ग्रंथ का साहित्यिक इतिहास हमें मिथक एवं किंवदंती अथवा पुरातन काल की पूर्वपीठिका से लेकर बीसवीं और इक्कीसवीं सदी तक ले जाता है। कोसी क्षेत्र की आरंभिक साहित्यिक चेतना में ब्रजभाषा, मैथिली, बांग्ला और लोकभाषाओं का प्रभाव दिखाई देता है। आगे चलकर खड़ी बोली हिंदी का विकास हुआ और राष्ट्रीय चेतना, छायावाद तथा आधुनिक हिंदी की विविध प्रवृत्तियाँ इस अंचल की रचनाशीलता में प्रवेश करती गईं। यह संक्रमण अचानक नहीं था; राजपरिवारों, शिक्षित वर्ग, पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं ने इसके निर्माण में भूमिका निभाई।ग्रंथ में राजा कमलानंद सिंह ‘साहित्य सरोज’, श्यामसुंदर, गोपी महाराज, जगदीश कवि, मनमोहन महाराज जैसे आरंभिक कवियों से लेकर रामदेनी तिवारी ‘द्विजदेनी’, जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, अशरफी लाल वर्मा, जीवत्स शर्मा ‘हिमांशु’, लक्ष्मी नारायण सुधांशु, रामनारायण सिंह ‘आनंद’, महर्षि मेंहीं, हरिचरणदास आदि तक अनेक रचनाकारों की साहित्यिक उपस्थिति का परिचय मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि कोसी की साहित्यिक परंपरा किसी एक विधा, भाषा या विचारधारा तक सीमित नहीं रही।विशेष रूप से जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ की राष्ट्रीय चेतना, रामदेनी तिवारी ‘द्विजदेनी’ की स्वतंत्रता-चेतना और महर्षि मेंहीं की संत-साहित्य परंपरा इस अंचल की विविध साहित्यिक धाराओं को सामने लाती है। इसी क्रम में पुस्तक आधुनिक शिक्षा, हिंदी पत्रकारिता, साहित्यिक संस्थाओं और जनजीवन के विस्तार के साथ कोसी की साहित्यिक चेतना में आए परिवर्तनों को भी रेखांकित करती है।कोसी अंचल का साहित्य केवल राजदरबारों या अभिजात साहित्यिक परिवेश की देन नहीं रहा। किसान, श्रमिक, संत, शिक्षक, स्वतंत्रता सेनानी और सामान्य जनजीवन भी इसकी रचनात्मक चेतना के स्रोत रहे हैं। यही कारण है कि इस भूभाग का साहित्य अपनी स्थानीय स्मृतियों, लोकजीवन, सामाजिक संघर्षों और बदलते समय को अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त करता है।स्वातंत्र्योत्तर काल में फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी, मायानंद मिश्र, मधुकर गंगाधर, शांति सुमन, डॉ. बेचन, रामधारी सिंह दिवाकर, चंद्र किशोर जायसवाल, हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ, नरनारायण राय, विजयकांत, सुरेंद्र स्निग्ध आदि की चर्चित कृतियों ने कोसी अंचल की रचनात्मकता को व्यापक स्वीकृति और पहचान दी है।इस ग्रंथ का एक बड़ा महत्त्व यह है कि इसमें साहित्य के
केंद्र और हाशिये के बीच की दूरी कम करने का प्रयास
दिखाई देता है। जिन अनेक रचनाकारों की जानकारी बिखरे हुए स्थानीय स्रोतों, पत्र-पत्रिकाओं, स्मृतियों और दुर्लभ पुस्तकों में उपलब्ध थी, उन्हें एक संदर्भ-कोश में समेटना अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य कार्य है। समकालीन समय में भी कोसी की रचनाशीलता पर शोध और विमर्श जारी है।देवेंद्र कुमार देवेश स्वयं भी कोसी की साहित्यिक गतिविधियों और युवा रचनाशीलता से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। उदाहरण के लिए, ‘संवदिया’ के युवा हिंदी कविता विशेषांक के अतिथि संपादक के रूप में उन्होंने 92 युवा कवियों को मंच दिया था। इससे ‘कोसी शोध-साहित्य-संदर्भ-कोश’ को केवल बाहरी शोधकर्ता की परियोजना के बजाय अपने साहित्यिक भूगोल के भीतर से तैयार किया गया दस्तावेज समझने में मदद मिलती। निष्कर्ष ‘कोसी शोध-साहित्य-संदर्भ- कोश’ का सबसे बड़ा मूल्य इस बात में है कि यह कोसी की साहित्यिक स्मृति को बिखरे हुए स्रोतों से निकालकर एक ग्रंथाकार रूप प्रदान करती है। नदी की तरह जिसकी धाराएँ बदलती रही हैं, उसी तरह इस अंचल की साहित्यिक धाराएँ भी समय, भाषा, समाज और इतिहास के साथ बदलती रही हैं। देवेंद्र कुमार देवेश ने उन अनेक धाराओं को एक जगह लाने का गंभीर और श्रमसाध्य प्रयास किया है।इस दृष्टि से यह पुस्तक कोसी के साहित्य का परिचय-ग्रंथ, शोधार्थियों के लिए संदर्भ-सामग्री और आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्यिक स्मृति-दस्तावेज- तीनों भूमिकाएँ निभाती है। आठ सौ से अधिक रचनाकारों को एक ही ग्रंथ में स्थान देना इसके व्यापक परिश्रम और संकलन-व्याप्ति को रेखांकित करता है। कुछ प्रविष्टियों पर भविष्य में अधिक विस्तृत आलोचनात्मक अध्ययन की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इतने बड़े साहित्यिक भूगोल को एक साथ दर्ज कर देना ही अपने आप में उल्लेखनीय उपलब्धि है।अंततः, ‘कोसी शोध-साहित्य-संदर्भ-कोश’ को केवल पढ़ने की नहीं, सुरक्षित रखने और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की पुस्तक कहा जा सकता है। यह कोसी की मिट्टी, स्मृति, भाषा और रचनाशीलता का एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अभिलेख है।
कोसी शोध-साहित्य-संदर्भ-कोश
समीक्षक - अरविन्द श्रीवास्तव
ग्रन्थ - कोसी शोध - साहित्य - संदर्भ - कोश
लेखक : डॉ. देवेंद्र कुमार देवेश
प्रकाशक : विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली -110032.मोबाइल - 9910189445.मूल्य - 995/ ₹
प्रथम संस्करण : 2026

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