श्राद्ध केवल तर्पण-पिंडदान नहीं, जीवमात्र के प्रति करुणा का संस्कार भी है. कौवे की कांव से लेकर गाय की आंखों तक में पितृ-स्मरण की परंपरा आज भी सनातन का जीवंत चित्रण है. खास यह है कि काशी में गंगा की लहरें जब शांत होकर घाटों को छूती हैं, तब पितृपक्ष में उनकी अंजुलियों में केवल जल नहीं रहता, उसमें पीढ़ियों की स्मृतियां भी उतर आती हैं। कोई पिता को याद करता है, कोई मां को, तो कोई उन पुरखों को जिन्हें उसने देखा तक नहीं, लेकिन जिनकी विरासत में उसका वर्तमान सांस ले रहा है. पितृपक्ष इसी अदृश्य रिश्ते को महसूस करने का अवसर है। इस वर्ष 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के बाद 27 सितंबर से तिथि आधारित श्राद्ध शुरू होंगे। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितरों को समर्पित यह अवधि पूरी होगी। श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और अन्नदान की परंपरा है। काशी में गंगा तट पर तर्पण को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। जल में काले तिल और कुश के साथ पितरों का स्मरण करते हुए अर्पित की गई अंजुलि मानो अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु बन जाती है. इस दौरान श्राद्धकर्ता भोजन का अंश कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों के लिए भी निकालते हैं। यह परंपरा बताती है कि पितृस्मरण केवल अपने पूर्वजों तक सीमित नहीं, बल्कि समूचे जीव-जगत के प्रति संवेदना का संस्कार भी है. पितृपक्ष का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—जड़ों को याद रखिए, क्योंकि जिनसे हमारा अतीत बना, उन्हीं से हमारा वर्तमान भी आकार पाता है
एक अंजुलि जल, अनगिनत स्मृतियां
श्राद्ध का सबसे सरल और सबसे मार्मिक विधान है—तर्पण। जल में काले तिल और कुश के साथ पूर्वजों का स्मरण करते हुए अंजुलि भर जल अर्पित करना। जल बहता है, लेकिन स्मृति को अपने साथ नहीं बहाता। उलटे वह उसे और गहरा कर देता है। यही कारण है कि गंगा किनारे पितरों के लिए उठी हर अंजुलि में केवल जल नहीं, बल्कि किसी बेटे की श्रद्धा, किसी बेटी की स्मृति, किसी पत्नी का मौन और किसी परिवार की कृतज्ञता भी दिखाई देती है। धार्मिक परंपरा में पितृकर्म के लिए मध्याह्न और अपराह्न काल को विशेष महत्व दिया गया है। कुतुप और रौहिण मुहूर्त में श्राद्ध करने की परंपरा है। हालांकि वास्तविक समय स्थान और तिथि के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार ही कर्मकांड का समय निर्धारित करना उचित माना जाता है।
पितरों की थाली में जीवों का हिस्सा
पितृपक्ष का सबसे सुंदर पक्ष शायद यही है कि पूर्वजों के नाम पर निकला अन्न केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहता। कौवे को अन्न, गाय को रोटी, कुत्ते को भोजन और चींटियों के लिए आटा या शक्कर देने की परंपरा पंचबलि की व्यापक भावना से जुड़ी है। धार्मिक मान्यताओं में कौवे को पितरों से जोड़ा गया है। गाय, कुत्ते और अन्य जीवों को भोजन कराने के पीछे भी अलग-अलग धार्मिक संदर्भ हैं। लेकिन इस पूरी परंपरा का एक सहज मानवीय अर्थ भी है—जिस अन्न ने हमें जीवन दिया, उसमें जीवमात्र का भी हिस्सा है। इसलिए पितृपक्ष को केवल मृत्यु की स्मृति का पर्व कहना अधूरा होगा। यह जीवन के प्रति संवेदना का भी पर्व है।
कौवे की कांव में सुनाई देती है स्मृति
श्राद्ध के बाद आंगन या छत की मुंडेर पर रखे अन्न की ओर जब कौवा बढ़ता है तो कई घरों में इसे श्रद्धा से देखा जाता है। लोकविश्वास में कौवा पितरों का प्रतीक माना गया है। वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में इसे प्रस्तुत करने के बजाय इसे सनातन लोकमान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है। सदियों से चली आ रही यह मान्यता अपने भीतर एक भाव छिपाए है—पूर्वजों को याद करो और अन्न अकेले मत खाओ।
गाय की आंखों में करुणा, कुत्ते के लिए भी निवाला
श्राद्ध के अन्न का एक हिस्सा गाय को देने की परंपरा भी पुरानी है। इसी तरह कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा को भी पितृकर्म से जोड़ा गया है। यह दृश्य आज भी गांवों और कस्बों में सहज दिखाई देता है—श्राद्धकर्ता पहले अपने पूर्वजों को स्मरण करता है और फिर भोजन का एक हिस्सा उन जीवों के लिए अलग कर देता है, जो स्वयं अपनी थाली नहीं सजा सकते।bशायद यही वह बिंदु है जहां धर्म कर्मकांड से आगे बढ़कर करुणा बन जाता है।
पितरों का ऋण केवल जल से नहीं, संस्कार से उतरता है
सनातन चिंतन में मनुष्य पर देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण की चर्चा मिलती है। पितृऋण का भाव केवल श्राद्ध करने तक सीमित नहीं है। पूर्वजों ने जो संस्कार, परिवार, ज्ञान और जीवन-मूल्य दिए, उन्हें आगे बढ़ाना भी उनकी स्मृति को जीवित रखना है। इसीलिए श्राद्ध के साथ ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन कराना, अन्नदान करना और सामर्थ्य के अनुसार सेवा करना भी परंपरा का हिस्सा बना। पितरों के नाम पर दिया गया अन्न अंततः किसी जीव की भूख मिटाए—इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी।
भरणी और मघा—पितृपक्ष के दो खास पड़ाव
2026 के पितृपक्ष में भरणी और मघा नक्षत्र से जुड़े श्राद्ध भी विशेष चर्चा में रहेंगे। 29 सितंबर को महाभरणी श्राद्ध और 7 अक्टूबर को मघा श्राद्ध का विधान है। ज्योतिषीय-धार्मिक परंपरा में मघा नक्षत्र का संबंध पितृभाव से जोड़ा गया है। इसीलिए मघा के दिन किया गया पितृकर्म विशेष महत्व रखता है।
जब तिथि याद न हो, अमावस्या सहारा बनती है
हर परिवार के पास अपने सभी पूर्वजों की मृत्यु तिथि सुरक्षित नहीं होती। कई बार पीढ़ियां बदलती हैं और तिथियां स्मृतियों के धुंधलके में खो जाती हैं। ऐसे में 10 अक्टूबर की सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण पड़ाव बनेगी। धार्मिक परंपरा में इस दिन ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने का विधान माना गया है। अर्थात जिन्हें कैलेंडर की कोई एक तारीख याद नहीं रख पाई, उनके लिए अमावस्या स्मृति का सामूहिक दीपक बन जाती है।
श्राद्ध में समय भी उतना ही महत्वपूर्ण
पितृकर्म के लिए सुबह और शाम के बजाय दिन का मध्य भाग विशेष माना गया है। कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का उल्लेख श्राद्ध परंपरा में मिलता है। इसीलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि किस दिन श्राद्ध करना है। उस दिन स्थानीय पंचांग में निर्धारित श्राद्धकाल देखना भी आवश्यक है।
पितृपक्ष का मौन संदेश
पितृपक्ष में घर के किसी कोने में जलता दीपक, दक्षिण दिशा की ओर जुड़ी धार्मिक मान्यता, तस्वीर के सामने रखा पुष्प और तर्पण के बाद बचा अन्न—ये सभी मिलकर एक ही बात कहते हैं— मनुष्य अकेला नहीं है। उसके पीछे पीढ़ियों की एक लंबी कतार है। हमारे बोलने का ढंग, हमारे संस्कार, हमारी भाषा, हमारे घर की चौखट, भोजन की खुशबू और रिश्तों को निभाने का तरीका—इन सबमें कहीं न कहीं पूर्वजों की छाप होती है. इसलिए पितृपक्ष भय का पर्व नहीं, कृतज्ञता का पर्व है। यह मृत्यु को याद करते हुए जीवन की कीमत समझने का अवसर है। यह अतीत के सामने सिर झुकाकर भविष्य की ओर देखने की परंपरा है।bऔर शायद इसीलिए श्राद्ध की थाली से जब एक मुट्ठी अन्न किसी कौवे की चोंच तक पहुंचता है, गाय के आगे रोटी रखी जाती है या किसी भूखे जीव को निवाला मिलता है, तब पितृ-स्मरण का अर्थ और व्यापक हो जाता है। पितरों के नाम की वह अंजुलि अंततः जीवन के नाम ही तो होती है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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