इसी तरह पापड़, अचार, मसाले और दूसरे खाद्य उत्पाद बनाने की परंपरा भी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से रही है। इन कामों को घरेलू गतिविधि मानकर छोड़ देने के बजाय छोटे कारोबार के रूप में विकसित करने की जरूरत है। गांव की महिलाओं के समूह मिलकर उत्पादन कर सकते हैं, स्थानीय बाजार में बेच सकते हैं और आगे चलकर पैकेजिंग तथा ऑनलाइन बाजार तक पहुंच बना सकते हैं। इसके लिए केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं को बाजार की जानकारी, उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत तय करने, बचत, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान जैसी बुनियादी बातों से भी जोड़ना होगा। तभी घर में बनाया गया सामान बाजार तक पहुंच पाएगा। विडंबना यह है कि गांवों की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का सबसे बड़ा योगदान उन कामों में है, जिन्हें अक्सर काम ही नहीं माना जाता। महिलाएं खेतों में बीज बोने से लेकर निराई-गुड़ाई और फसल से जुड़े कई काम करती हैं। पशुपालन में चारा लाना, पशुओं की देखभाल, दूध निकालना और उससे जुड़े घरेलू कामों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की हालिया जेंडर रणनीति में भी ग्रामीण महिलाओं की कृषि और विशेष रूप से पशुपालन में बड़ी भागीदारी दर्ज की गई है। फिर भी इन कामों से होने वाली आय पर उनका नियंत्रण नहीं होता है।
बीकानेर जिले के लूणकरणसर ब्लॉक का कुजटी गांव इस स्थिति को करीब से समझने का अवसर देता है। लगभग 2500 की आबादी वाले इस गांव में करीब 900 महिलाएं हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार केवल 50 से 60 महिलाएं ही किसी न किसी प्रत्यक्ष रोजगार से जुड़ी हैं। इनमें कुछ महिलाएं सिलाई का काम करती हैं, जबकि कुछ सड़क निर्माण, तालाब की सफाई और पौधारोपण जैसे कामों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। लेकिन मेहनत और मजदूरी के स्तर पर उनके श्रम को कई बार पुरुषों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है। कुजटी जैसी जगहों पर बदलाव की शुरुआत स्थानीय संसाधनों और महिलाओं के मौजूदा कौशल से की जा सकती है। जिन महिलाओं को सिलाई आती है, उन्हें बाजार से जोड़ा जाए। जो महिलाएं पापड़, अचार या दूसरे खाद्य पदार्थ बना सकती हैं, उनके समूह बनाए जाएं, या जो समूह पहले से इस क्षेत्र में हैं उनके साथ इन्हें जोड़ा जाए। जो महिलाएं पशुपालन करती हैं, उन्हें दूध, घी, दही या दूसरे उत्पादों की बिक्री से जोड़ा जाए। खेतों में महिलाओं के श्रम को केवल पारिवारिक मदद न मानकर कृषि उत्पादन का हिस्सा माना जाए। इससे रोजगार के ऐसे रास्ते बन सकते हैं, जिनके लिए महिलाओं को अपने गांव से दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इसके साथ एक और जरूरी बदलाव यह है कि महिलाओं की कमाई पर उनका अधिकार हो। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि महिला ने रोजगार पा लिया। यह भी जरूरी है कि उसकी कमाई उसके अपने बैंक खाते तक पहुंचे, वह अपनी आय और बचत के बारे में खुद निर्णय ले सके, तब कहीं जाकर परिवार के आर्थिक फैसलों में उसकी भी बात सुनी जाएगी। आर्थिक मजबूती तभी वास्तविक होगी, जब महिला की मेहनत का मूल्य भी तय हो और उसकी कमाई पर उसका अधिकार भी हो। गांवों में महिलाओं के पास मेहनत की कमी नहीं है, हुनर की कमी नहीं है और जिम्मेदारी उठाने की क्षमता भी कम नहीं है। कमी है तो ऐसे अवसरों की, जो उनके काम को पहचान दे और उसे बाजार से जोड़ सके। यदि गांव की महिला को उसके घर और गांव के आसपास ही सम्मानजनक रोजगार मिल सके, तो उसके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह खुल सकती है। जिन हाथों ने खेतों, पशुओं और घरों को वर्षों से संभाला है, उन्हें अपनी कमाई का अवसर मिलना चाहिए। ग्रामीण विकास की तस्वीर तभी पूरी होगी, जब उसमें महिलाओं की मेहनत को केवल सहयोग नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक योगदान के रूप में पहचान दिया जाएगा।
सीता
लूणकरणसर, राजस्थान
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)



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