई है।परंतु वर्तमान समय में देश की राजनीति में जो माहौल बना हुआ है या बन रहा है, वह लोकतंत्र में ही राजशाही-व्यवस्था को जन्म देने वाले निहितार्थ की ओर संकेत दे रहा है।कौन नहीं जानता कि कुछ राजनीतिक पार्टियों को छोड़ सभी राजनीतिक दल अपने और परिवार को आगे बढ़ाने के लिए लोकतंत्र को चूना लगाकर राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।दरअसल,साठ-सत्तर और अस्सी के दशकों में क्षेत्रीय पार्टियों के बढ़ते प्रभाव और उनमें बढ़ती क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के कारण केन्द्रीय सत्ता में उनकी साख और शक्ति बढ़ती चली गई। केंद्र में सरकार बनाने-गिराने की चाबी उनके हाथों में आ गई। परिणामस्वरूप राज्यों में परिवारवादी पार्टियों पर अंकुश लगाने में केन्द्रीय-सत्ता अपने को विवश पाने लगी क्योंकि उसकी स्वयं की सत्ता परिवार-पोषित थी। ‘तुम भी परिवारवादी-सत्ता चलाओ,हमारी भी चलने दो’ की मौन-स्वीकृति केंद्र-राज्य के बीच में बनी रही। लोकतंत्र के लिए यह ‘समझौता’ आगे चलकर बड़ा महंगा सिद्ध हुआ।कई राज्यों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार का शासन चलता रहा।अब इस परिवारवादी परिपाटी को भेदने में बड़ा ‘ज़ोर-दम’ लगाना पड़ रहा है।


वंशवाद अथवा परिवारवाद की राजनीति लोकतंत्र के लिए नितांत घातक है। लोकतंत्र में समान अवसरों को वरीयता दी जाती है, किंतु परिवारवाद की राजनीति के कारण समान अवसरों की अवधारणा दम तोड़ देती है। अनेक अच्छे और उदीयमान नेता वंशवाद की बलि चढ़ जाने के कारण देश की राजनीति में अपना योगदान देने से वंचित रह जाते हैं। कहना न होगा कि वंश या परिवार-आधारित राजनीति का तानाशाही का पर्याय बनने का भी खतरा बराबर बना रहता है तथा स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों की श्रीवृद्धि में इसकी भूमिका शून्य हो जाती है।एक बात यह भी है कि वंशवाद की राजनीति से देश का विकास भी अवरुद्ध होता है, क्योंकि महत्त्वपूर्ण पदों पर वंश और परिवार के वे लोग काबिज रहते हैं, जो न तो दक्ष होते हैं और न ही उन्हें काम का कोई अनुभव ही होता है। सत्ताधारियों के ये गुर्गे उनके दूर-पास के रिश्तेदार होते हैं। इसका प्रतिकूल प्रभाव सामने आना स्वाभाविक है। यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ परिवारवाद की तुलना राजशाही से करते हैं। उनके अनुसार फर्क सिर्फ इतना है कि पहले राजे-महाराजे अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते थे, आज भारत के लोकतंत्र में यह काम उनके लिए चाहे-अनचाहे ढंग से उनके चहेते सगे-संबंधी अथवा परिवार के मुखिया करते हैं।


सौ बात की एक बात यह है कि सत्ता का प्रमाद ही कुछ ऐसा होता है कि परिवारवाद के पक्ष-विपक्ष में चाहे कितनी भी दलीलें पेश की जाएं, एक सत्य तो अटल है कि हर राजनेता किसी-न-किसी रूप में पुत्र-मोह से ग्रसित धृतराष्ट्र ही है। संभवतः इसीलिए संविधान-दिवस पर प्रधानमंत्री ने पारिवारिक-पार्टियों पर आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसी पार्टियां संविधान के मूल मर्म को भूल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली पार्टियां देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने साफ किया कि वे इस बात के खिलाफ नहीं हैं कि एक ही परिवार से कोई दूसरा व्यक्ति राजनीतिक-पार्टी में न आए। दुःख इस बात का  हैं कि कुछ पार्टियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार के नाम से चलती आ रही हैं: ‘फार द फैमिली, बाय द फैमिली...’आगे कहने की जरूरत नहीं है ।


परिवारवादी शासन-प्रणाली के पक्षधर कभी-कभी यह तर्क भी देते हैं कि डॉक्टर का बेटा जब डॉक्टर बन सकता है, ऐक्टर का बेटा ऐक्टर बन सकता है, बिजनेसमैन का बेटा बिजनेस संभालता है, तो राजनेता का बेटा या बेटी राजनीति में भाग क्यों न ले?---भाग ले सकते हैं । मगर बात यहाँ पर हो रही है एक ही वंश के ‘भद्रजनों’ का पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता पर काबिज होने की ‘जुगत’ अथवा ‘छद्म’ से।और फिर डाक्टर,अभिनेता,व्यवसायी आदि का मामला उनका निजी मामला है, देश के ‘भविष्य’ को बनाने-बिगाड़ने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनीति में गहराती जा रही इस परिवारवादी प्रवृत्ति को अगर रोका नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे लोकतंत्र की मूल-भावना का अवसान हो जाएगा और एक बार फिर लोकशाही के भीतर ही राजशाही के बीज पनपने शुरू हो जाएंगे। कल तक परिवारवाद को कोसने वाले नेता भी आज अपने बच्चों को परिवारवाद की ओर उन्मुख कर रहे हैं।सभी पार्टियां ऐसा कर रही हैं। दरअसल, ”हमाम में सभी नंगे है”। लोक-कल्याण की अवधारणा अब परिवार-कल्याण की अवधारणा में बदल रही है। ये अवधारणा संवैधानिक भावना के खिलाफ है, संविधान के विपरीत है। एक पार्टी जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार चलाता रहे, पार्टी की सारी व्यवस्था परिवारों के पास ही रहे, यह व्यवस्था स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी कतई नहीं है।


दरअसल,भारतीय राजनीति में परिवारवाद एवं वंशवाद का बोलबाला तब तक रहेगा जब तक कि इसका विरोध भीतर से न किया जाए। भारतीय जनता को चाहिए कि वह सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से जागरूक बने जिससे कि वह राजनीतिक दलों के नीतियों को समझते हुए गलत नीतियों का विरोध करे।राजनीतिक दलों के नेता नैतिक रूप से परिवार के सदस्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन कर फैसला करें कि संबंधित सदस्य क्या राजनीति के योग्य है या नहीं? अगर योग्य है तो उसे प्रोत्साहित करें अन्यथा नहीं। परिवार-पोषित राजनेताओं को भी यह समझना चाहिए कि परिवारवाद का लोकतंत्र में तब तक कोई स्थान नहीं हो सकता जब तक कि इसे चलाने वाली आम जनता की निगाहों में उस परिवार की साख शंका के घेरे से परे न हो।कहना न होगा कि भारतीय मतदाता अब उत्तरोत्तर जागरूक होता जा रहा है।वंशवादी अथवा परिवारवादी राजनीति की अंतर्निहित भोगवादी लिप्सा को वह समझने लगा है।




--डॉ० शिबन कृष्ण रैणा--

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