मध्यप्रदेश में मलेरिया का तांडव देख कर अब जनता के साथ सरकार भी सिहरन महसूस कर रही है. मलेरिया से प्रदेश में हुई मौतों का कोई आधिकारिक आंकड़ा हालाँकि उपलब्ध नहीं है,किन्तु शायद ही ऐसा कोई जिला हो ,जहाँ मलेरिया ने दस-पांच मरीजों की जान न ली हो. प्रदेश में मलेरिया ने अचानक अपने पांव कैसे फैला लिए,यह शोध का विषय है.क्या प्रदेश की आवोहवा एकदम मलेरिया फ़ैलाने वाले मच्छरों के अनुकूल हो गयी?मलेरिया के प्रसार के लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ स्थानीय निकायों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है,क्योंकि साफ-सफाई का जिम्मा स्थानीय निकायों का है.मलेरिया की रोकथाम में विफलता के लिए स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच,सकता मलेरिया के खिलाफ समाज और सरकार की जंग नई नहीं है.
मलेरिया से देश १९५३ से लड़ता आ रहा है.मध्यप्रदेश में भी मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में विश्व बैंक बराबर से हमारे साथ है, किन्तु दुर्भाग्य से हम अभी तक यह जंग जीत नहीं सके हैं. प्रदेश के झाबुआ ,बैतूल ,गुना ,सीधी ,शहडोल ,मंडला,बालाघाटदिंडोरी और छिन्वाडा में तो हमेशा से मलेरिया सरके के लिए एक चुनौती रहा है,आज भी इन ९ जिलों में विश्व बैंक के सहयोग से २०१३ तक के लिए एक विशेष कार्यक्रम चल रहा है,किन्तु मलेरिया का प्रकोप कम नहीं हो रहा. प्रदेश के ५० में से ३१ जिलों में मलेरिया ने अपना आतंक मचा रखा है.लेकिन सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाएँ मिलकर भी इस महामारी से जूझने में नाकाम साबित हुई हैं.
मलेरिया की रोकथाम के लिए अगर आप सरकारी आंकड़ों पर नजर दौडाएं तो पाएंगे की सरकारी प्रयासों में कहीं कोई कमी नहीं है. आंकड़े कहते है की मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य ९० प्रतिशत तक हासिल कर लिया गया है.फिर सवाल यह उठता है मलेरिया फ़ैल क्यों रहा है.इसका एक ही मतलब हो सकता है की या तो सरकारी आंकड़े झूठे हैं, या फिर मलेरिया फैलने की खबरें.गलत हैं मलेरिया के सम्वाहक को मरने के लिए पारम्परिक दवाओं के अलावा ४५ लाख से ज्यादा मछलियाँ छोड़ी गयीं है,लेकिन मर्ज बढ़ता ही जा रहा है. सरकारी आंकड़े कहते हैं की अब तक मलेरिया ३१ लोगों की जान ले चुका है,जबकि गैर सरकारी आंकड़े कहते हैं की यह संख्या सैकड़ों को पार कर चुकी है. अर्थात स्थिति अलार्मिंग हो रही है. अब सरकार ने सुधीर रंजन मोहंती को मलेरिया उन्मूलन अभियान की जिम्मेदारी सौपी है. देखते हैं की वे स्वास्थ्य विभाग के अमले को और कितना गतिशील बना सकते हैं. वैसे मलेरिया से जोझते हुए देश को ५८ साल हो गये हैं.अब यदि इतने साल में भी अगर हम इस बीमारी का निदान नहीं खोज सके हैं तो जाहिर है की या तो हमारे प्रयास अधूरे हैं या फिर हमारा ज्ञान कारगर नहीं है. इसलिए मलेरिया की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग को नये सिरे से सोच-विचार करना चाहिए.
---राकेश अचल---
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