उसने कहा कि 20 मार्च के विवादित आदेश पर गौर करने से पता चलता है कि उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को इस आधार पर जमानत देने से इनकार कर दिया था कि इससे सामाजिक व्यवस्था और पीड़ित परिवार के “मनोबल” पर असर पड़ सकता है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले में आरोपी है। याचिकाकर्ता पीड़िता के पड़ोस में किराये पर रहता था। उस पर आरोप है कि शादीशुदा होने के बावजूद उसने पीड़िता की बड़ी बहन का अपहरण करने की कोशिश की। पीड़िता की मां ने शिकायत दर्ज कराई कि याचिकाकर्ता ने लगभग एक महीने तक उसकी बेटी का यौन शोषण भी किया, जिसके आधार पर यह मामला दर्ज किया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह मामला तथाकथित पीड़िता की बड़ी बहन के साथ उनके मुवक्किल के रिश्ते का नतीजा है और इसका मकसद केवल उनके मुवक्किल को परेशान करना है। पीठ ने कहा कि आरोपी एक साल से अधिक समय से हिरासत में है। उसने कहा, “मौजूदा मामले की बात करें तो, हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता पहले ही एक साल से ज्यादा समय तक जेल में रह चुका है। मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में अभी कुछ और समय लगेगा।” पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा, “ऐसे हालात में हमारी राय है कि जमानत का मामला बनता है।”
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि जमानत याचिकाओं और आपराधिक मामलों पर सुनवाई करते समय अदालतों को नैतिकता को लेकर अपनी निजी राय या मूल्य-आधारित निष्कर्ष थोपने से बचना चाहिए। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें आरोपी को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया गया था कि इससे सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार के “मनोबल” पर असर पड़ सकता है। पीठ ने 23 सितंबर के अपने आदेश में कहा, “हमारा मानना है कि किसी आरोपी की जमानत याचिका या यहां तक कि उसके खिलाफ दायर आपराधिक मुकदमे पर सुनवाई करते समय अदालतों को नैतिकता आदि को लेकर पीठासीन न्यायाधीश की निजी राय या मूल्य-आधारित निष्कर्ष थोपने से बचना चाहिए।”

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