कार मैहर की ओर बढ़ रही थी। तभी ऊंचे पहाड़ पर मां शारदा के धाम की पहली झलक मिली। नजर ठहर गई और मन जैसे वहीं पहुंच गया। कुछ ही देर बाद धाम सामने था, मगर रोपवे बंद मिला। ट्रस्ट की वैन से ऊपर जाने के लिए दो घंटे बाद का समय बताया गया। इंतजार लंबा था, आस्था बेचैन। सामने सीढ़ियां थीं और कदम अपने आप उसी ओर बढ़ गए। सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं की भीड़ थी। कोई धीरे-धीरे चढ़ रहा था, कोई जयकारे लगाते हुए। आधे से अधिक रास्ता पार हो चुका था। थकान थी, मगर मां का नाम लेते ही कदम फिर चल पड़ते। आस्था के आगे थकान सचमुच बेमतलब लग रही थी। अंतिम छोर पर पहुंचे तो कपाट बंद मिले। प्रतीक्षा शुरू हुई। तभी कानों में मंदिर की घंटियों की गूंज सुनाई दी। लगा, कपाट सामने हैं तो क्या—मां तो यहीं हैं। घने बादल छा गए। जोरदार बारिश और करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा के बीच भी जयकारे थमे नहीं। दर्शन के बाद महाराज जी से परिचय कराया और मां शारदा भवानी पर प्रकाशित पिछले पूरे पेज के लेख की कटिंग दिखाई। उन्होंने आत्मीयता से आशीर्वाद दिया, मां की चुनरी ओढ़ाई और टीका लगाया। पत्नी, बेटी और बेटे को भी चुनरी ओढ़ाकर आशीर्वाद मिला. उस क्षण लगा—यात्रा पूरी नहीं हुई, मां ने बुलाकर अपना आशीर्वाद दे दिया। मैहर से लौटे तो पहाड़ पीछे था, लेकिन मां की वह पहली झलक अब भी आंखों में थी
मां का हार गिरा, नाम पड़ा मैहर
पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान शिव सती के देह को लेकर विचरण कर रहे थे, तब सती का हार इस क्षेत्र में गिरा। स्थानीय व्युत्पत्ति में ‘माई’ और ‘हार’ से ‘मैहर’ नाम जुड़ा माना जाता है। यह कथा इतिहास की प्रमाणित घटना के रूप में नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक मान्यता और लोकश्रद्धा के रूप में इस धाम की पहचान का हिस्सा है। जिला प्रशासन की वेबसाइट भी इसी मान्यता का उल्लेख करती है। यही कारण है कि यहां पहाड़ केवल पहाड़ नहीं रह जाता। वह श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है और उसके शिखर पर विराजी देवी केवल प्रतिमा नहीं, करोड़ों मनों की आस्था बन जाती हैं।
आल्हा-ऊदल की तलवार से भक्ति तक
मैहर की कथा मां शारदा के साथ बुंदेलखंड की लोकगाथा आल्हा-ऊदल के बिना अधूरी है। लोकमान्यता है कि आल्हा और ऊदल मां शारदा के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि वीर आल्हा ने इसी पर्वत पर मां की कठोर साधना की और देवी के दर्शन प्राप्त किए। आज भी मंदिर के आसपास आल्हा से जुड़े स्थल और लोकविश्वास इस कथा को जीवित रखते हैं। जिला प्रशासन के अनुसार आल्हा और ऊदल को मां शारदा का अनन्य उपासक माना जाता है और पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब तथा अखाड़ा आज भी इस लोकस्मृति से जुड़े हैं। और सबसे अद्भुत विश्वास—आल्हा आज भी मां की सेवा में आते हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन भी इस लोकमान्यता का उल्लेख करता है कि आल्हा प्रतिदिन मां के मंदिर में पूजा करने आते हैं। इसी विश्वास ने मैहर की भक्ति को एक रहस्यात्मक आभा दी है। श्रद्धालु इसे इतिहास की कसौटी पर नहीं, आस्था की आंखों से देखते हैं।
पहली पूजा आज भी आल्हा के नाम
मैहर की सबसे रोचक लोकपरंपराओं में एक मान्यता यह भी है कि दिन की पहली पूजा मां शारदा को आल्हा अर्पित करते हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन के आधिकारिक प्रकाशन में भी इस स्थानीय विश्वास का उल्लेख मिलता है। भोर का समय, मंदिर का शांत वातावरण और यह विश्वास कि मां के सबसे पुराने भक्त आज भी सबसे पहले उनके दरबार में पहुंचते हैं—मैहर की आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा कर देता है। यहां आस्था की खूबसूरती यही है कि सदियों पुरानी लोककथा आज भी श्रद्धालुओं की बातचीत में उसी विश्वास से जीवित है जैसे वह कल की ही बात हो।
फूल केवल चढ़ते नहीं, फिर लौटते भी हैं
मां के दरबार में चढ़ाए जाने वाले फूल भी मैहर की भक्ति-परंपरा का एक सुंदर अध्याय हैं। मां के चरणों में अर्पित फूल श्रद्धालु के लिए प्रसाद बन जाते हैं। इन फूलों में केवल सुगंध नहीं होती—उनमें किसी की मनौती, किसी की प्रार्थना और किसी परिवार की श्रद्धा जुड़ी होती है। मध्यप्रदेश पर्यटन के अनुसार मंदिर में चढ़ाए गए फूलों से स्थानीय महिलाएं अगरबत्ती तैयार करती हैं। इस तरह मां के चरणों में अर्पित पुष्प पूजा के बाद आजीविका और स्थानीय परंपरा से जुड़ जाते हैं। फूल मां को अर्पित होते हैं, फिर मां के आशीष की सुगंध बनकर घर-घर लौटते हैं।
आरती में घुल जाती है पूरी पहाड़ी
जब आरती का समय आता है तो घंटियों की ध्वनि जैसे पूरे त्रिकूट को अपने घेरे में ले लेती है। घी के दीपों की लौ, धूप की सुगंध, शंख और घंटियों का स्वर तथा एक साथ उठते जयकारे—कुछ क्षणों के लिए श्रद्धालु अपने आसपास की दुनिया भूल जाता है। यहां आरती केवल पूजा की एक विधि नहीं लगती। वह सामूहिक अनुभूति बन जाती है। एक हाथ में फूल, दूसरे में प्रसाद; आंखें मां की ओर और कान घंटियों की ओर—श्रद्धालु उस क्षण को भीतर उतार लेना चाहता है।
सीढ़ियां चढ़ना भी साधना जैसा
मां शारदा के दरबार की सीढ़ियां केवल ऊंचाई तक नहीं ले जातीं। वे श्रद्धालु को उसके अपने धैर्य से भी मिलाती हैं. किसी के साथ बुजुर्ग हैं, किसी की उंगली थामे बच्चा है, कोई प्रसाद लेकर चढ़ रहा है तो कोई मनौती पूरी होने पर नंगे पांव। सांसें तेज होती हैं, कदम कुछ देर ठहरते हैं और फिर मां का नाम लेकर आगे बढ़ जाते हैं। थकान शरीर की होती है, आस्था मन की। और जब मन मजबूत हो तो शरीर की थकान पीछे छूट जाती है।
एक पत्रकार की आंखों से मां की पहली झलक
इस यात्रा का अपना एक निजी अध्याय भी है। कार से मैहर की ओर बढ़ते हुए जब धाम करीब आया तो ऊंचे पहाड़ पर मां शारदा के मंदिर की पहली झलक दिखाई दी। दूरी पर था मंदिर, लेकिन उस क्षण मन की दूरी जैसे खत्म हो गई। रोपवे बंद मिला। दो घंटे बाद वैन से ऊपर ले जाने की सूचना मिली। सामने सीढ़ियां थीं। इंतजार के बजाय कदमों ने चढ़ाई स्वीकार कर ली। आधे से अधिक रास्ता पार हुआ तो लगा कि मां का बुलावा सचमुच भीतर तक पहुंच चुका है। अंतिम छोर पर कपाट बंद थे। प्रतीक्षा शुरू हुई। तभी कानों में घंटियों की गूंज सुनाई दी। उस क्षण लगा—कपाट भले बंद हैं, मां सामने हैं। घने बादल, तेज बारिश और करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा के बीच भी श्रद्धालुओं के जयकारे थमे नहीं। और फिर दर्शन का वह क्षण आया जिसने पूरी यात्रा को स्मृति में स्थायी कर दिया। महाराज जी को अपना परिचय दिया और मां शारदा भवानी पर प्रकाशित पिछले पूरे पेज के लेख की कटिंग दिखाई। उन्होंने आत्मीयता से आशीर्वाद दिया, मां की चुनरी ओढ़ाई, टीका लगाया और पत्नी, बेटी तथा बेटे को भी चुनरी ओढ़ाकर आशीर्वाद दिया। उस क्षण लगा—मां के दर्शन केवल आंखों से नहीं हुए, मां का आशीर्वाद सिर पर उतर आया। महाराज जी ने मां की महिमा के साथ आल्हा-ऊदल की लोकआस्था का भी स्मरण कराया। जैसे सदियों पुरानी कथा और आज का एक श्रद्धालु एक ही क्षण में जुड़ गए हों।
मैहर क्यों केवल एक मंदिर नहीं
मैहर में शक्ति की पौराणिक मान्यता है, आल्हा-ऊदल की लोकगाथा है, सीढ़ियों की साधना है, आरती की अनुगूंज है, फूलों की सुगंध है और श्रद्धालुओं की अपनी-अपनी मनोकामनाएं हैं। इसीलिए मैहर को केवल एक मंदिर की तरह देखना शायद इस धाम की आत्मा को छोटा कर देना होगा। यहां पौराणिक विश्वास, लोकस्मृति, भक्ति, संगीत, परंपरा और जनआस्था एक साथ सांस लेते हैं।त्रिकूट की ऊंचाई पर विराजी मां शारदा जैसे हर आने वाले से यही कहती हों— रास्ता कितना भी कठिन हो, कदम श्रद्धा से उठाओ तो हर सीढ़ी तुम्हें अपने और करीब ले आएगी। और शायद यही मैहर की सबसे बड़ी महिमा है— यहां श्रद्धालु मां के दर्शन करने आता है, लेकिन लौटते समय अपने भीतर मां की एक झलक लेकर जाता है।
परिवार के साथ तीर्थ का अनुभव
इस यात्रा की खासियत यह भी रही कि मां शारदा के दरबार तक पहुंचने का अनुभव परिवार के साथ साझा हुआ। चढ़ाई की कठिनाई हो या बारिश में आगे बढ़ना, रास्ते का हर पड़ाव साथ-साथ पार हुआ। तीर्थयात्रा इसलिए भी स्मरणीय बनी कि दर्शन का भाव पूरे परिवार के बीच एक साझा अनुभूति बन गया।
बादलों के बीच कभी दिखता मंदिर, कभी ओझल हो जाता शिखर
मैहर की पहाड़ी पर मौसम लगातार अपना रंग बदल रहा था। घने बादलों के बीच मंदिर का शिखर कभी साफ दिखाई देता तो कभी बादलों की ओट में चला जाता। तेज हवा के झोंके और बारिश के बीच पहाड़ी का यह दृश्य यात्रा को सामान्य धार्मिक यात्रा से अलग दृश्यात्मक अनुभव दे रहा था।
कहीं बुजुर्गों का संबल बने परिजन, कहीं बच्चों का उत्साह
सीढ़ियों के रास्ते पर श्रद्धालुओं का अपना अलग संसार दिखाई दिया। परिवार एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ रहे थे। उम्रदराज श्रद्धालुओं को परिजन संभाल रहे थे, जबकि बच्चे अपनी गति से आगे निकलने को उत्सुक थे। हर चेहरे पर मंजिल तक पहुंचने की अलग बेचैनी थी।
कपाट बंद थे, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था नहीं
मंदिर के कपाट बंद होने के बाद आसपास खड़े श्रद्धालुओं के लिए इंतजार का समय भी यात्रा का हिस्सा बन गया। कोई शांत खड़ा रहा, कोई आंखें बंद कर प्रार्थना करता दिखा तो कोई परिवार के साथ अगले अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। धार्मिक यात्राओं में मंजिल जितनी महत्वपूर्ण होती है, प्रतीक्षा भी उतनी ही अर्थपूर्ण हो जाती है।
जहां श्रद्धा दिखी, वहीं व्यवस्था के सवाल भी दिखाई दिए
यात्रा के दौरान एक पत्रकार की नजर केवल धार्मिक अनुभव तक सीमित नहीं रही। श्रद्धालुओं की सुविधा, आवागमन, मौसम और रास्ते की स्थिति भी स्वाभाविक रूप से नजर में आती रही। यही कारण है कि यह यात्रा एक साथ आस्था, जनजीवन और व्यवस्था—तीनों की तस्वीर लेकर लौटी।
मां के दरबार से लौटते ही सड़क ने रोक लिया सफर
मैहर से सतना की ओर लौटते समय करीब 10 किलोमीटर के हिस्से में सड़क की बदहाली सामने आई। बारिश के पानी ने बड़े-बड़े गड्ढों को ढक दिया था। खासकर अंडरपास के आसपास वाहनों को संभालकर निकालना पड़ रहा था। कुछ वाहन फंसते दिखे तो यात्रियों को उतरकर धक्का लगाना पड़ा।
सड़क की हालत का दस्तावेज बना कैमरा
सड़क की बदहाली केवल राहगीरों की शिकायत भर नहीं रही। मौके पर लिए गए फोटो और वीडियो में पानी से भरे गड्ढे, क्षतिग्रस्त सड़क और वाहनों की परेशानी स्पष्ट रूप से दर्ज हुई। यही दृश्य इस यात्रा के दूसरे पक्ष को सामने लाते हैं।
स्थानीय नागरिक की पीड़ा
स्थानीय नागरिक दयालु यादव ने सड़क की स्थिति को लेकर स्थानीय सांसद और विधायक की भूमिका पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि क्षेत्र से जुड़े जनप्रतिनिधियों को ऐसी सड़क की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। उनकी यह टिप्पणी स्थानीय नागरिक की प्रतिक्रिया के रूप में दर्ज की गई।
ऊपर आस्था का शिखर, नीचे रास्ते की चुनौती
मैहर यात्रा ने दो अलग-अलग दृश्य सामने रखे। पहाड़ी पर श्रद्धा से भरे कदम मां के दरबार की ओर बढ़ते रहे, जबकि वापसी के रास्ते में बारिश से जूझती सड़क ने यात्रियों की परेशानी बढ़ा दी। यही विरोधाभास इस यात्रा को केवल धार्मिक यात्रा न रहकर एक व्यापक यात्रा-अनुभव बनाता है।
कुछ क्षण खबर नहीं बनते, फिर भी जीवन भर साथ रहते हैं
हर यात्रा में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिन्हें खबर की भाषा पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। परिवार के साथ बिताए छोटे-छोटे पल, बारिश में साथ चलना, रास्ते में एक-दूसरे का इंतजार करना और लौटते समय भीतर जमा संतोष—मैहर की यात्रा की ऐसी ही निजी स्मृतियां हैं।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें