न्यालय द्वारा कठोर दंड देने ख़ास तौर पर फांसी की सज़ा सुनाये जाने के मामले को लेकर कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं।ऐसा माना जा रहा है कि कानून की लड़ाई में सक्षम अथवा अमीर बाज़ी मार ले जाता है जबकि साधनहीन/गरीब के गले में फंदा कस जाता है।यों तो गुनाह दोनों करते हैं मगर अमीर अथवा साधन-सम्पन्न व्यक्ति पैसे के बल पर या फिर रसूख के बल पर बच निकलता है जबकि गरीब अपने लिए जमानत भी नहीं करवा पाता।आंकड़े बताते हैं कि गरीब और पिछड़ों को अमीर लोगों के मुकाबले ज्यादा कड़ी सजा मिलती है। हाल ही में सामने आई एक शोध-रिपोर्ट के अनुसार पिछले 15 सालों में मौत की सजा पाए 373 दोषियों में से तीन चौथाई पिछड़ी जातियों, धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों अथवा आर्थिक रूप से कमजोर तबके से थे।
गरीब, दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों को हमारी अदालतों से कठोर सजा शायद इसलिए मिलती है क्योंकि धनाभाव के कारण वे अपना केस लड़ने के लिए कोई अच्छा वकील नहीं कर पाते जबकि अमीर लोग पैसे के बल पर जमानत भी करवा लेते हैं,गवाहों को भी प्रभावित करते हैं और बाद में केस को लम्बा खिंचवा कर आसानी से बच भी जाते हैं। कानून-विज्ञ अब इस बात से इत्तफाक रखने लगे हैं कि, दरअसल, मौत की सजा उन लोगों के लिए है जो हाशिए पर चले गए हैं।यह पैसे,रुतबे और संपर्कों का ही कमाल है जिससे अपराधी के सारे दोष छिप जाते हैं और वह साफ़ छूट जाता है। यही वह ‘कमाल’ अथवा फर्क है जो दोनों की जिंदगियों को बदल देता है। ‘वेलफेयर स्टेट’ के नाते हमारी सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह गरीब के लिए, जहाँ तक संभव हो, अच्छी से अच्छी न्यायिक सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था करे।क्या मालूम उत्तम न्यायिक सुविधा मिलने से उसको नयी जिंदगी मिल जाय!
आचार्य चाणक्य की उक्ति याद आ रही है: ‘हमेशा ही धन रहित व्यक्ति हीन नहीं होता और न ही धनवान दृढ़ व्यक्तित्व का स्वामी होता है’।कहने का तात्पर्य यह है कि ज़रूरी नहीं कि अकूत धन-सपंदा का मालिक उच्च चरित्र वाला,सत्यवादी,दोषमुक्त अथवा विचारवान व्यक्ति हो और असहाय,वंचित और दीन-हीन व्यक्ति मानसिक रूप से रुग्न अथवा पतनशील हो।
डॉ० शिबन कृष्ण रैणा
अलवर

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