- अशोक सिंघल जन्मशती पर एक पत्रकार की स्मृति : अयोध्या के बंद दरवाजे से लेकर राम मंदिर के खुले द्वार तक की यात्रा
कक्षा चार का वह बच्चा, अयोध्या में बंद ताले के सामने खड़ा था। भीतर रामलला थे और बाहर हजारों वर्षों की आस्था का सवाल। तब न राजनीति समझ में आती थी, न इतिहास की पेचीदगियां। बस इतना समझ आता था कि जहां राम का जन्म हुआ, वहां ताला क्यों है? आज, अशोक सिंघल की जन्मशती पर पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है—वह बचपन का संकल्प ही शायद मेरी स्मृतियों में एक लंबी यात्रा की शुरुआत था।
हम बच्चे थे। इतिहास की जटिलता नहीं जानते थे। न्यायालय क्या होता है, प्रशासन कैसे निर्णय लेता है, आंदोलन कैसे आकार लेते हैं—इनमें से कुछ भी नहीं समझते थे। लेकिन उस दिन अयोध्या से लौटते हुए मन में एक भाव जरूर था—रामलला के दरवाजे का यह ताला एक दिन खुलेगा। फिर जिंदगी अपनी राह पर चल पड़ी। पत्रकारिता में आया। खबरों की दुनिया में देश-प्रदेश के असंख्य चेहरों से मिलने का अवसर मिला। लेकिन कुछ मुलाकातें रिपोर्ट से आगे बढ़कर स्मृति बन जाती हैं।अशोक सिंघल से मेरी ऐसी ही दो मुलाकातें हुईं। दोनों मुलाकातें भदोही के ज्ञानपुर क्षेत्र के कारीगांव निवासी ब्रह्मदेव उपाध्याय के यहां हुई थीं। उन दिनों उपाध्याय जी विश्वविद्यालय के कुलपति थे। आज वे वेस्टइंडीज में रह रहे हैं। अशोक सिंघल को सामने से सुनना अपने आप में अलग अनुभव था। वे घुमा-फिराकर बोलने वाले व्यक्ति नहीं थे। सवाल सीधा हो तो जवाब भी सीधा। शब्दों में राजनीतिक चतुराई की जगह विश्वास दिखाई देता था। राम जन्मभूमि के सवाल पर उनके भीतर संशय नहीं था।उनका विश्वास था—एक न एक दिन राम मंदिर बनेगा।लेकिन उनके कथन का दूसरा हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण था—हिन्दू समाज को एकजुट होना होगा।
आज जन्मशती पर जब उन मुलाकातों को याद करता हूं तो लगता है कि वह केवल किसी आंदोलन के नेता से बातचीत नहीं थी। वह ऐसे व्यक्ति से संवाद था, जिसने अपने जीवन का एक बड़ा लक्ष्य तय कर लिया था और जिसकी आंखों में उस लक्ष्य के पूरा होने का विश्वास साफ दिखाई देता था। समय ने करवट ली। अयोध्या का प्रश्न आंदोलन बना। आंदोलन ने देश की राजनीति, समाज और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया। इसके समर्थन और विरोध में अनेक स्वर उठे। अदालतों में मुकदमे चले। पीढ़ियां इस प्रश्न के साथ बड़ी हुईं। और फिर वह दिन भी आया जब राम जन्मभूमि का विवाद न्यायिक प्रक्रिया के निर्णायक पड़ावों से होकर आगे बढ़ा। 1986 में ताले खुलने की घटना को लेकर भी इतिहास में अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हैं। दस्तावेजी रूप से फैजाबाद के जिला जज के 1 फरवरी 1986 के आदेश के बाद ताले खोले गए और पूजा-दर्शन की अनुमति का रास्ता खुला। लेकिन उस दौर की राजनीति के भीतर क्या चल रहा था, इसे लेकर बाद के शोध और संस्मरण अलग-अलग विवरण देते हैं। पत्रकार नीरजा चौधरी के प्रकाशित शोध में अरुण नेहरू की भूमिका, राजीव गांधी से उनकी बातचीत और उत्तर प्रदेश सरकार के स्तर पर हुई गतिविधियों का उल्लेख है। उसी विवरण में अप्रैल 1986 में अशोक सिंघल से हुई बातचीत का भी जिक्र है, जिसमें उन्होंने निर्णय को “ऊपर से” लिया गया बताया था।
इसलिए इतिहास को इतिहास की तरह ही रहने देना चाहिए—दावे अलग हो सकते हैं, दस्तावेज अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डाल सकते हैं, लेकिन अयोध्या की वह घटना भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक निर्णायक मोड़ बन गई। और फिर वर्षों बाद वह सपना, जिसे अशोक सिंघल जैसे लोगों ने अपना ध्येय बनाया था, राम मंदिर निर्माण के रूप में मूर्त रूप लेने की दिशा में पहुंचा। मेरी स्मृति में इस पूरी यात्रा की सबसे अद्भुत कड़ी कोई राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि वह छोटा-सा बच्चा है जो अयोध्या में बंद ताले को देखकर बेचैन हुआ था। वही बच्चा आज पत्रकार है। उसने बीच के वर्षों में आंदोलन देखे, संघर्ष देखे, अदालतें देखीं, राजनीति देखी और इतिहास को बदलते देखा।
आज अशोक सिंघल की जन्मशती पर पीछे मुड़कर देखता हूं तो उनसे हुई वे दोनों मुलाकातें फिर सामने खड़ी हो जाती हैं। उनकी बात याद आती है—मंदिर बनेगा। तब मैं केवल सुन रहा था। आज, जब अयोध्या में राम मंदिर का सपना साकार हो चुका है, उस विश्वास को एक अलग अर्थ में समझ पाता हूं। अशोक सिंघल की जन्मशती इसलिए भी स्मरण का अवसर है कि किसी लक्ष्य पर विश्वास केवल घोषणा नहीं होता। कभी-कभी वह दशकों तक चलने वाली यात्रा का पहला कदम होता है। और मेरे लिए उस यात्रा की शुरुआत शायद उसी दिन हो गई थी, जब कक्षा चार का एक बच्चा अयोध्या में एक बंद ताले के सामने खड़ा था। उस बच्चे को तब मालूम नहीं था कि इतिहास क्या होता है। उसे सिर्फ इतना मालूम था— राम के द्वार पर ताला देखकर मन उदास है। और आज, दशकों बाद, उसी स्मृति के सामने खड़ा होकर लगता है— कुछ संकल्प उम्र के साथ पुराने नहीं होते। वे समय की परीक्षा से गुजरकर और गहरे हो जाते हैं। अशोक सिंघल ऐसे ही एक संकल्प के यात्री थे। और मैं? मैं उस यात्रा का एक छोटा-सा साक्षी हूं।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी

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