मन्दिरों को न बनाएं विज्ञापनों के डेरे... - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 29 जुलाई 2012

मन्दिरों को न बनाएं विज्ञापनों के डेरे...

शून्य और शांति से ही है देवाराधन का सुकून !!!


आजकल विज्ञापनों का मायाजाल इतना जबर्दस्त फैला हुआ है कि बस्तियों से लेकर श्मशान तक कोई भी स्थान अछूता नहीं रहा है, हर जगह विज्ञापनों की भरमार है। आदमियों से लेकर मुर्दों तक के लिए विज्ञापनों के जरिये सारा संसार हाजिर है। विज्ञापनों के लिए कोई स्थान असुरक्षित और अपवित्र नहीं होता तभी पेशाबघरों से लेकर सभी सार्वजनिक स्थलों और मन्दिरों के भीतर तक विज्ञापनों को पढ़ने-देखने को हर कोई विवश है। भगवान के मन्दिरों में जहाँ लोग ईश्वर के दर्शनों के लिए आते हैं, वहां भी हर तरह के विज्ञापनों का बाजार सजा हुआ मिलता है। मन्दिरों में मुख्य द्वार से लेकर सारे परिसरों की दीवारों पर और यहां तक कि मन्दिरों के भीतर सभामण्डप तक विज्ञापनों की राहू छाया मण्डराती नज़र आ ही जाती है। मन्दिरों में कई तरह के विज्ञापनों का संसार सजा हुआ दिखने लगा है। मन्दिरों में आजकल भगवान की पूजा-आराधन और साधना-अनुष्ठानों से कहीं ज्यादा महत्त्व निर्माण को दिया जा रहा है और लौह-लक्कड़ तथा पत्थरों को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। भक्ति के नाम पर आजकल सबसे ज्यादा भीड़ मन्दिरों में निर्माण और विकास कार्यों पर लगी हुई है।

इन सभी लोगों को जाने क्यों यह भ्रम हो चला है कि मन्दिरों या आश्रमों में निर्माण कार्य कराना ही ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है और इसी से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। भक्ति के दूसरे जरूरी और ज्यादा सरल-सहज मार्गों के प्रति न उनकी सोच है न कोई लक्ष्य। समाज को दिशा भ्रम से निकालने वाले संत-महात्मा और बाबा-ध्यानयोगी आदि सारे भी भक्तों की धार्मिक आस्थाओं को भुनाने में इतने माहिर हो चले हैं कि अपने मन्दिरों और आश्रमों के निर्माण को ही ईश्वर की प्रसन्नता का मार्ग दिखाकर अपनी आजीविका और कमाई के दीर्घकालीन संरक्षण का स्थायी बंदोबस्त कर रहे हैं। आश्रमों, मठों और मन्दिरों के निर्माण की अंधी दौड़ में भक्तों का निर्माण वे पूरी तरह भुला चुके हैं। उनके लिए भक्त की परिभाषाओं में धनाढ्य और प्रतिष्ठित वे लोग ही रह गए हैं जो बाबाजी के आश्रमों और उनके मन्दिरों के लिए समर्पित रहें और जब चाहें तब पैसों का स्वतः इंतजाम हो सके। यह पैसा अपराधों, तस्करी, दलाली से आ रहा है कि भ्रष्टाचार से भरे हुए रास्तों से। यह धन काला है या सफेद, उनका है या पराया, पुरुषार्थ से कमाया गया है अथवा हराम का, इससे उन लोगों को कोई मतलब नहीं है जो मन्दिरों और आश्रमों के नाम पर कमा खाने को ही जीवन का लक्ष्य बना चुके हैं और जिनके लिए राम और कृष्ण या शिव-शक्ति, अथवा और किसी देवता से कहीं अधिक महत्त्व गांधी छाप का है।  गांधी बाबा के प्रति उनकी इतनी अगाध आस्था है कि भगवान के प्रति भी उतनी नहीं।

मन्दिरों के मामले में माफिया ही पनपते जा रहे हैं जो लगातार निर्माण और विकास में दिन-रात इतने भिड़े हुए हैं कि बेचारे भगवान तक चैन नहीं ले पा रहे हैं। फिर इन निर्माणों को ही भगवान की उपासना बताने वाले विज्ञापनों की भरमार भी इन मन्दिरों में हर कोने पर देखने को मिलती है। इनमें मन्दिर निर्माण के लिए सहयोग की अपीलें फबती रही हैं। मन्दिर निर्माता ऐसा कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते जब धर्म के नाम पर मन्दिर निर्माण के लिए पैसा बटोरने का कोई रास्ता निकला हुआ हो। हमेशा निर्माणाधीन और विकासशील रहने वाले मन्दिरों में आर्थिक सहयोग देने के आग्रह से भरे विज्ञापन उन मन्दिरों के साथ ही दूसरे मन्दिरों में भी नज़र आते हैं। मन्दिर जैसे परिसरों में शांति, सुकून के लिए जरूरी यह है कि इनमें संसार पसरा न हो, इसकी बजाय होने चाहिएं सिर्फ भगवान और भक्त। पर आजकल मन्दिरों में भक्त और भगवान के सिवा सब कुछ देखने में आ रहा है। मन्दिरों और मन्दिर परिसरों में विज्ञापनों का इतना आतंक छाया हुआ है कि भगवान के दर्शन से पूर्व कई सारे बाबाओं, कथा-सत्संगों और आम सूचनाओं के बोर्ड्स पर निगाह डालते हुए भीतर पहुंचना पड़ता है और मन्दिर के गर्भगृह में पहुंचने तक भी सभामण्डप या कि गर्भगृह की दीवारों पर कोई न कोई इश्तहार चिपका हुआ जरूर मिल जाता है।

यानि की मन्दिरों में भगवान गौण हो गए हैं और एडवरटाइजमंेंट बिजनैस हावी होता जा रहा है। विज्ञापनों के लिए मन्दिरों से ज्यादा सुरक्षित और मुफतिया जगह और कहां होगी?  फिर बाबाओं और योगियों से लेकर कथावाचकों तक के लिए परम्परागत भक्तों की भीड़ को अपनी तरफ आकर्षित करने में मन्दिरों के अलावा और कौनसी जगह हो सकती है? इसके अलावा पूजा-पाठ की सामग्री या धार्मिक यात्राओं के इश्तहारों की भी भरमार रहने लगी है। मन्दिर परिसरों में विज्ञापनों और अनावश्यक सामग्री की भरमार उस मन्दिर तथा मन्दिर परिसर में विराजमान देवताओं का अपमान है तथा इससे मन्दिरों की शांति भंग होती है। यों देखा जाए तो कई लोगों के लिए मन्दिरों में विज्ञापन लगवाना भी अलग से कमाई का साधन हो चुका है। जो लोग मन्दिरों में भगवान की देखरेख करते हैं उनमें भी कई लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए ये विज्ञापन अतिरिक्त दान-दक्षिणा से कम नहीं हुआ करते। मन्दिरों के वातावरण को पवित्र, शांत एवं सुकूनदायी बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मन्दिरों को विज्ञापनों की मानसिकता से दूर रखें तथा मन्दिर परिसरों को विज्ञापन बाजार न बनाएं।  कम से कम मन्दिरों को तो छोड़ें अपनी व्यापारिक मनोवृत्ति से, वरना संसार और मन्दिर में क्या फर्क रह जाएगा।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077



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