महाबली दैनिक भास्कर के ढेर होने की सत्यकथा! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 15 सितंबर 2010

महाबली दैनिक भास्कर के ढेर होने की सत्यकथा!

देश में सबसे तेजी से बढ़ रहे दैनिक भास्कर समाचार पत्र समूह का झारखंड में अभियान अशुभ निकला। दिल्ली उच्च न्यायालय ने न सिर्फ भास्कर से निकल कर डीबी कार्प्स के नाम से बनी कंपनी को झारखंड से अखबार छापने से रोक दिया बल्कि हो सकता है कि जालसाजी, तथ्यों को छिपाने और सरकारी नियमों का गलत इस्तेमाल करने के मामले में भास्कर के मालिकों और झारखंड के कई बड़े अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा भी चले।

दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि अधिकारियों ने भास्कर के प्रकाशन का डिक्लेरेशन मंजूर करते वक्त अदालत की अवमानना की है और पीआरबी कानून का उल्लंघन किया है। यह फैसला शुक्रवार को दोपहर बाद आया और शनिवार और तथा रविवार को अदालतें बंद रहती है इसलिए अपील भी नहीं हो सकती थी। झारखंड में करोड़ो लगाने वाले महाबली भास्कर समूह की कमर एक अदालती फैसले ने तोड़ दी।

भास्कर समूह की स्थापना स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने की थी और इसके उत्तराधिकार को ले कर उनके बेटे रमेश अग्रवाल और बेटी हेमलता के बीच तनातनी चलती रही। इतनी मेहनत से दैनिक भास्कर स्थापित करने वाले द्वारका प्रसाद अग्रवाल को अपने ही बेटे और पोते के खिलाफ अदालत में अपील करनी पड़ी थी उनसे धोखा किया गया है और उनकी संपत्ति छीनी गई है। भास्कर समूह का दावा रहा है कि जल्दी ही विश्व के दस सबसे बड़े प्रकाशन समूहों में से उसका नाम होगा। मगर अदालत ने इस महाबली को इसकी हैसियत बता दी।

मामला सिर्फ इतना सा है कि दैनिक भास्कर नाम के कई मालिक है। वह भी स्वर्गीय अग्रवाल की बेटी हेमलता ने अगर मुकदमा नहीं किया होता तो ये स्थिति भी नहीं आती। एक फर्जी
कंपनी ने यह असली नाम हड़प लिया था। गुजरात में यह अखबार दिव्य भास्कर के नाम से निकलता है और एक बार बीच में तो मध्य प्रदेश में भी जब इन्हें लगा था कि दैनिक भास्कर नाम हाथ से छिनने वाला है तो नव भास्कर के नाम से नया नाम लेने की उन्होंने कोशिश की जिसे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

नमक, तेल और वनस्पति से ले कर ईट जमीन और सीमेंट तक का धंधा करने वाले और ब्रांड को जान से भी ज्यादा समेट कर रखने वाले दैनिक भास्कर के साथ ऐसा होगा और इतना बड़ा झटका लगेगा इतनी बड़ी आशंका कम लोगों को थी। यह भी तब जब अखबार निकालने की स्वीकृति मिलने के पहले ही नाम से दूसरे मालिक संजय अग्रवाल ने इस प्रकाशन पर आपत्ति जाहिर की थी और अदालत ने फैसला दिया था कि जब तक दूसरे पक्ष को नहीं सुन लिया जाता तब तक अखबार के प्रकाशन की अनुमति डीबी कर्ॉप्स को नहीं दी जाए।

पहले तो दैनिक भास्कर ने अपने दायरे को बढ़ाने के लिए झारखंड का चुनाव किया और वहां प्रचार का युद्व छेड़ दिया और फिर दूसरे अखबारों से लोगों को तोड़ना शुरू किया गया। ये सब कारोबारी युद्व है। इनमें सब चलता है। मगर भोपाल में रहने वाले भास्कर के मालिक झारखंड की जिला कचहरियों में जब हाजिरियां लगाएंगे तब शायद उन्हें कानून का सही और असली मतलब पता लगेगा।

--आलोक तोमर--
डेट लाइन इंडिया

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