वरना बंद हो जाएगा चवन्नियों का चलना
वर्तमान युग की सबसे महत्त्वपूर्ण और बड़ी समस्या है अपने दायरे से बाहर सोचना और अपनी औकात से ज्यादा होने या दिखाने का भरम बनाए रखना। आदमी जो कुछ है, जितना भी है, उससे कहीं ज्यादा दिखना और दिखाना चाहता है। दूसरों को भ्रम में रखकर और मिथ्या आडम्बरों की रचना करके भी दूसरों की निगाह में पूज्य और प्रतिष्ठित होने के लिए आजकल जिस पैमाने पर आडम्बर होने लगे हैं, उतने बीते किसी युग में नहीं हुए। जो जहां है, जितना है उसे वही दिखना और दिखाना चाहिए तभी सत्य का बोध बना रह सकता है। लेकिन आजकल दूसरों को भ्रमित रखने और बनाए रखने की गरज से आदमी अपने को कई गुना ज्यादा आँक कर दिखाने का आदी हो गया है। इससे होता यह जा रहा है कि सर्वत्र आडम्बरी चेहरे और मुखौटे नज़र आने लगे हैं और यह पहचानने तक में भूल होने की पूरी संभावना बनी रहती है कि आखिर सच क्या है? भ्रम और मोह भरे इस माहौल में हर आदमी अपने को बढ़ा हुआ दिखाना चाहता है और इस भ्रम को बरकरार रखने के लिए वह रोजाना जाने कितने झूठ और फरेब का सहारा लेने लगा है। इस प्रजाति में कई तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो कुछ नहीं हैं सिर्फ मनुष्य का शरीर जाने किस पुराने पुण्य से मिल गया है, वे अपने को बड़ा और प्रतिष्ठित दिखाने के फेर में जाने क्या-क्या करतब और करिश्मे अपनाने में जुटे रहते हैं और अच्छे मदारी की तरह भी कई बार अपनी भूमिकाएं तय करने लगते हैं।
दूसरे वे हैं जो चवन्नी छाप और उठाईगिरे हैं जिनके पास सिर्फ बकवास करते रहने और घुमक्कड़ बने हुए जहां-तहां मजमा लगा कर अनर्गल बातें करने का हुनर है, वे हमेशा कभी चिकनी-चुपड़ी बातें करते हुए तो कहीं श्वानों की तरह गुर्राते रहते हैं, कभी साँप-बिच्छुओं की तरह डंक मारकर, तो कभी कौओें की महफिल जमाकर काँव-काँव करते हुए अपने उल्लू सीधे करते रहते हैं। तीसरी किस्म ऎसे लोगों की है जिन्हें भगवान का दिया कुछ तो होता है मगर बताते हैं बहुत कुछ। इस किस्म के लोग सेंधमारी और उल्टी-सीधी भिड़ाने, तिकडमों, तिलस्मों और ऊपर वालों को अपना बनाकर उन्हें बोतल में उतार देने तक की सारी उत्तर क्रियाओं और मैली विद्याओं में जबर्दस्त माहिर होते हैं। ये लोग विषबेल की तरह चाहे किसी से भी लिपटते हुए उसे अपना बना लेने का हर कौशल आजमाते रहते हैं। इन लोगों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि ये सामने वाले को अपना बनाने के लिए हरचन्द कोशिश करते हैं और उसी के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को भी ढाल लेते हैं। ऎसे में सामने वाला भी इन्हीं की तरह का हो तब तो बात ही कुछ और हो जाती है। ऎसे में एक और एक ग्यारह वाली कहावत सिद्ध होकर रहती है। इन लोगों का गठबंधन हस्तबंधन से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है और इन दोनों ही लोगों को लगता है जैसे वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। इन लोेगों की दूसरी बड़ी खासियत यह भी होती है कि ये विपरीत परिस्थितियों में चूहे और कछूए की तरह स्वभाव अपना लेते हैं वरना समय अपने अनुकूल हो तो ये सारे जानवरों की भाषाओं और हरकतों को भी मात कर दें।
बहुरूपियों से लेकर सर्वशक्तिमान के स्वरूप में ऎसे लोग हमारे आस-पास से लेकर हर कहीं दिख ही जाते हैं। बाहरी शक्तियों और ऊर्जाओं की बदौलत इनके पास घमण्ड का साया हमेशा छाया रहता है। इन्हीं दुष्ट शक्तियों का सम्बल इनके दंभ और अहंकार को इतना ज्यादा भर देता है कि ये हमेशा अपनी औकात से ज्यादा पॉवर दिखाने के आदी हो जाते हैं।
इनके अहंकारी व्यक्तित्व और व्यापक प्रसार के आगे इनकी चादर बौनी हो जाती है, इनके मिथ्या भाषणों, उपदेशों और लच्छेदार वाणी के आगे सत्य पलायन करने लगता है और इनकी दंभीली हरकतों से परिवेश में हमेशा भूकंप जैसा नकारात्मक और अशांतिभरा माहौल छाया रहता है। इसके साथ ही हमेशा अमानवीयता की दुर्गंध के भभके रह-रहकर उठते हुए महसूस होते हैं। इस अंतिम प्रजाति के सभी लोगों के जीवन की विशेषता यह भी होती है कि ये हर कहीं टाँग फँसाने में माहिर होते हैं और हमेशा अपनी औकात से दो सौ गुना ज्यादा सोचते और बताते हैं। ये लोग जहां होते हैं वहां अपने से ऊपर वालों को लांघ लेने के सारे जतन करते रहते हैं। फिर ऊपर वाले भी कमजोर, मलीन, भ्रष्ट-बेईमान और नालायक हो तों ये लोग चमड़े के सिक्के चला लेते हैं और हुकूमत करने लगते हैं ऊपर वालों से लेकर नीचे वालों तक पर। कभी ये अफसरों की तरह पेश आते हैं, कभी जमादारों की तरह, और कभी ग्वालों की तरह। कभी होटल के बेरों की तरह सब कुछ परोसने का काम भी कर गुजरते हैं, और कभी खुद सब कुछ खोलकर पसर जाते हैं उनके आगे। जो हैं नहीं, उससे भी बढ़कर दिखाने और करतबों में माहिर ऎसे करामाती लोगों के सिक्के उन सभी जगहों पर चल रहे हैं जहां ऊपर वाले या साथ वाले सहनशील और निवीर्य बने हुए सब कुछ चुपचाप देखते रहने के आदी हो गए हैं।
इनके पास देखते रहने और सुनने के सिवा कुछ है भी नहीं क्योंकि इनकी जरा सी भी चुप्पी टूटने का मतलब है कहर बरप जाना। इन लोगों की गति-मुक्ति के सिवा इन सारी समस्याओं का समाधान कभी संभव है ही नहीं। इन लोगों को कितनी ही समझाईश की जाए कि वे जो हैं वही बने रहें, जितनी चादर है, उतने ही पाँव पसारें, जो काम दिया हुआ है वही करें और अपनी मिथ्या सत्ता की डींगे न हाँकें। मगर ये लोग उस किस्म के आदमी नहीं हैं कि इन्हें समझाया जा सके। ये लोग झूठ के सहारे जीने और मरने वालों की श्रेणी में आते हैं। इन लोगों को आत्मानुशासन की कितनी ही सीख दी जाए मगर सब व्यर्थ है क्योंकि ये जीवन में कभी मर्यादित नहीं रह सकते, अपनी औकात को बार-बार भूल जाना इनके चरित्र का सर्वोपरि अंग होता है। ये जहां कहीं रहते हैं वहां अपने जिस्म के आयतन से कहीं ज्यादा फूल कर चलने के इतने आदी हो जाते हैं कि गलियारों से लेकर राजमार्गों तक इन्हें इठलाते हुए चलता देखना भी विस्मय और हास्य का जनक होता है। यह अहंकार और ऎंठ ही वह महान ऊर्जा के स्रोत होते हैं जिनकी बदौलत इनकी जिन्दगी का अस्तित्व बना हुआ है। चाहे जैसे भी हो, ऎसे लोग उन सभी स्थानों के लिए अपनी खास अहमियत रखते हैं जहाँ इनकी चवन्नियाँ चलती ही नहीं बल्कि दौड़ती रहती हैं। हमें यह भी पता होना चाहिए कि चवन्नियों का भी कई-कई जगह अचूक इस्तेमाल होता है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें