याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने भी अदालत से मामले की सुनवाई आज ही करने का आग्रह करते हुए कहा कि यह मामला जनहित से जुड़ा है। इस पर न्यायमूर्ति महाजन ने कहा कि यदि मामला जनहित से जुड़ा है, तो इसे खंडपीठ के समक्ष जाना चाहिए था। भारतीय युवा कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब के माध्यम से अदालत का रुख किया और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार करने संबंधी दिल्ली पुलिस के एक अक्टूबर के पत्र को चुनौती दी। कांग्रेस की युवा इकाई मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। याचिका में कहा गया है कि इसमें इस सवाल पर विचार करने की जरूरत है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रदर्शन की अनुमति देने के आवेदन पर विचार करते समय पुलिस अधिकारी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के तहत मिले मौलिक अधिकारों को किस तरह नियंत्रित कर सकते हैं। याचिका में कहा गया है, ‘‘प्रस्तावित प्रदर्शन संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और कामकाज से जुड़ी चिंताओं के कारण आयोजित किया जाना था। इसे याचिकाकर्ता के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक तथा बिना हथियारों के एकत्र होने के अधिकार के तहत एक शांतिपूर्ण गतिविधि के रूप में प्रस्तावित किया गया था।’’
भारतीय युवा कांग्रेस ने 25 सितंबर को दिल्ली पुलिस से एक अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक जंतर-मंतर पर करीब 100 से 150 लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए अनुमति मांगी थी। उसने कहा कि वह सुरक्षा, यातायात, अनुशासन और कानून-व्यवस्था से संबंधित सभी वैध शर्तों का पालन करने के लिए तैयार थी लेकिन उसके अनुरोध को खारिज कर दिया गया। याचिका में कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ता इस बात से इनकार नहीं करता कि राज्य को कानून-व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, सार्वजनिक सुरक्षा तथा स्थानीय निवासियों और आम लोगों के अधिकारों के हित में सभाओं को नियंत्रित करने का अधिकार है। हालांकि, चुनौती इस बात को लेकर है कि इस नियंत्रण का तरीका और दायरा क्या है।’’ इसमें कहा गया है, ‘‘किसी मौलिक अधिकार को नियंत्रित करने की शक्ति को उसके इस्तेमाल पर पूरी तरह मनमाने ढंग से रोक लगाने की शक्ति में नहीं बदला जा सकता।’’ याचिका में कहा गया है कि मामला केवल एक विशेष अनुमति को खारिज किए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक सीमा से भी जुड़ा है, जिसके भीतर कोई सरकारी प्राधिकरण मौलिक स्वतंत्रताओं के इस्तेमाल को नियंत्रित करते समय प्रशासनिक विवेक का उपयोग कर सकता है। याचिका में एक अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की ओर से जारी पत्र को रद्द करने और भारतीय युवा कांग्रेस के अनुरोध पर नए सिरे से तथा कानून के अनुरूप विचार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

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