राजनीति विषय को लेकर हमारे यहाँ बहुत सारी फिल्में बनी हैं. कुछ घरेलू राजनीति के बारे में हैं जैसे खानदान,अपने-पराए या संसार …. कुछ जुर्म की राजनीति पर जैसे कंपनी या सरकार...कुछ प्यार की राजनीति पर जैसे देवर, गाईड या अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी…या फिर पारिवारिक राजनीति पर मिसाल के तौर पर त्रिशूल.
पुरानी फिल्मों में राजनेता ज़्यादातर अधर्मी और अत्याचारी बताए जाते थे. बाद में 80 और 90 के दशक में कुछ फ़िल्में राजनीति की पृष्ठभूमि को लेकर बनी जैसे आंधी,इंक़लाब और आज का एमएलए.
उन्हीं दिनों में एक और फिल्म बनी थी - श्याम बेनेगल की कलयुग जो एक औद्योगिक परिवार के बनते बिगड़ते रिश्तों की कहानी थी. या कहना सही होगा की वो आज के दौर की महाभारत थी.
अब इतने सालों के बाद प्रकाश झा राजनीति के उतार चढ़ाव की कहानी लेकर आए हैं.
फिल्म के कुछ पन्ने आज के नेताओं की निजी ज़िंदगी से लिए गए हैं, कुछ अपनी कल्पना और अनुभव से और बहुत कुछ महाभारत से. प्रकाश झा की महाभारत में युधिष्ठिर बने हैं अर्जुन रामपाल, अर्जुन बने हैं रणबीर कपूर, कटरीना कैफ आज के दौर की द्रौपदी हैं जिसे न अर्जुन चाहता है न करण.
दुर्योधन बने हैं मनोज बाजपेई, एक नए अवतार के करण बने हैं अजय देवगन और कृष्ण बने हैं नाना पाटेकर जो खुद हथियार नहीं उठाते मगर सारा षड्यंत्र रचाते हैं. फिल्म की सिनेमेटीग्राफी, एक्शन दृष्य, संगीत खास तौर पर -‘मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं’ तारीफ़ के लायक है.

1 टिप्पणी:
कल रात ही प्रिमियर देख कर आये हैं और अब आपकी यह समीक्षा पढ़ी.
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