- चार अंकों की पहचान बताएगी चालक की पूरी कुंडली, सामान छूटे तो तलाश आसान—यात्री सुरक्षा के साथ जवाबदेही भी तय
सवारी उतरी और सामान छूटा तो कोड बनेगा सहारा
यात्री अक्सर ऑटो से उतरते समय मोबाइल, बैग, पर्स अथवा जरूरी सामान भूल जाते हैं। कई बार वाहन का नंबर याद नहीं रहता, जिससे उसे तलाशना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ऑटो पर प्रदर्शित चार अंकों का विशिष्ट कोड याद रह जाए तो पुलिस के लिए संबंधित वाहन और चालक तक पहुंचना आसान हो सकता है। यही व्यवस्था दुर्घटना, विवाद या किसी आपराधिक घटना की स्थिति में भी उपयोगी हो सकती है। उज्जैन में इस दिशा में पुलिस रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से अपडेट करने की व्यवस्था की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार चालक के लाइसेंस और अन्य विवरण को यूनिक नंबर से जोड़ने का उद्देश्य वाहन की पहचान और यातायात प्रबंधन को आसान बनाना है।
यात्री के लिए सिर्फ नंबर, पुलिस के पास पूरी जानकारी
इस व्यवस्था की खासियत यह हो सकती है कि सार्वजनिक रूप से केवल चार अंकों का कोड दिखाई दे, जबकि पुलिस के डिजिटल रिकॉर्ड में उसी कोड से चालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, वाहन नंबर, लाइसेंस और सत्यापन संबंधी विवरण जुड़ा रहे। इससे यात्री को चालक की निजी जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की जरूरत भी नहीं होगी और शिकायत की स्थिति में पुलिस के पास पहचान का तत्काल आधार रहेगा।उज्जैन में रेलवे क्षेत्र में यात्रियों के लिए एक अलग सत्यापन पहल में क्यूआर कोड के जरिए चालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, वाहन पंजीयन, लाइसेंस और पुलिस सत्यापन जैसी जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी शुरू की गई है।
यूपी में क्यों जरूरी है ऐसी व्यवस्था?
उत्तर प्रदेश के काशी, अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, प्रयागराज, विंध्याचल और अन्य धार्मिक-पर्यटन केंद्रों में रोजाना बड़ी संख्या में बाहर से यात्री पहुंचते हैं। अनजान शहर में यात्री ऑटो चालक की पहचान से अनभिज्ञ रहता है। ऐसे में ऑटो की एक नजर आने वाली विशिष्ट पहचान यात्री और पुलिस—दोनों के लिए सुरक्षा कवच बन सकती है।यूपी पुलिस भी कई स्थानों पर ऑटो-ई-रिक्शा पर चालक का नाम, मोबाइल नंबर और पता अंकित करने तथा रूट नंबर स्पष्ट करने के निर्देश दे चुकी है।
चार अंक का कोड बने ‘सुरक्षा नंबर’
यूपी में परिवहन विभाग और पुलिस मिलकर प्रत्येक ऑटो-ई-रिक्शा का सत्यापन कर उसे चार अंकों का यूनिक कोड दे सकते हैं। कोड वाहन के आगे, पीछे और अंदर स्पष्ट रूप से लिखा जाए। इसके साथ क्यूआर कोड की सुविधा भी जोड़ी जा सकती है। यात्री के लिए याद रखना आसान, पुलिस के लिए पहचानना आसान और चालक के लिए जवाबदेही तय।
एक कोड से तीन फायदे
सुरक्षा: यात्री को वाहन की पहचान का भरोसा।
सामान की वापसी: ऑटो में छूटा सामान मिलने पर वाहन की तलाश आसान।
अपराध नियंत्रण: शिकायत या घटना होने पर चालक तक पहुंचने में पुलिस को मदद।
काशी से उठे यूपी के लिए सुझाव
उज्जैन की व्यवस्था को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब धार्मिक नगरी में यात्रियों की सुरक्षा के लिए ऑटो को विशिष्ट पहचान से जोड़ा जा सकता है, तो काशी समेत यूपी के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन शहरों में ऐसा प्रयोग क्यों न हो? ‘ऑटो कोड’ महज चार अंक नहीं—यात्री की सुरक्षा, चालक की पहचान और पुलिस की जवाबदेही को जोड़ने वाली एक छोटी लेकिन प्रभावी कड़ी बन सकता है।

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