मामला मधुबनी महिला थाना कांड संख्या 44/2025 से जुड़ा है। आरोपी नीरज कुमार मिश्रा ने अग्रिम जमानत की मांग की थी। अपर सत्र न्यायाधीश-V ने 16 अप्रैल 2026 के आदेश में जमानत याचिका को स्वीकार या खारिज करने के बजाय आरोपी को चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत लेने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सरोज कुमार चौधरी ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखते कोर्ट कोर्ट को बताया कि इस आदेश में 'नौशाद अंसारी बनाम बिहार राज्य' के फैसले पर भरोसा किया गया, जबकि हाई कोर्ट की खंडपीठ 'मो. राजा बनाम बिहार राज्य' मामले में उक्त निर्णय को असावधानीवश किया गया निर्णय घोषित कर चुकी है। इसके अलावा 'आशिक कुमार शाह' (2025) मामले में भी स्पष्ट किया जा चुका है कि सत्र अदालत को धारा 482 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत अग्रिम जमानत याचिका पर स्वीकार या अस्वीकार का निर्णय करना होगा। पीठ ने कहा कि संबंधित न्यायिक अधिकारियों को इस संबंध में निर्णय की प्रतियां भेजी जा चुकी हैं और फैसला विधि पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुका है। इसके बावजूद ऐसा आदेश पारित होना प्रथमदृष्टया गंभीर चिंता का विषय है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे आदेशों से आम लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ता है। याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक जारी रहेगी।
मधुबनी, 19 सितम्बर (संवाददाता) । न्यायिक आदेश में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की स्पष्ट नज़ीरों की अनदेखी करना मधुबनी के अपर सत्र न्यायाधीश-V को भारी पड़ गया। पटना हाई कोर्ट ने उनके आदेश पर कड़ी नाराजगी जताते हुए शो-काज जारी किया है। न्यायाधीश जितेंद्र कुमार की एकलपीठ ने जिला न्यायाधीश के माध्यम से संबंधित न्यायिक अधिकारी से एक सप्ताह में जवाब मांगा है कि उन्हें बिहार न्यायिक अकादमी में दोबारा प्रशिक्षण के लिए क्यों नहीं भेजा जाए। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी।

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