पटना : कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने सारण एवं वैशाली जिलों में प्रारंभिक बाढ़ क्षति का आकलन किया - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

पटना : कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने सारण एवं वैशाली जिलों में प्रारंभिक बाढ़ क्षति का आकलन किया

Aggriculture-team-visit-flood-area
पटना, 23 सितम्बर, (रजनीश के झा) । डॉ. अनुप दास, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर के मार्गदर्शन में संस्थान के तीन वैज्ञानिकों की बहुविषयक टीम —डॉ. अजय कुमार, डॉ. रोहन कुमार रमण एवं डॉ. राकेश कुमार ने 22 सितंबर 2026 को सारण एवं वैशाली जिलों के बाढ़ प्रभावित गांवों का क्षेत्रीय दौरा किया। टीम ने गंगा एवं गंडक नदियों के बाढ़ के पानी से कृषि फसलों, बागवानी फसलों तथा कुछ हद तक पशुधन पर पड़े प्रभाव का प्रारंभिक आकलन किया।


Aggriculture-team-visit-flood-area
सारण जिले के हसनपुर, गोपालपुर एवं रसूलपुर गांवों में धान, मक्का, भिंडी, नेनुआ एवं लौकी की फसलों का अवलोकन किया गया। 10–15 दिनों तक 4–5 फीट पानी के जलभराव के कारण सब्जी फसलों को गंभीर से लेकर पूर्ण क्षति हुई, जो 100 प्रतिशत तक आंकी गई। खेत की स्थिति के आधार पर मक्का की फसल में लगभग 60–90 प्रतिशत तक क्षति देखी गई। 1–2 फीट तक पानी के जमाव वाले धान के खेतों में पौधों की संख्या कम एवं असमान पाई गई, जिससे संभावित उपज हानि का संकेत मिलता है। 


वैशाली जिले के अकिलाबाद एवं बकापुर गांवों में मुख्यतः केले की खेती की जाती है। लगभग 12–18 दिनों तक 2–4 फीट पानी के जलभराव से केले के पौधों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। इससे पौधों की वृद्धि, फलों के आकार, घौद के वजन तथा बाजार योग्य उपज में कमी आने की संभावना है। जिन केले के बागानों को अधिक नुकसान हुआ है, वहां पौधों और जड़ों की स्थिति देखकर दोबारा पौधे लगाने की जरूरत पड़ सकती है। लीची के पेड़ कुछ समय तक पानी में रहने को सहन कर सकते हैं। अभी ये शुरुआती जानकारी है। फसल और किसानों को हुए नुकसान का सही आकलन करने के लिए खेतों का विस्तृत सर्वेक्षण करना जरूरी है।

कोई टिप्पणी नहीं: