भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और एकत्र होने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। किंतु संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि इन अधिकारों का प्रयोग लोक व्यवस्था, नैतिकता और दूसरे नागरिकों के अधिकारों के अधीन होगा। यही वह संवैधानिक संतुलन है जिसे आज सबसे अधिक समझने की आवश्यकता है। जंतर-मंतर पर जुटने वाले अधिकांश युवा रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती में देरी, शिक्षा व्यवस्था और अन्य जनसरोकारों से जुड़े प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र में ऐसे आंदोलनों की अपनी महत्ता है। इतिहास गवाह है कि अनेक नीतिगत परिवर्तन जनता के शांतिपूर्ण दबाव के बाद ही संभव हुए हैं। दूसरी ओर कांवड़ यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। उत्तर भारत में लाखों शिवभक्त गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अभिषेक करते हैं। यात्रा के दौरान हजारों सेवा शिविर, निःशुल्क भोजन, चिकित्सा सहायता और सामाजिक सहयोग देखने को मिलता है। यह भारतीय संस्कृति की सेवा-परंपरा का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। लेकिन दोनों ही गतिविधियों के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ जुड़ी हुई हैं। बड़े आंदोलनों के दौरान सड़क जाम, प्रशासनिक दबाव और कभी-कभी हिंसा की घटनाएँ सामने आती हैं। वहीं विशाल धार्मिक यात्राओं के समय लंबा ट्रैफिक जाम, ध्वनि प्रदूषण, दुर्घटनाएँ तथा कुछ स्थानों पर कानून-व्यवस्था संबंधी घटनाएँ भी समाचारों में आती रही हैं। अधिकांश श्रद्धालु और प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण रहते हैं, किंतु कुछ लोगों की अनुशासनहीनता पूरे आयोजन की छवि को प्रभावित कर देती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में भारत में लगभग 1.99 लाख लोगों की मृत्यु यातायात दुर्घटनाओं में हुई, अर्थात औसतन प्रतिदिन 546 लोगों की जान सड़क दुर्घटनाओं में गई। ऐसे आँकड़े यह संकेत देते हैं कि किसी भी बड़े सार्वजनिक आयोजन में सड़क सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी कारण विभिन्न राज्यों की पुलिस और प्रशासन अब बड़े आयोजनों के दौरान दुर्घटनामुक्त व्यवस्था पर विशेष बल दे रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कांवड़ यात्रा के लिए अधिकारियों को जीरो इंसिडेंट, जीरो एक्सीडेंट को संचालन का लक्ष्य बनाने का निर्देश दिया, जिससे श्रद्धालुओं और आम नागरिकों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। संवैधानिक विशेषज्ञ प्रो. उपेन्द्र बक्षी का कहना है कि मौलिक अधिकार कभी निरपेक्ष नहीं होते, प्रत्येक अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। इसका अर्थ है कि न तो प्रदर्शन के नाम पर हिंसा स्वीकार्य हो सकती है और न ही धार्मिक आस्था के नाम पर कानून हाथ में लेना। लोक प्रशासन के विद्वान डॉ. पॉल एच. एप्पलबी ने प्रशासन का मूल उद्देश्य जनसुविधा और लोककल्याण बताया था। इसी भावना के अनुरूप प्रशासन का दायित्व है कि वह आंदोलनों और धार्मिक आयोजनों दोनों का ऐसा प्रबंधन करे जिससे नागरिक जीवन न्यूनतम प्रभावित हो। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन लोकतंत्र को केवल मतदान नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श की व्यवस्था मानते हैं। उनके अनुसार नागरिकों की आवाज सुनना और समस्याओं का समाधान करना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता भी तभी सार्थक है जब वह सामाजिक सौहार्द्र और पारस्परिक सम्मान को मजबूत करे। महात्मा गांधी ने कहा था, अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य का पालन करे तो अधिकारों के टकराव की नौबत बहुत कम आएगी। यही संदेश जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों और कांवड़ यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने दोनों प्रकार की घटनाओं को तीव्र गति से प्रसारित किया है। दुर्भाग्य से कुछ हिंसक या विवादास्पद घटनाएँ पूरे समुदाय की छवि पर हावी हो जाती हैं। किसी एक प्रदर्शन में हुई तोड़फोड़ से सभी प्रदर्शनकारियों को हिंसक नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार कुछ कांवड़ियों की अनुशासनहीनता के आधार पर पूरी कांवड़ यात्रा का मूल्यांकन भी न्यायसंगत नहीं होगा। मीडिया और समाज दोनों को इस संतुलन का ध्यान रखना चाहिए। जनहित का मूल सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ से दूसरे नागरिक की स्वतंत्रता प्रारंभ होती है। यदि कोई आंदोलन अस्पताल जाने वाले व्यक्ति को घंटों जाम में फँसा दे या कोई धार्मिक आयोजन आम नागरिकों की सुरक्षा और आवागमन को गंभीर रूप से प्रभावित करे, तो प्रशासन को संवैधानिक दायित्व निभाते हुए संतुलित हस्तक्षेप करना ही चाहिए।
जनहित में आवश्यक कदम
1.आंदोलनों के लिए पूर्व निर्धारित स्थान और समय का पालन अनिवार्य बनाया जाए।
2.धार्मिक यात्राओं के लिए वैज्ञानिक ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्ग, चिकित्सा शिविर और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था हो।
3.सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों पर, चाहे वे किसी भी विचारधारा या धर्म से जुड़े हों, समान कानूनी कार्रवाई हो।
4.सरकार युवाओं के रोजगार, भर्ती और शिक्षा संबंधी मुद्दों पर समयबद्ध संवाद स्थापित करे।
5.धार्मिक संगठनों को स्वयंसेवकों के माध्यम से अनुशासन, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का अभियान चलाना चाहिए।
6.मीडिया सनसनी से अधिक तथ्यपरक और संतुलित रिपोर्टिंग को प्राथमिकता दे।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। यहाँ विरोध भी है, विश्वास भी, आंदोलन भी हैं और आस्था भी। लोकतंत्र और धर्म दोनों का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब दोनों कानून, अनुशासन और जनहित की मर्यादा में संचालित हों। जंतर-मंतर का उद्देश्य यदि जनसमस्याओं का समाधान है और कांवड़ यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक आस्था की अभिव्यक्ति, तो दोनों का स्वागत होना चाहिए। किंतु यदि किसी भी पक्ष से हिंसा, तोड़फोड़, अराजकता या दूसरे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह जनहित नहीं, बल्कि संविधान की भावना के विपरीत है। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष का समर्थन या विरोध करने की नहीं, बल्कि ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करने की है जहाँ अधिकार और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें। यही भारत के लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही जनहित की सर्वोच्च कसौटी भी।
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें