आलेख : शिवलिंग या फव्वारा पर छिड़ी जंग - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 27 मई 2022

आलेख : शिवलिंग या फव्वारा पर छिड़ी जंग

एक-दो नहीं, नंदी, स्वास्तिक, कमल, देवी-देवताओं की नक्काशी समेत कई साक्ष्यों के बाद अब यह साबित हो चुका है सर्वे में मिला शिवलिंग ही बाबा विशेश्वर है। हालांकि सर्वे रिपोर्ट अभी कोर्ट में दाखिल नहीं है और रिपोर्ट के बगैर शिवलिंग कहना जल्दबाजी तो है ही, लेकिन सर्वे के दौरान मौजूद सिवाय मुस्लिम पक्ष के हर किसी की बॉडी लंग्वेज व हिन्दू पक्षकारों के दावे तो शिवलिंग की ही ओर इसारा कर रहे है। न्यायालय ने कुछ ऐसे ही संकेतों व दलीलों के आधिर पर वजू खाने वाले जगह पर मिली शिवलिंग ऐरिया को सील करा दिया है। यह अलग बात है वजू खाना सील होने के पर मुस्लिम पक्ष ने भी दावा किया है कि जिसे शिवलिंग बताया जा रहा है, वह एक फव्वारा है. यही नहीं, मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने इसकी फोटो भी वायरल कर दी। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही क्या यह शिवलिंग है या फव्‍वारा 

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फिरहाल, सर्वे के बाद ज्ञानवापी की लड़ाई सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गयी है। तीनों जगह सन सिर्फ सुनवाई हो रही है, बल्कि आदेश भी दिए जा रहे है। लेकिन मुस्लिम पक्ष द्वारा चार माह पुराना एक वीडियो वायरल किया जा रहा है कि यह शिवलिंग नहीं फव्वारा है और इसी बात को लेकर साधु संत से लेकर हर आम खास के बीच शिवलिंग के दावे पर संग्राम छिड़ा है। कई इतिहासकार मानते है कि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण गुप्तकाल के दौरान हुआ. मोहम्मद गौरी के आदेश पर मंदिर के कुछ हिस्से तोड़े गए. आखिरी दफा औरंगजेब ने मंदिर तोड़ दी और ज्ञानवापी मस्जिद उसकी जगह बनाई गई. हिंदू पक्ष के सोहनलाल ने कहा ’भगवान प्रकट हो गए हैं’. जबकि मुस्लिम पक्ष इसे खारिज कर रहा है और फव्वारा बता रहा है. उधर न्यायालय में सुनवाई के दौरान कोर्ट कमिश्नर ने दो दिन का समय और मांगा है। दलील दी गई कि वीडियो फुटेज 5 घंटे का है, जिसे देखकर पूरी रिपोर्ट बनाना थोड़ा समय लेने वाला काम है.  पक्षकार और याचिकाकर्ता सोहन लाल ने बताया कि मस्जिद में सर्वे के दौरान वे इस काम के लिए अधिकृत टीम के साथ अंदर गए थे। उन्‍होंने सर्वे के समय आंखों देखी चीजें बयान की हैं। उनके मुताबिक, मस्जिद में मिली आकृति को शिवलिंग साबित करना बहुत कठिन नहीं होगा। इसके सबूत चीख-चीख के खुद बोल रहे हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी उस जगह को संरक्षित करने का आदेश दिया है जहां शिवलिंग मिलने का दावा किया गया है। उन्‍होंने बताया कि इस बात को साफ-साफ देखा जा सकता है कि काले पत्‍थर पर ऊपर से कुछ सीमेंट से जोड़ा गया है। मस्जिद कमेटी के लोगों से जब पूछा गया कि अगर यह फव्‍वारा है तो इसे चालू कर दीजिए। इस पर उन्‍होंने जवाब दिया कि यह खराब है। जब पूछा गया कि कब से खराब है तो बताया गया कि वर्षों से। उसे पूरी तरह साफ करने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं मिला कि वहां पाइप से कुछ आ रहा है। न किसी अंडरग्राउंड पाइप का सुराग मिला। इस पर कमेटी के लोगों से पूछा गया क्‍या और कोई अंडरग्राउंड पाइप आता है तो उन्‍होंने कहा नहीं। उनसे कहा गया कि फिर यह फव्‍वारा कैसे हुआ। इसे लेकर उनका कहना था कि ऐसा बताया गया है।  सच तो यह है कि वहां पानी आने-जाने का कोई रास्‍ता नहीं था। सोहन लाल ने बताया कि सर्वे के दौरान जांच कमिश्‍नर विशाल सिंह मौजूद थे। वह झाड़ू की सींक खोजकर लाए। उन्‍होंने देखना चाहा कि ऊपर से यह कितना गहरा है। जब उन्‍होंने सींक को डाला तो वह सिर्फ 6 इंच अंदर चली गई। फिर लाइट मंगाई गई और फोटोग्राफी की गई। 6 इंच से ज्‍यादा कुछ नहीं था। इसका भी जवाब मस्जिद कमेटी के लोग नहीं दे सके। सोहन लाल ने बताया जहां से शिवलिंग मिला वहां 25 बाई 25 का वजूखाना है। वो पूरा पानी से लबालब भरा हुआ था। जैसे ही पानी खाली कराया गया यह शिवलिंग सरीखी आकृति उभरकर सामने आई। यहां ध्‍यान रखने वाली बात है कि पूरी साफ सफाई प्रशासनिक अधिकारियों ने कराई। एक प्रशासनिक अधिकारी ने इस बात पर गौर किया कि वह आकृति एक ही पत्‍थर से बनी हुई है। इसका रंग काला है। यह शिवलिंग सरीखा लगता है। शिवलिंग के ऊपर चौकोर तरीके से कुछ जोड़ा गया है। अगर उसे हटा दिया जाए तो वो पूरी तरह से शिवलिंग ही दिखाई पड़ता है।


औरंगजेब ने मंदिर तोड़ा इसके प्रमाण कई है 

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ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर तालाब है और उसी में औरंगजेब ने शिवलिंग फेकवा दिया था, इसका जिक्र कई इतिहासकारों ने किया है। एस आल्तेकर समेत कई इतिहासकारों का मानना है कि दो सितंबर, 1669 के दिन औरंगजेब ने विश्वेश्वर मंदिर का ध्वंस कर दिया। इसी की जगह मस्जिद बनाई गई। मंदिर में रखे शिवलिंग को इसी मस्जिद परिसर में छिपाने के लिए फेंक दिया गया। वाराणसी कोर्ट ने जब मां श्रृंगार गौरी की पूजा के लिए मिली अर्जी के बाद सर्वे के आदेश दिए तो ये सच्चाई सामने आ गई। सर्वे के तीसरे दिन तालाब से पानी पंप किया गया। तभी मुस्लिम पक्षकारों ने इसका विरोध किया। दलील थी कि मछलियां मर जाएंगी। ये बेतुका तर्क था। जब पानी हटाया गया तब कुएं जैसी रचना के बीच शिवलिंग का आकार दिखा। हिंदू पक्ष के मुताबिक इसका व्यास चार मीटर है और ऊंचाई तीन मीटर। अब सर्वे की रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी जा रही है। उधर सुप्रीम कोर्ट भी ज्ञानवाापी मस्जिद के अंदर सर्वे के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रहा है। देखना है कि कोर्ट के भीतर इतिहास की परतें किस करवट खुलती हैं। हिंदू पक्ष के वकील विष्‍णु जैन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष फव्वारे को शिवलिंग बताकर पूरे देश को गुमराह कर रहा है। फव्वारे और शिवलिंग के बीच का अंतर हमें पता है। उन्‍होंने कहा कि फव्वारा यदि होगा तो नीचे पूरा सिस्‍टम होगा पानी के निकलने का, लेकिन जिस तरह से उसका शिवलिंग का आकार है। उसमें कुछ डंडियां डाली गई थीं पर वो ज्‍यादा अंतर तक गई नहीं, तो शिवलिंग खंडित हुआ या नहीं यह तो मैं अ‍भी बहुत पुख्‍ता तौर पर नहीं बता सकता लेकिन मेरी और हिंदू पक्ष की नजर में वो एक शिवलिंग है। दावा यह भी है कि यह शिवलिंग नंदी के मुंह से उत्तर 84.3 फीट की दूरी पर स्थित है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि वजूखाना के नीचे 100 फीट ऊंचा आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करीब 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब ने साल 1664 में मंदिर को तुड़वा दिया। दावे में कहा गया है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़कर उसकी भूमि पर किया गया है जो कि अब ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में जाना जाता है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ज्ञानवापी परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कर यह पता लगाया जाए कि जमीन के अंदर का भाग मंदिर का अवशेष है या नहीं। साथ ही विवादित ढांचे का फर्श तोड़कर ये भी पता लगाया जाए कि 100 फीट ऊंचा ज्योतिर्लिंग स्वयंभू विश्वेश्वरनाथ भी वहां मौजूद हैं या नहीं। मस्जिद की दीवारों की भी जांच कर पता लगाया जाए कि ये मंदिर की हैं या नहीं। याचिकाकर्ता का दावा है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अवशेषों से ही ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ था। इन्हीं दावों पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करते हुए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की एक टीम बनाई। इस टीम को ज्ञानवापी परिसर का सर्वे करने के लिए कहा गया था,जो अब पूरा हो चुका है। 


अब तक क्या-क्या हुआ? 

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काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी केस में 1991 में वाराणसी कोर्ट में पहला मुकदमा दाखिल हुआ था। याचिका में ज्ञानवापी परिसर में पूजा की अनुमति मांगी गई। प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर की ओर से सोमनाथ व्यास, रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय बतौर वादी इसमें शामिल हैं। मुकदमा दाखिल होने के कुछ महीने बाद सितंबर 1991 में केंद्र सरकार ने पूजा स्थल कानून बना दिया। ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था। लेकिन ज्ञानवापी मामले में इसी कानून का हवाला देकर मस्जिद कमेटी ने याचिका को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्टे लगाकर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि किसी भी मामले में स्टे ऑर्डर की वैधता केवल छह महीने के लिए ही होगी। उसके बाद ऑर्डर प्रभावी नहीं रहेगा। इसी आदेश के बाद 2019 में वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई। 2021 में वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट से ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दे दी। आदेश में एक कमीशन नियुक्त किया गया और इस कमीशन को 6 और 7 मई को दोनों पक्षों की मौजूदगी में श्रृंगार गौरी की वीडियोग्राफी के आदेश दिए गए। 10 मई तक अदालत ने इसे लेकर पूरी जानकारी मांगी थी। छह मई को पहले दिन का ही सर्वे हो पाया था, लेकिन सात मई को मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध शुरू कर दिया। मामला कोर्ट पहुंचा। 12 मई को मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने कमिश्नर को बदलने की मांग खारिज कर दी और 17 मई तक सर्वे का काम पूरा करवाकर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि जहां, ताले लगे हैं, वहां ताला तुड़वा दीजिए। अगर कोई बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करता है तो उसपर कानूनी कार्रवाई करिए, लेकिन सर्वे का काम हर हालत में पूरा होना चाहिए। 14 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिका में ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने से इनकार करते हुए कहा था कि हम बिना कागजात देखे आदेश जारी नहीं कर सकते हैं। अब मामले में 17 मई को सुनवाई होगी। 14 मई से ही ज्ञानवापी के सर्वे का काम दोबारा शुरू हुआ। सभी बंद कमरों से लेकर कुएं तक की जांच हुई। इस पूरे प्रक्रिया की वीडियो और फोटोग्राफी भी हुई। 16 मई को सर्वे का काम पूरा हुआ। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि कुएं से बाबा मिल गए हैं। इसके अलावा हिंदू स्थल होने के कई साक्ष्य मिले। वहीं, मुस्लिम पक्ष ने कहा कि सर्वे के दौरान कुछ नहीं मिला। 


1194 से 1669 के बीच ज्ञानवापी  ने झेले हैं कई झंझावात

भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अंतर्गत अल्तेकर की पुस्तक में उल्लेखित तथ्य व चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा विश्वनाथ मंदिर के लिंग की सौ फीट उंचाई और उस पर निरंतर गिरती गंगा की धारा के संबंध में उल्लेख है। पौराणिक स्थली ज्ञानवापी का सच इतिहास के पन्नों में दर्ज है जो गवाही देते हैं कि किस तरह इस तीर्थ स्थली ने 1194 से 1669 के बीच कई झंझावात झेले। इसका उल्लेख काशी हिंदू विश्वविद्यालय व पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे ख्यात इतिहासकार डा. अनंत सदाशिव अल्तेकर की वर्ष 1936 में प्रकाशित पुस्तक हिस्ट्री आफ बनारस में प्रमुखता से है। इसे ज्ञानवापी मामले में संदर्भ के तौर पर पेश किया जा चुका है। इसमें मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदुओं के धार्मिक स्थलों को तहस-नहस करने का विवरण भी दर्ज है। पुस्तक के अध्याय चार में वर्णन है कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर की वजह से बनारस दो हजार साल पहले से ख्याति प्राप्त है। पौराणिक साक्ष्य बताते हैं कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानकूप के उत्तर तरफ स्थित है। इस मंदिर को 1194 से 1669 के बीच कई बार तोड़ा गया। ज्ञानवापी के झंझावात नारायण भट्ट लिखित पुस्तक त्रिस्थली सेतु में भी वर्णित हैं। इसमें वर्णन है कि यदि कोई मंदिर तोड़ दिया गया हो और वहां से शिवलिंग हटा दिया गया हो या नष्ट कर दिया गया हो तब भी स्थान महात्म्य की दृष्टि से वह स्थान विशेष पूजनीय है। इसकी परिक्रमा करके पूजा-अभिषेक संपन्न किया जा सकता है। 15वीं शताब्दी में अकबर के कार्यकाल में पुनरुद्धारः 15वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के कार्यकाल में राजा मान सिंह और राजा टोडरमल द्वारा मंदिर का पुनरुद्धार कराया गया था। डा. अल्तेकर की पुस्तक में कहा गया है कि अकबर के शासन काल में बनारस की स्थिति बदली और 1567 में शांति व्यवस्था कायम हुई। सात मार्च 2020 को इससे जुड़े दस्तावेज और 23 छाया चित्र कोर्ट में पेश किए गए थे। परमात्मा शरण की गवाही से खारिज हो गई थी दावेदारीः कागजातों के अनुसार 1936 में चले मुकदमे में प्रो. एएस अल्तेकर समेत कई लोगों के बयान हुए। इसमें यूनिवर्सिटी आफ लंदन के बनारसी मूल के इतिहासकार प्रो. परमात्मा शरण ने 14 मई 1937 को अतिरिक्त सिविल ब्रिटिश सरकार की ओर से बतौर साक्षी बयान दिया। उन्होंने औरंगजेब के दरबार के इतिहास लेखक मुश्तैद खां द्वारा लिखित ‘मा आसिरे आलम गिरि’ पेश करते हुए बताया था कि यह 16वीं शताब्दी के अंतिम चरण में एक मंदिर था। 1936 में पूरे ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को लेकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जिला न्यायालय में दायर किया गया था मुकदमा 7 गवाह दावेदारों की ओर से और 15 गवाह ब्रिटिश सरकार की ओर से पेश किए गए थे। 15 अगस्त 1937 को मस्जिद के अलावा अन्य ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को नामंजूर कर दिया गया था। 10 अप्रैल 1942 को सब जज के फैसले को सही ठहराते हुए अपील निरस्त कर दी थी हाई कोर्ट ने (इसका उल्लेख एआइआर (29) 1942 एएलएएबीएडी 353 में है) 15 अक्टूबर 1991 को वाराणसी की अदालत में ज्ञानवापी में नव मंदिर निर्माण और हिंदुओं को पूजन-अर्चन का अधिकार को लेकर पं. सोमनाथ व्यास, डा. रामरंग शर्मा व अन्य ने वाद दायर किया था। 1998 में हाईकोर्ट में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद व यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ की ओर से दो याचिकाएं दायर की गई थी इस आदेश के खिलाफ, 7 मार्च 2000 को पं.सोमनाथ व्यास की मृत्यु हो गई। 11 अक्टूबर 2018 को पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी को वाद मित्र नियुक्त किया मामले की पैरवी के लिए। 8 अप्रैल 2021 को वाद मित्र की अपील मंजूर कर पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने का आदेश जारी कर दिया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57 (13) के तहत सामान्य इतिहास की पुस्तकों में भी वर्णित ऐतिहासिक तथ्य को साक्ष्य के तौर पर मान्यता है।




--सुरेश गांधी--

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