अपनी विफलता पर इतराते नितीश,इस विफलता से जीत के कितने करीब. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

अपनी विफलता पर इतराते नितीश,इस विफलता से जीत के कितने करीब.

राजनीति पुलिस को बेबस बना देती है. :- भूतर्पूव पुलिस महानिदेशक, बिहार.



नीतिश कुमार घुटनों के बल आ गए मगर ओवादियों ने तीन पुलिस वालों को छोड़ने का अपना वायदा पूरा करने के पहले उन्हें काफी जलील किया। अब राज्य के कई भूतर्पूव पुलिस महानिदेशक याद दिला रहे हैं कि जब पुलिस में राजनीति की जाती है तो इस तरह की शर्मिंदगी झेलनी ही पड़ती है। एक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि पुलिस वालों के लगातार तबादले, पुलिस बल की कमी, थानाेंं में सुविधाओं की कमी, फाइलें निपटाने में देरी और माओवाद पर किसी स्पष्ट नीति का अभाव ही पहले नक्सलवाद और अब माओवाद को बढ़ावा दे रहा है।



एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक ध्रुव प्रसाद ओझा ने कहा कि 2003 में जब वे डीजीपी बने थे तब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थी। उनकी सुविधा के लिए मैने हिंदी और अफसरों के लिए अंग्रेजी में रिपोर्ट तैयार कर के दी थी और बताया था कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है। यह रिपोर्ट कभी राबड़ी देवी कीे मेज तक पहुंची ही नहीं। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री स्टाफ से इसकी पुष्टि की थी। ओझा का दावा है कि इसमें जो रास्ते सुझाए गए थे, उनके हिसाब से माओवादियों को बिहार में जड़े जमाने का मौका ही नहीं मिलता।

बिहार में जहानाबाद और गया के इलाके नक्सलवाद और बाद में माओवाद के असली गढ़ रहे है। नक्सलवाद का पतन होने के बाद और चारू मजूमदार की मौत के बाद भी यहां माक्र्सवादी लेनिनवादी पार्टी कई संगठनों के जरिए चलती रही। इन संगठनों में पीपुल्स वॉर ग्रुप था जो आंध्र प्रदेश के संगठन से सीधे जुड़ा हुआ था। इसके अलावा एक मजदूर किसान संघर्ष समिति बनी थी और इस समिति की कहानी एक दम अलग थी।

जयप्रकाश आंदोलन में भाग लेने आगरा से बिहार पहुंचे डॉक्टर विनयन शर्मा आंदोलन के बाद भी वहीं रह गए और उन्हें लगा कि जो राजनैतिक परिवर्तन आया है वह समाज में तीसरी क्रांति ले कर नहीं आ पाया है। इसीलिए उन्होंने मजदूर किसान संघर्ष समिति बनाई और मजदूरों और किसानों को हथियार उठाने के लिए भी प्रेरित किया।

यह वह दौर था जब बिहार में जातीय सेनाए पनप रही थी। राजपूतों की रणबीर सेना कई बड़े हत्याकांड कर चुकी थी। इसके अलावा एक कुर्मी सेना भी बनी थी जो नीतिश कुमार की जाति वालों की थी। उस समय नीतिश और लालू साथ साथ थे इसलिए नीतिश कुर्मी सेना के समर्थक नहीं बने। डॉक्टर विनयन की एक आम सभा पर जहानाबाद के अरवल गांव में पुलिस ने गोलियां चलाई और पचास से ज्यादा लोग मारे गए। बदले में संगठन ने भी हमले किए और डॉक्टर विनयन पर 1990 में एक लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया।

उस दौरान डॉक्टर विनयन दिल्ली में मेरे साथ ही ठहरते थे और उनसे मिलने जुलने वालों में जो लोग थे उनमें कई बड़े पुलिस अधिकारी, बिहार के कई नेता और दूसरे वाम संगठनों के लोग भी होते थे। जेपी आंदोलन के साथी भी आते थे जो दक्षिणपंथी भी थे और मध्य मार्गी भी। उसी समय पीपुल्स वॉर ग्रुप गिरोह बनने में लगा हुआ था और माओवाद का उदय वहीं से हुआ है। विनयन इस खतरे से आगाह थे और इसे रोकना चाहते थे मगर बिहार में तो उनके सिर पर लाख रुपए का इनाम था। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से संपर्क किया और कुछ मित्रों की मदद से आत्म समर्पण कर के पीपुल्स वॉर ग्रुप के खिलाफ काम करना चाहते थे। मगर जल्दी ही दिल के दौरे से उनकी मौत हो गई।

भूतपूर्व डीजीपी ओझा याद दिलाते हैं कि उन्हें सिर्फ इसलिए रिटायर होने के लिए कह दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्रीय जनता दल के एक गुंडे सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को दौड़ा लिया था। उन्होंने कहा कि उस समय नीतिश कुमार भी मेरे पक्ष में बोलने आए थे क्योंकि यह उनकी राजनीति के लिए ठीक था मगर अब माओवाद के मामले में तो वे मेरी भी सुनने को राजी नहीं है। एक और भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक डी एन गौतम माओवादियों द्वारा एक सहायक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या से बहुत दुखी है और याद दिलाते है कि उन्होंने माओवाद प्रभावित जिले जमुई में पुलिस फायरिंग रेंज बनाने का प्रस्ताव दिया था मगर इलाके के विकास के नाम पर इसे मंजूर नहीं किया गया और आज इसी इलाके में सबसे ज्यादा माओवादियों का असर है।

एक जमाने में अपराधियों के बीच आतंक का नाम बन चुके डीएन गौतम कहते हैं कि बिहार पुलिस के आधुनिकीकरण की जब भी कोशिश की गई तो अफसरों ने इसमें टांग अड़ा दी। उनका कहना है कि पुलिस का आधुनिकीकरण्ा तो सीधे मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक के बीच का मामला होना चाहिए और कोई आईएएस बीच में नहीं आना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि आंध्र प्रदेश में यहीं होता है। गौतम तो यहां तक कहते हैं कि पुलिस महानिदेशक द्वारा तैयार की गई सीधे मुख्यमंत्री के हाथ में पहुंचनी चाहिए और उस पर गृह सचिव की टिप्पणी भी नहीं होनी चाहिए। इस मामले में वे फिर आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि इसी वजह से आंध्र प्रदेश में माओवादी सबसे कम असर दिखा सके हैं।

श्री गौतम, अरुंधती राय, गौतम नवलखा और ऐसे ही उन तथाकथित बुध्दिजीवियों से खासे नाराज हैं जो माओवाद के हक में तो बहुत बोलते हैं मगर माओवादियों द्वारा निर्दोषों की हत्याएं उन्हें नजर नहीं आती। वे याद दिलाते हैं कि आज तक देश में माओवादियों ने सुरक्षा बलों के अलावा जिन निर्दोषों की हत्या की है उनमें से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी है। आदिवासियों के हत्यारों को आप कैसे समाज के पिछड़े हुए लोगों का रक्षक कहेंगे?

दिक्कत यह भी है कि जब बिहार सरकार सही रास्ते पर चल रही होती है तो दूसरे राज्यों की तरह अधिकारी पिछड़े रास्तों पर ही रहना पसंद करते है। बिहार में एक और डीजीपी रहे आनंद शंकर ने कहा कि माओवादियों के खिलाफ बिहार पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अभी तक कई बार यह प्रस्ताव दिया जा चुका है मगर इस पर कोई अमल नहीं हुआ है। नीतिश कुमार ने सुशासन का जो आडंबर पिछले पांच साल में खड़ा किया था और माओवादियों ने दो सप्ताह में तोड़ दिया है और इसके सबसे ज्यादा खुद जिम्मेदार नीतिश कुमार हैं।




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--आलोक तोमर--

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