वाराणसी : ज्ञानवापी के 35 साल पुराने मूलवाद में फिर आमने-सामने दलीलें - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

वाराणसी : ज्ञानवापी के 35 साल पुराने मूलवाद में फिर आमने-सामने दलीलें

  • वादमित्र को हटाने की अर्जी पर बहस जारी, वक्फ बोर्ड बोला—सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक आगे की कार्रवाई पर रोक रहे

gyanwapi-issue
वाराणसी (सुरेश गांधी)। ज्ञानवापी से जुड़े वर्ष 1991 के मूलवाद में बुधवार को एक बार फिर अदालत में महत्वपूर्ण कानूनी बहस हुई। सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक) अभिषिक्ता यादव की अदालत में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी को हटाने के लिए दाखिल अनुष्का तिवारी के प्रार्थनापत्र पर सुनवाई हुई। मामले में पक्षों की दलीलें जारी हैं। इस बीच सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से दाखिल उस प्रार्थनापत्र का मुद्दा भी अहम बना हुआ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनजर मुकदमे में आगे की प्रभावी कार्यवाही नहीं करने की मांग की गई है।


वादमित्र की नियुक्ति पर उठे सवाल

अनुष्का तिवारी की ओर से वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए हैं। उनकी ओर से दलील दी गई कि वादमित्र की नियुक्ति उचित तरीके से नहीं हुई और यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के बजाय हिंदू पक्ष के धार्मिक अधिकारों से जुड़ा है। इसके जवाब में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की ओर से आपत्ति दाखिल की गई। उनकी ओर से कहा गया कि अनुष्का तिवारी इस मुकदमे में पक्षकार नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस स्तर पर हस्तक्षेप का विधिक अधिकार नहीं है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि 1991 का मूलवाद प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, 1991 से बाधित नहीं है।


वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला

मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से दाखिल प्रार्थनापत्र पर भी अदालत में दलीलें महत्वपूर्ण हैं। बोर्ड की ओर से सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया है कि ज्ञानवापी से संबंधित लंबित मामलों में शीर्ष अदालत के अगले आदेश तक कोई प्रभावी अंतरिम अथवा अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए। बोर्ड ने इसी आधार पर मूलवाद में आगे की कार्यवाही रोकने की मांग की है। दूसरी ओर वादमित्र की ओर से इस मांग का विरोध किया गया है।


35 साल पुराने मुकदमे पर टिकी नजर

ज्ञानवापी से संबंधित यह मूलवाद वर्ष 1991 में दाखिल हुआ था। इसमें मंदिर निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार देने से जुड़े दावे किए गए हैं। करीब 35 वर्ष पुराने इस मुकदमे में अब अदालत के समक्ष एक ओर मुकदमे की आगे की कार्यवाही का प्रश्न है, वहीं दूसरी ओर वादमित्र की भूमिका और उनके खिलाफ दाखिल प्रार्थनापत्र पर भी बहस चल रही है।


श्रृंगार गौरी और तहखाने के मामलों में 15 अक्तूबर को सुनवाई

ज्ञानवापी से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण मामलों में भी बुधवार को कोई प्रभावी आदेश नहीं हुआ। जिला जज संजीव शुक्ल की अदालत में मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन की अनुमति तथा बंद तहखानों के एएसआई सर्वे की मांग से संबंधित मामलों की सुनवाई आगे बढ़ा दी गई है। अब इन मामलों में 15 अक्तूबर को सुनवाई होगी। इन मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के आदेश का प्रभाव है। शीर्ष अदालत ने ज्ञानवापी से संबंधित लंबित मामलों में अगले आदेश तक प्रभावी अंतरिम अथवा अंतिम आदेश पारित नहीं करने का निर्देश दिया था। फिलहाल ज्ञानवापी से जुड़े मामलों में अगली महत्वपूर्ण तारीखें—15 अक्तूबर और संबंधित 1991 मूलवाद की आगामी न्यायिक कार्यवाही—पर पक्षकारों और अधिवक्ताओं की नजर है।

कोई टिप्पणी नहीं: