हालांकि, बाद में ऑनलाइन फॉर्म-6 में नए मतदाता आवेदनों को एसआईआर से जोड़ने वाली एक घोषणा शामिल कर दी गई।रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में संधू ने आपत्ति दर्ज करायी कि यह बदलाव ‘‘अनधिकृत और अवैध’’ है तथा इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। रावत ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयुक्तों ने जो कहा है कि फॉर्म-6 में गलत तरीके से संशोधन किया गया, कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं है, उनकी राय नहीं ली गई और कोई बैठक नहीं हुई- ये बहुत गंभीर आरोप हैं। जिस तरह फॉर्म-6 में संशोधन किया गया है, वह गलत है। यह पूरी तरह गलत और अवैध है।’’ उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस पर नियंत्रण को कथित तौर पर केंद्रीकृत किए जाने की भी कड़ी आलोचना की। रिपोर्ट के अनुसार, स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की निगरानी में बदलाव को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन से अलग-अलग संपर्क किया। रावत ने कहा, ‘‘अगर सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि क्षेत्रीय अधिकारी किसी बदलाव को जरूरी मानते हों, लेकिन वे असहाय हों क्योंकि सॉफ्टवेयर उन्हें बदलाव करने की अनुमति नहीं देता, तो यह पूरी तरह अवैध और गलत है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘किसी को भी सभी शक्तियों पर एकाधिकार रखने और यह कहने का अधिकार नहीं है कि हम सॉफ्टवेयर बनाएंगे और सॉफ्टवेयर जो कहेगा, वही करना होगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और ऐसा कभी होना भी नहीं चाहिए।’’
रावत ने कहा कि इन घटनाक्रमों से एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच निर्वाचन आयोग पर जनता के भरोसे को और नुकसान पहुंचने का खतरा है। उन्होंने कहा, ‘‘जिस संस्था पर लोगों ने भरोसा किया है और जिसने हमेशा स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराए हैं, उस पर उनका भरोसा पूरी तरह टूटता जा रहा है।’’ रावत ने कहा कि संवैधानिक संस्था के सदस्यों के रूप में दोनों निर्वाचन आयुक्तों की भी जिम्मेदारी थी कि वे उन कार्रवाइयों को रोकें जिन्हें वे अनुचित मानते हैं।उन्होंने कहा, ‘‘यह सवाल भी उठेगा कि वे 10 महीने तक चुप क्यों रहे। उन्होंने पहले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया? वे भी एक संवैधानिक संस्था के पदाधिकारी हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि एक भी गलती न होने दें।’’ संधू और जोशी में से किसी ने भी सामने आए मतभेदों या अपनी आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित किया जाना जरूरी है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाता है। बहरहाल, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने बुधवार को कहा कि एसआईआर से जुड़े फैसलों समेत आयोग के सभी फैसले मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति से और तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

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