विचार : राजनीतिक आयने में दंगा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 8 मई 2022

विचार : राजनीतिक आयने में दंगा

आईए, दंगा दंगाईयों पर खुली चर्चा करें। साम्प्रदायिक हिंसा हिन्दुओं के धार्मिक त्यौहार पर शोभायात्रा के समय हो या मुसलमानों की ईद व नमाज़ के दिन, राजनीतिक दलों के दोनों हाथों में लड्डू हो जाते हैं। ऐसा क्यों व कैसे ? जानिए, इसमें वोटबैंक का बहुत बड़ा इशु है। समाज में उपद्रवी, हिंसक व आतंकी भी राजनीतिक दलों के महत्वपूर्ण टूल हैं, राजनीति में इनकी भी भूमिका है। राजनीतिक दलों के इस उद्देश्य पर कोई मतभिन्नता नहीं है कि :-

1. हम यदि सत्ता में हैं, तो आगे भी चुनाव बाद सत्ता में बने रहैं, 

2. हम यदि सत्ता में नहीं हैं, तो सत्ता में आ जाएं।

अब देखिए, तुष्टिकरण व लाभ का फार्मूला कैसे लागू होता है - मजहबी आधार पर हिन्दू लुटा, पिटा, मरा, हिन्दु लड़कियों से बलात्कार हुआ तो स्वाभाविक है कि वृहद हिन्दू समाज, हिन्दुत्ववादी समर्थक राजनीतिक दलों की ओर मुखातिब होगा। अर्थात अपना हिन्दू वोटबैंक पक्का हुआ। हिन्दू मरा, कटा, पलायन के लिए मजबूर हुआ तो इसके लिए राजनीतिक मंच व टीवी डिवेट में चिल्ला-चूं-चूं कर लेते हैं। इसका फायदा उस राज्य में ज्यादा होगा, जहां हिन्दुत्ववादी दल सत्ता में नहीं है। अब यह दंगा चूंकि मुसलामानों के द्वारा किया गया है, तो गैरहिन्दुत्ववादी दल दंगाईयों का विभिन्न तर्कों के माध्यम से उनका बचाव करेंगे, उनके दंगा को सकारण बताते हुए प्रतिक्रिया में होना बता देंगे, उल्टे हिन्दू को ही दोषी ठहरा देंगे, अर्थात इस तरफ मुस्लिम वोट का तुष्टिकरण हो गया और गैरहिन्दुत्ववादियों का मुस्लिम वोटबैंक पक्का हुआ। जिन राज्यों में हिन्दुत्वादी राज्य सरकारें हैं, पहले तो वहां भय, कुटाई, बुल्डोजर के डर के कारण दंगा होगा ही नहीं और वहां हिन्दू वोटबैंक खुश। बल्कि मैं तो यह भी कहूंगा कि मुसलमानों का वह तबका भी, जो खुश और अमनचैन से रहना चाहता है, जो दंगा व दंगाईयों से स्वयं को दूर मानने का कहता है, वे भी खुश। हां, दुःखी वे हैं जो दंगा कराना चाहते हैं, लेकिन दंगा कर नहीं पा रहै हैं और उन्हें लूटपाट का अवसर नहीं मिल पा रहा है। अथवा अपनी लगी को सांप्रदायिक दंगा के नाम पर बुझा नहीं पा रहै हैं। अब यदि दंगा हो भी गया, तो गैरहिंदुत्ववादी दल उल्टे सीधे तर्क के साथ मुस्लिमों का बचाव करने में लग जाएंगे और हिंदुत्ववादी दल हिन्दुओं का बचाव करने में लग जाएंगे। अपने-अपने वोटबैंक को पक्का करेंगे। इसलिए राजनीतिक स्तर पर सांप्रदायिक दंगा, हिंसा, मारकाट, लूटपाट वोट रुपी फसल की खाद मिट्टी है। 


यह तो हुई राजनीतिक पटल पर साम्प्रदायिक दंगों के विषय में चर्चा। अब चर्चा का मुंह दूसरी तरफ मोड़ते हैं। राजनीति, चुनाव, वोटबैंक से हटकर दूसरा विषय है, देश में फ़ैल रहा आतंकवाद, कट्टरवाद। बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि कट्टरवाद मुसलमानों में है, सामान्यतः हिन्दुओं में नहीं है। मुल्ला मौलवियों की यह सीख कि गैरमुस्लिमों को काफिर मानना, काफिरों को जीवन जीने का अधिकार नहीं है, जिहाद, दारुल हरब और दारुल इस्लाम, गजवाएहिन्द आदि जैसे सोच ने सम्पूर्ण विश्व में इस्लाम को नकारात्मक मान लिया है। परिणामत: कुछ कट्टरवादी दंगाईयों के कारण मुसलमान एक विश्वव्यापी समस्या बन रहा है। यह स्वयं मुस्लिमों के लिए भी ठीक नहीं है और चिंताजनक भी है। अलगथलग हो कर कोई भी सभ्य समाज में जी नहीं सकता। ध्यान रहे असभ्य और दंगाईयों का समूह ज्यादा दिन नहीं ठहरता। ऐसा क्यों है कि मुस्लिम इलाकों में ही दंगा होता है ? क्रिमिनोलॉजी का सिद्धांत है कि हेबिचुअल क्रिमिनल बिना अपराध किए रह नहीं सकता। इसीलिए ही पुलिस थानों में हिस्ट्री शीट खुलती हैं। इन्हें गैरमुस्लिम लड़ने को नहीं मिलेगा तो आपस में ही लड़ेंगे। शिया सुन्नी झगड़े। सोचिए, गम्भीर चिन्तन करिए, उन शरीफ अमनपसंद मुसलमानों से पूछिए, जो मुस्लिम इलाकों में रहते हैं, उन्हें वहां घुटन होती है। उन शरीफ अमनपसंद मुसलमानों से पूछिए, जो हिन्दु इलाकों में रह रहे हैं, कि क्या आप मुस्लिम बस्ती में रहना पसंद करोगे ? वे साफ मना कर कहेंगे, मियां सुकून से रहने दीजिए।  इसलिए कहना होगा कि हिन्दू बाहुल्य होने में ही सुख, शांति, अमन चैन है। अकेले में पूंछो तो मुसलमान भी यह स्वीकार करता है। मुस्लिम बाहुल्य देश में आपस में ही लड़ाई झगड़ा है। एक व्यवहारिक सत्य है कि समूह में मुस्लिम उग्र हो जाता है, और हिन्दू शरीफ। अकेले में मुस्लिम शरीफ़ हो जाता है, और हिन्दू उग्र।


समस्या ही समस्या है, प्रश्न तो यह है कि निदान क्या है ? निदान है सख्ती। यह समस्या चीन में, रुस में, जापान में, क्यों नहीं है ? वहां सख्ती है। राष्ट्र की सुरक्षा और देशहित प्राथमिक है। समझना है और समझाना भी है कि भारत और पाकिस्तान के मुसलमान मूलतः हिन्दू हैं। चार-पांच पीढ़ी ऊपर की देखो, तो बाप दादाओं के हिन्दू नाम मिलेंगे। इनके बाप दादाओं को मुगलों ने मारपीट कर, इनकी महिलाओं को छीन कर, कन्वर्ट करा लिया, हिन्दू से मुसलमान बना लिया था। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि जिनके बाप दादाओं, महिलाओं पर मुसलमान बनने के लिए अत्याचार किया गया था, उसी से प्रेम है ? भारत भूमि में हिन्दू थे, हिन्दू हो, पूर्वजों के हिन्दुत्व को नकार नहीं सकते, ऐतिहासिक सत्य को मिटाया नहीं जा सकता। छोटे-मोटे निरर्थक विवाद, मस्जिदों से माईक उतारो, मन्दिरों से माईक उतारो, यह सब कुछ वोटबैंक बनाने के लिए है। हां सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइंस के अनुसार रात 10 बजे से सुबह 06 तक पूरी तरह लाऊड स्पीकर बंद हों। दिन में भी निर्धारित धीमी आवाज में हों। प्रश्न है प्रशासन से कि शादी ब्याह में कानफोडू हृदय की धड़कन तक प्रभावित करने वाले डीजे पुलिस जब्त क्यों नहीं करती ? 


छोटे-मोटे निरर्थक मुद्दों में उलझने से बड़े मुद्दे छिप जाते हैं। देश के सामने बहुत बड़े मुद्दे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा है, आम व्यक्ति की सुरक्षा। मुद्दा यह कि सिर्फ इस वजह से हत्याएं, लूट, मारकाट, कि वह हिन्दू है ! मुद्दा यह कि सिर्फ इस वजह से पलायन, कि वह हिन्दू है ! जोधपुर में ईद पर दंगा, भीलवाड़ा में दंगा, खरगोन में हनुमान जयन्ती पर दंगा, रामनवमी पर करोली मे दंगा और हिन्दुओं ने मकान बेचने की सूचनाएं चस्पा की, कश्मीर में हिन्दुओं का पलायन इसका जीता जागता उदाहरण है।  एक नैसर्गिक सत्य है और मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि वह अमन और चैन से रहना चाहता है तथा सुकून से अपने बालबच्चों को पालना चाहता है। देखना यह है कि क्या इसमें मज़हब आड़े आ रहा है या मज़हब के नाम पर दंगा कराने वाले आड़े आ रहे हैं ? इसलिए एक ही सूत्र है जो सर्वव्यापी है और सर्वमान्य बनाईए - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।। सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।





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 राजेन्द्र तिवारी, अभिभाषक दतिया (म.प्र.) 

फोन-07522-238333, 9425116738, 6267533320 

email- rajendra.rt.tiwari@gmail.com

नोट:- लेखक एक पूर्व शासकीय एवं वरिष्ठ अभिभाषक व राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक  आध्यात्मिक विषयों के चिन्तक व समालोचक हैं। तिवारी जी की दो पुस्तकें, ’’मृत्यु कैसे होते है ? फिर क्या होता है ?’’ तथा ’’आनंद की राह’’ प्रभात प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हो चुकीं हैं।

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