मरूभूमि प्राचीनकाल से संत-महात्माओं, सिद्धों और तपस्वियों की भूमि रही है। हिमालय की उत्तराखण्डीय वादियों में हाड़कँपाती शीत में की जाने वाली तपस्या से भी ज्यादा भीषण है भयावह गर्मी, चुभने व झुलसा देने वाली तपन, आँधियों के कहर और बूँद-बूँद पानी के संकट के बीच धर्म-ध्यान और साधन तपस्या। लेकिन मरुधरा के रेतीले धोरों को भी अपनी साधना स्थली बनाने वाले संतों और सिद्धों की लम्बी श्रृंखला विद्यमान रही है जिनके लोकसेवी कल्याण कार्यो व चमत्कारों, परचों की गूंज आज भी पश्चिमी राजस्थान में दूर-दूर तक पसरी हुई है।
इसी परम्परा के चमत्कारिक लोक संत रहे हैं - बादलनाथ। बादलनाथ महाराज के प्रति आज भी जन-मन में श्रद्धा और आस्था का ज्वार उमड़ता है। लोक मान्यता है कि बादलनाथ महासिद्ध थे तथा आज भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं। भक्तों की पुकार पर संत बादलनाथ मनोकामनाएं पूरी करते हैं। सरहदी क्षेत्रों में तो बादलनाथ को लोग अपना आत्मीय और संरक्षक मानकर पूजते हैं।
जैसलमेर जिले के सीमावर्ती गांव मे पोछीणा में अवस्थित बादलनाथ का मंदिर क्षेत्र भर में प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यों तो इस मंदिर पर साल भर ही धर्मावलंबियों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन खास अवसरों पर विशेष अनुष्ठान तथा भजन-कीर्तन आदि होते हैं। महाशिवरात्रि की पूर्व संध्या पर यहाँ बड़ा जागरण होता है जिसमें गाँव भर के लोग हिस्सा लेते हैं।
मंदिर के गर्भगृह में बादलनाथ की डेढ़ फीट ऊँची मूर्ति है जिसके बारे में कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से दर्शन करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। बादलनाथ का यह मंदिर ग्राम्य आस्था व चेतना का धाम बना हुआ लोकजीवन में नई चेतना व उत्साह भरता रहा है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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