प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे बच्चों की परिस्थितियां आमतौर पर कठिन होती हैं। उन्होंने कहा कि उनकी कहानियों में अक्सर पढ़ाई बीच में छूटने, परिवारों के मुश्किल हालात से गुजरने और गरीबी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यदि किसी बच्चे से बातचीत करने और उसकी ओर से बोलने वाला कोई नहीं है, तो उसे अपनी बात रखने का अधिकार देने का कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि इसी कारण राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की 2024 की बाल-अनुकूल विधिक सेवा योजना में पुलिस थानों में बच्चों के लिए वकील और प्रत्येक किशोर न्याय बोर्ड में विधिक सेवा क्लिनिक की व्यवस्था की गई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘इसके बावजूद कई बोर्ड में अब भी ऐसे क्लिनिक नहीं हैं। इनके अभाव में बच्चे की देखभाल और कल्याण से जुड़े शुरुआती फैसले उचित कानूनी प्रतिनिधित्व के बिना लिए जाने की संभावना है।’’ उन्होंने विधिक सेवा संस्थानों से बच्चों के लिए प्रशिक्षित बचाव पक्ष के वकीलों का एक अलग प्रकोष्ठ बनाने पर भी विचार करने का आग्रह किया, ताकि प्रत्येक बच्चे को शुरुआत से ही एक समर्पित वकील मिल सके।
प्रधान न्यायाधीश ने नियमित और स्वतंत्र मूल्यांकन की आवश्यकता पर भी जोर दिया ताकि निजता का उचित ध्यान रखते हुए यह पता लगाया जा सके कि कितने बच्चे दोबारा विद्यालय गए, कितनों को रोजगार मिला और कितनों को फिर कभी किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश नहीं होना पड़ा। उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी. वी. नागरत्ना ने उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि यह परामर्श कार्यक्रम इस महत्वपूर्ण कानून की समीक्षा करने और यह समझने का अवसर है कि पिछले 10 वर्ष में इस कानून का उन बच्चों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है, जिनके लिए इसे बनाया गया था। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड का उद्देश्य किसी ‘‘छोटी आपराधिक अदालत’’ की तरह काम करना नहीं है। उन्होंने कहा कि इसकी भूमिका एक अलग सोच पर आधारित है, जो यह स्वीकार करती है कि बच्चों में विकास करने और बदलने की क्षमता होती है तथा न्याय व्यवस्था को उनके विकास से जुड़ी इस वास्तविकता को गंभीरता से लेना चाहिए। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह अधिनियम अंततः भविष्य से जुड़ा कानून है। उन्होंने कहा, ‘‘जब कोई बच्चा कानून तोड़ता है, तो कानून को उस बच्चे को नहीं तोड़ना चाहिए।’’

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें