यह सत्य है कि छायावादी काव्य में ओज और पौरुष के स्वर को निराला ने ही सशक्त अभिव्यक्ति दी है परन्तु व्यक्तित्व की कठोरता में अन्तर्निहित भावों की मृदुलता निराला की विशेष पहचान है। यों भी पौरुष और श्रृंगार परस्पर विरोधी नहीं एक-दूसरे के पूरक तत्व हैं। श्रृंगार और सौन्दर्य ही वे प्रेरक उपादान हैं जो पौरुष को ओज और दीप्ति से युक्त करते हैं। यही कारण है कि निराला की अधिकांश आरंभिक रचनाएँ श्रृंगारिकता की मादक परन्तु सूक्ष्म विरल अनुगूँज से अनुप्राणित हैं। पहली रचना ‘जुही की कली ’में ही वासन्ती प्र्रणय की मादक सुरभि समायी हुई है। श्रृंगारिकता की पृष्ठभूमि पर रची गई इस कविता मंे जुही की कली को उस नायिका के रूप में चित्रित किया गया है जिसका प्रिय उसे छोड़ कर दूर प्रवास पर चला गया है -
विजन वन वल्लरी पर
सोती थी सोहाग भरी, स्नेह स्वप्न मग्न
अमल कोमल तनु तरुणी जुही की कली,
दृग बन्द किए, शिथिल पत्रांक में
वासन्ती निशा थी।
भावों की कोमलता और सरसता में अद्वितीय यह रचना प्र्रणय की आवेगमयता, द्रुति और दीप्ति लिए हुए है। वसन्त की रात्रि में कोमल पल्लवों के पर्यंक(शयन कक्ष) में निद्रालस कली का सौन्दर्य अपनी कोमलता और मृदुता में बेजोड़ है। यौवन के स्वच्छन्द प्र्रणय का नैसर्गिक चित्रण मलयानिल रूपी प्र्रेमी नायक के आगमन के साथ शुरू होता है। परन्तु यह आगमन अकस्मात नहीं होता। वसन्त की मद भरी रात्रि उद्दीपन का कार्य करती है-
आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात
आयी याद चाँदनी से धुली हुई आधी रात
आयी याद कांता की कम्पित कमनीय गात
फिर क्या था, वन, उपवन, नदी, पहाड़ कानन, कुँजों को पार करता हुआ पवन-नायक द्रुत गति से अपने पुराने केलि स्थल पर आ पहुँचता है। सोई जुही की कली के कोमल कपोलों पर जड़े गए चुम्बन के बावजूद जब वह नहीं जागती तो यौवन की मदिरा पी सोई उस कली को जगाने का दूसरा उपाय ही क्या था? -
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली
मसल दिए गोरे कपोल लाल
रति क्रियाओं का ऐसा सूक्ष्म मनोहारी चित्रण कवि की रागमयी श्रृंगार चेतना का ही परिणाम है। प्रवासी प्रियतम के आवेगजन्य मनोविज्ञान का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण इस रचना में हुआ है, साथ ही कली के खिलने का सुन्दर क्रम दर्शाया गया है और ये दोनों भाव बिना एक-दूसरे पर आरोपित हुए समानान्तर रूप से चलते रहते हैं। यह रचना के संघटन और अन्विति की सबसे बड़ी विशेषता है।
वसन्त ऋतु निराला की सर्वाधिक प्र्रिय ऋतु है। उसका मनोहारी सौन्दर्य हर पल उन्हें बाँधता है और सघन निराशा के क्षणों में भी प्र्रेरित करता है- ‘रुखी री यह डाल, वसन वासन्ती लेगी’ की आशा ही उनकी वह जिजीविषा है जो जीवन के प्र्रति उनकी राग-भावना को सदा बलवती बनाए रखती है। आम्र मंजरियों की मादक गंध, कोयल की काकली, भ्रमरों का गुँजन और सरसों के पीले फूलों की आभा स्वतः ही कवि के गीतों में ढल जाती है और वह कह उठता है-
सखि वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया
आवृत्त सरसी उर सरसिज उठे
केशर के केश कली के छुटे
जागी पलकों में
वन यौवन की माया
‘जुही की कली’ के अतिरिक्त शेफालिका भी उनकी शुद्ध श्रृंगारिक रचना है जिसमें यौवन के स्वाभाविक विकास से कंचुकी के बन्दों का स्वतः ही टूटना दर्शाया गया है। सुषुप्त प्रेयसी का एक और संवेदनात्मक रूप चित्र ‘जागृति में सुप्ति थी’ के माध्यम से उपस्थित किया गया है जहाँ नायिका की आँखों में रंगीन स्वप्न जड़े हैं-
जड़े नयनों में स्वप्न
खोल बहुरंगी पंख विहग
सो गया सुरा स्वर
प्र्रिया के मौन अधरों में
क्षुब्ध एक कंपन सा निद्रित सरोवर में।
निराला की श्रृंगार चेतना अथवा माधुर्य भाव की योजना दो भूमिकाओं पर दृष्टिगत होती है, पहली भूमिका प्र्राकृतिक सौन्दर्य निरूपणों की है और दूसरी मानवीय सौन्दर्य चित्रों की है। इतना ही नहीं उनकी संगीत चेतना भी मधुर भावों के सृजन में सहायक हुई है। शब्द संगीत एवं अर्थ संगीत का समन्वित निर्वाह उनकी रचनाओं में हुआ है -
मौन रही हार
मैं प्र्रिय पथ पर चलती, सब कहते श्रृंगार
स्वच्छन्द श्रृंगार की उन्मुक्त व्यंजनाओं के अतिरिक्त कवि ने दाम्पत्य प्र्रेम के भारतीय सांस्कृतिक उदात्त रूप को भी अत्यन्त मर्यादित अभिव्यक्ति दी है। आत्म समर्पण की महिमा से मण्डित वधु के एकनिष्ठ प्र्रेम को रूपायित करते हुए कवि लिखता है -
यौवन उपवन का पति वसन्त
है वही प्र्रेम उसका अनन्त
नारी सौन्दर्य के अंकन में कवि ने बिम्ब विधान का सहारा लिया है, फलस्वरूप उसकी एक-एक मुद्रा के रेखांकन में उन्हें अपूर्व सफलता मिली है। रात्रि जागरण के पश्चात् अलस सौन्दर्य को बिम्बित करते हुए कवि मधुर भाव चित्र अंकित करता है-
(प्र्रिय) यामिनी जागी
अलस पंकज दृग अरुण मुख -
तरुण अनुरागी।
खुले केश अशेष शोभा भर रहे,
पृष्ठ, ग्रीवा बाहु उर पर तर रहे
बादलों में घिर अपर दिनकर रहे
ज्योति की तन्वी, तड़ित द्र्रुति ने क्षमा मांगी।
यहाँ केशों से ढके मुख के लिए बादलों से ढके सूर्य का बिम्ब उपमान स्वरूप ग्रहण किया गया है। कविता में आगे मुँह पर फैले अस्त-व्यस्त केशों को हटाते हुए, चारों ओर देखने की आशंकित मुद्रा का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन हुआ है। पति-पत्नी के मधुर मिलन का वर्णन करते हुए कवि होली के रूपक का विधान करता है-
नयनों के डोरे लाल, गुलाल भरे, खेली होली।
जागी रात सेज पति-संग रति सनेह रंग घोली,
दीपित दीप प्रकाश कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली
मली मुख चुम्बन रोली।
श्रृंगार चित्रण में ऐन्द्रियता का समावेश कर कवि उसमें रंग भरता है और वह चित्र माँसल हो सजीव हो उठता है। मधु ऋतु के इस श्रृंगार वर्णन में नायिका के स्मित हास्य में कमल के प्रफुल्लित होने का जो साधर्म्य है वह अप्रतिम है। प्रिय के अधरों का आसव पी कर नेत्रों में उभर आए लाल डोरों का गुलाल के साथ सामन्जस्य आनन्द और मस्ती के भाव को व्यन्जित करता है।
‘अनामिका’ में संकलित रचना ‘प्रेयसी’ भी उन्मुक्त प्र्रेम की श्रृंगारिक रचना है किन्तु साथ ही दार्शनिक आलोक से दीप्त रचना है। मुक्त प्र्रेम की अधिकांश रचनाओं के अन्त में दार्शनिक भाव-बोध की अन्विति होने के कारण वे उदात्तता लिये हुए हैं।
प्र्रेम सौन्दर्य निरूपणों की दृष्टि से कालिदास निराला के आदर्श हैं। उनकी ‘यमुना के प्रति’ शीर्षक रचना में राधा-कृष्ण एवं गोपिकाओं के स्वच्छन्द लीला विहार को प्र्रस्तुत किया गया है। यमुना के निर्निमेष नेत्रों में विस्मृत मदिरा का राग है। स्मृति के द्वारों का खुलना और अतीत के सम्पूर्ण तटीय लीला-विलास और राग-रंग का एक-एक कर साकार हो उठना - एक अद्भुत वर्णन है। कवि ने भागवत के महारास की उदात्तता को बरकरार रखते हुए एक सतत गतिशील स्मृति चित्र उपस्थित किया है।
जहांँ कहीं भी कवि ने श्रृंगार एवं प्रणय को रूपायित करना चाहा है वसन्त स्वयंमेव ही उपस्थित हो गया है। मदनोत्सव की यह ऋतु निराला की श्रृंगार-चेतना की आधार भूमि है। वसन्त पंचमी की शुभ तिथि में जन्मे सरस्वती पुत्र निराला का वसन्त के प्रति यह आकर्षण एक सहजात आकर्षण है। यही कारण है कि केवल प्रणय प्रसंगों में ही नहीं, कवि के जीवन दर्शन निर्धारण में भी वसन्त की अहम् भूमिका रही है-
बनो वासन्ती मृदुल
पत्रिका तरु की अतुल
फिर सुरस संचारिका
सुख सारिका उसकी मृदुल ,
फिर मधुर मधु दान से नव
प्राण दे दे कर फलो।
(डॉ. निर्मला शर्मा)
गंधमादन, 9-ए, माही सरोवर नगर
बाँसवाड़ा -327001

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