- धवारी मल्हान टोला से निकली गणपति विसर्जन शोभायात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब, अबीर-गुलाल से रंगी सड़कें, ढोल-डीजे की थाप पर थिरकते कदम
घर की चौखट से फूलों की बारिश
विसर्जन यात्रा जिस रास्ते से गुजरती, दोनों ओर खड़े लोग श्रद्धा से उसका स्वागत करते नजर आए। कई घरों की चौखट पर महिलाएं और बुजुर्ग हाथ जोड़कर खड़े रहे। जुलूस के सामने आते ही फूलों की बारिश शुरू हो जाती। राह चलते लोग भी कुछ क्षण के लिए रुकते, शीश झुकाते और बप्पा का आशीर्वाद लेते। सड़क पर चल रहे अनजान लोग भी इस भक्ति-उत्सव का हिस्सा बनते चले गए। बारिश से भीगे कपड़ों और गुलाल से रंगे चेहरों पर गजब का उत्साह था। ऐसा लग रहा था मानो हर भक्त के लिए बप्पा की विदाई केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने परिवार के किसी प्रिय सदस्य को विदा करने जैसा भावुक अवसर हो।
हर साल सजता है बप्पा का दरबार
इस भव्य आयोजन के पीछे दिलीप जायसवाल और उनके पुत्र विशाल जायसवाल एवं विकास जायसवाल की वर्षों से चली आ रही आस्था और परंपरा जुड़ी है। परिवार की ओर से हर साल गणपति की स्थापना की जाती है। पूजा-अर्चना के बाद भंडारा, रात्रि जागरण और फिर सुबह से निकलने वाली शोभायात्रा इस आयोजन की खास पहचान बन चुकी है। इस बार भी बप्पा की स्थापना से लेकर विसर्जन यात्रा तक पूरे आयोजन में श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रहा। भंडारे में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया और रात्रि जागरण में भक्तिमय माहौल में रात गुजरी। सुबह यात्रा निकली तो धीरे-धीरे इसमें श्रद्धालुओं का कारवां जुड़ता गया।
बारिश में भी नहीं थमे कदम
विसर्जन यात्रा आगे बढ़ रही थी और उसके साथ मानो सतना की धड़कन भी चल रही थी। कहीं ढोल की थाप तेज होती तो युवा गोल बनाकर नाचने लगते। कहीं महिलाएं भक्ति गीतों पर झूम उठतीं। अबीर-गुलाल की फुहार के बीच बारिश की बूंदें मिलकर सड़क पर ऐसा रंग रच रही थीं, जिसे कैमरे में कैद करना आसान था, लेकिन उसकी अनुभूति शब्दों में बांधना मुश्किल। बारिश शरीर को भिगो रही थी, लेकिन बप्पा की भक्ति दिलों को गर्माए हुए थी।
बीकानेर एक्सप्रेस पर आत्मीय स्वागत
विसर्जन यात्रा के दौरान बीकानेर एक्सप्रेस रेस्टोरेंट पर जुलूस में शामिल श्रद्धालुओं का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। यहां भक्तों के लिए विशेष स्वागत-सत्कार का इंतजाम रहा। यात्रा में शामिल लोगों ने इसे आत्मीयता से स्वीकार किया और कुछ पल रुककर आयोजन की इस आत्मीय परंपरा का हिस्सा बने। जुलूस धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ता रहा। रास्ता बदलता गया, भीड़ आगे बढ़ती गई, लेकिन जयकारों की गूंज कम नहीं हुई। विदाई की बेला थी, आंखों में बिछड़ने का भाव था और जुबां पर अगले बरस फिर आने का भरोसा— ‘गणपति बप्पा मोरया... अगले बरस तू जल्दी आ।’
बप्पा की विदाई, साथ छोड़ गई एक सीख, उत्सव से एकजुटता तक
गणपति स्थापना से विसर्जन तक का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा। पूजा, भंडारा, जागरण और सामूहिक शोभायात्रा ने मोहल्ले के लोगों को एक साझा मंच दिया।
आस्था के साथ अनुशासन
बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह बना रहा। जुलूस में शामिल लोगों ने रास्तेभर एक-दूसरे का साथ निभाया और श्रद्धा के साथ बप्पा को विदाई देने की परंपरा को आगे बढ़ाया।
चौखट से सड़क तक सहभागिता
जो लोग जुलूस में शामिल नहीं हो सके, उन्होंने घरों और प्रतिष्ठानों के सामने खड़े होकर फूल बरसाकर अपनी आस्था व्यक्त की। इस तरह पूरा मार्ग ही स्वागत-स्थल बन गया।
एक विदाई, अगले वर्ष की प्रतीक्षा
विसर्जन के साथ उत्सव भले विराम लेता है, लेकिन भक्तों के मन में अगले वर्ष फिर गणपति स्थापना और उसी उल्लास के लौटने की उम्मीद छोड़ जाता है।
बप्पा के साथ सेल्फी का जुनून, यादों में कैद होती रही विदाई
विसर्जन यात्रा के दौरान भक्ति के साथ सेल्फी और फोटो सेशन का दौर भी खूब चला। युवा ही नहीं, महिलाएं और परिवार भी जुलूस के बीच बप्पा के साथ तस्वीरें लेते नजर आए। बारिश और गुलाल से भीगे चेहरों के बीच हर कोई इस खास पल को मोबाइल कैमरे में सहेज लेना चाहता था। कहीं दोस्तों की टोली ने सामूहिक फोटो खिंचाई तो कहीं परिवार के सदस्यों ने बप्पा के साथ सेल्फी लेकर इस विदाई को यादगार बनाया। कई लोग जुलूस के साथ चलते हुए वीडियो और फोटो बनाते रहे। भक्ति के बीच कैमरों की चमक ने विसर्जन यात्रा के उत्सव को यादों का हिस्सा बना दिया।

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