फर्ज की नींव मजबूत रखें... - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 5 मई 2012

फर्ज की नींव मजबूत रखें...

वरना ढह जाएगी हस्ती कभी !!


हर व्यक्ति के जीवन में अपने कर्त्तव्य कर्म सबसे ज्यादा जरूरी और प्राथमिक हैं। इनके बगैर किसी भी व्यक्ति के जीवन में सफलता की कामना नहीं की जा सकती। जिसे जो काम दिया जाता है, अथवा योग्यता से प्राप्त हुआ है, उसमें निरन्तर हुनर निखारते हुए क्षेत्र विशेष में आगे बढ़ते रहना ही मनुष्य के जीवन का ध्येय होना चाहिए। लेकिन काफी लोग ऐसे हैं जिनके जीवन के सभी पक्षों में इतना असंतुलन और वैषम्य होता है कि पूरी जिन्दगी ये लोग भटकने के आदी हो जाते हैं। जो अपने फर्ज पर कायम रहते हैं वे जमाने को जीत लेते हैं या कि इनका जीवन संतोष और शाश्वत आत्मशांति का पर्याय हो जाता है।      

ऐसे लोग अनुशासित जीवन जीते हुए अपनी मर्यादा रेखाओं में रहते हुए अपने कर्मयोग का निर्वाह करते हैं और अपने फर्ज अच्छी तरह निभाते हुए खुद भी धन्य होते हैं और दूसरों को भी उपकृत करते रहते हैं। इस विचारधारा के लोगों की इच्छाशक्ति और विश्वास इतना दृढ़ होता है कि इनके लिए कभी कहीं कोई लक्ष्मण रेखा ख्ंिाचने की जरूरत कभी नहीं पड़ती। अपनी सीमा रेखाओं और परिधियों में रहकर ये जीवननिर्वाह कों सरल एवं सहज बनाए रखते हैं। इन लोगों को अपने जीवन में तथाकथित लोकप्रियता का स्वाद भले न मिले लेकिन इनके कर्म ऐसे होते हैं जिनकी वजह से ये औरों के हृदयपटल पर अपनी सत्ता जमाए रखते हुए राज करते हैं।

पतित से पतित लोग भी भले ही ईर्ष्या और द्वेष के मारे सार्वजनिक तौर पर इनके अस्तित्व को न स्वीकारें मगर उनका मन इस सत्य को स्वीकारता हुआ इन्हें दोहरे चरित्र वाला अनुभव करा ही देता है। फर्ज को मर्ज समझने वाले लोग ऊपरी तौर पर कैसे भी दिखें, इनका चित्त चंचल होता है, मन उद्विग्न और गतिविधियां संदिग्ध हुआ करती हैं। अपने इलाके में कई सारे ऐसे लोग हैं जो अपने कर्त्तव्य कर्म या कि फर्ज से संतुष्ट नहीं होने के कारण दूसरे-तीसरे धंधों और षड़यंत्रोें में रमे हुए हैं और इस यात्रा में सारी मानवता भुला बैठे हैं।

इनको प्राप्त कर्त्तव्य कर्म में कोई बुराई नहीं होती है बल्कि ये इन्हें अपना लक्ष्य नहीं मानते हुए सीढ़ियां मानकर चल रहे हैं और इन्हें सोते-जागते हर समय दिखता है दूसरी थालियों में पकवानों से भरा भोजन। बाहरी चकाचौंध से इनकी आँखें इतनी चुंधियाई होती हैं कि इन्हें अपना फर्ज गौण लगने लगता है और बाहरी उल्टे-सीधे काम और स्टंट इनके लिए जीवन भर प्रधानता लिए हो जाते हैं। ऐसे लोग समाज पर दोहरा भार बन कर जीते हैं। एक तो जहाँ इनका पावन अस्तित्व पाया जाता है वहाँ इन्हें बिना मेहनत किए सब कुछ अपने आप मिलता रहता है। भले ही ये डींगे ईमानदारी और कर्मयोग की हाँकें, अध्यात्म और धरम के चोगों में धँसें रहकर सारे ढोंग कर लें, बड़े-बड़े लोगों के तलवे चाटते हुए उनकी छाया का सुख प्राप्त करते रहें, अध्यात्म के शिखर पुरुषों का सान्निध्य सुख पाते रहें, मगर इनकी हकीकत कुछ और ही होती है।

लोग इन्हें कभी गिरगिट तो कभी रंगा सियार, कभी वृहन्नला तो कभी बहुरुपियों की श्रेणी में जरूर सूचीबद्ध करते रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोग अपने निर्धारित फर्ज के सिवा कुछ भी कर सकने को तैयार हो जाते हैं। इसमें उन्हें कोई लाज-शरम नहीं आती। ऐसे लोग बुद्धिहीनों से लेकर बुद्धि बेच कर जीने वाले लोगों तक में बड़ी संख्या में मिल जाते हैं। इनकी दौड़-भाग और उद्विग्नता की तुलना कभी श्वानों, सूअरों और लोमड़ों से की जा सकती है। कभी ये ऐसी कुर्सियों पर धँसकर रौब झाड़ते हैं जो कुर्सियां इनके लिए बनी ही नहीं हैं। हथकण्डों और षड़यंत्रों के भंवर जाल पैदा करने वाले इन लोगों का एकमेव मकसद होता है जो अ्रच्छा लगे उसे हथिया लो।

इस प्रजाति के ये कशेरूकी कभी बकवास करते नज़र आते हैं और कभी चूहों की तरह माँद में घुस जाने के आदी होते हैं। इनके कुकर्मों की ही तरह इनका पूरा जीवन भी विषमताओं भरा हो जाता है। कभी भी इनके जीवन का प्रवाह सामान्य नहीं हुआ करता। कभी खूब दिखने लग जाएंगे, कभी मंच से लेकर लंच, और बंच पाने तक। ऐसे में कोई आयोजन ऐसा नहीं होता जब इनकी देह अपनी पावन भागीदारी दर्शाती न दिखे। फिर कई मौके ऐसे आते हैं जब ये किस बिल में घुस गए हैं, इसकी थाह भी कोई नहीं पा सकता। ऐसे लोग उन सारे गलियारों का पता रखते हैं जहाँ बिना किसी मेहनत के कभी जलेबी-गुलाबजामुन और कभी रसगुल्लों का स्वाद टपकता रहता है, छपास की सारी भडास पूरी हो जाया करती है, उन सभी लोेगों के चरणस्पर्श करने को उतावले रहते हैं जिनसे कुछ मिल पाने की उम्मीद हो। कभी बड़े लोगों के इर्द-गिर्द सूंघते रहते हैं ताकि दूसरे लोग उन्हें वीआईपी समझ कर कुछ कहने की हिम्मत न करें। एक और किस्म है ऐसे लोगों की जिन्हें अपने काम-धंधों की बजाय दूसरोें के फर्ज पर निगाह रखने की मजबूरी होती है।

जमाने ने ऐसे खूब लोगों को देखा है जिन्होंने फर्ज को भुलाकर कभी अश्व और कभी हाथी की सवारी का स्वाद चखा है, कभी राजप्रासादों से लेकर राज पथ तक राजदरबारियों के साथ हमसफर होते हुए चहलकदमी देखी है। पर न ये कुर्सियाँ रहने वाली हैं न वे तख्त और ताज, जिन पर आज उन्हें नाज है। फर्ज से जो लोग दूर होते गए उनका क्या हश्र होता है, इसके लिए अभी नहीं सोचा गया तो अपनी आने वाली पीढ़ी अपने आप सभी को बताती रहेगी। फर्ज को ठुकरा कर बेईमानी से पायी गई षड़यंत्री सत्ता का जन्म ही हस्तियों को मिट्टी में मिलाने के लिए हुआ करता है।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

कोई टिप्पणी नहीं: