मांडणा मांडणे की राजस्थान में पुरानी परंपरा रही है लेकिन इन मांडणों को ऐसे ही नहीं बनाया जाता रहा है इनका भी अपना महत्व है, ये भारत की संस्कृति और लोक कला से जुड़ी एक ऐसी विरासत है जिससे त्यौंहारों की रंगत में चार चांद लग जाते हैं । मांडणा जिसे रंगोली भी कहा जाता है भारत की सांस्कृतिक लोककला है, यह एक प्रकार की सजाई जाने वाली चित्रकारी है जिसे घर बरामदे आदि में फर्श पर उत्सव-त्यौंहारों आदि पर सजावट के लिए बनाया जाता रहा है साथ ही भगवान के स्वागत के प्रतीक के तौर पर भी महिलाएं घर-आंगन में इसे बड़े हर्ष के साथ बनाती हैं। इसमें प्रयुक्त होने वाले रंगों में मुख्यतः लाल, पीला, हरा और सफेद रंग प्राथमिकता लिए होते हैं इन्हें पहले के समय में प्राकृतिक रंगों जिसमें पीले रंग के लिए हल्दी, सफेद के लिए चूना अथवा चावल का आटा, लाल रंग के लिए सिंदूर आदि काम में लिए जाते थे समय बदलने के साथ ही आज के दौर में कई प्रकार के रासायनिक रंगों का प्रयोग भी होने लगा है। प्रायः घर की महिलाएं और बालिकाएं इन्हें ज्यामितिक आकार की बनाती है जिनमें वृताकार आकृति वाली रंगोली प्रमुख रहती है वृताकार जिसे गोल भी कह सकते हैं जो रंगोली में निहीत शब्द हैं । कहते हैं कि रंगोली बनाना सुमंगल होता है वैसे सजावट भी इसका मुख्य प्रयोजन है फिर भी आज इसे हमारी विरासत को संजोने वाली कला और स्वागत के तौर भी इस्तेमाल किया जा रहा है । रंगोली एक ऐसी कला है जो पुरातात्विक काल से ही प्रचलन में रही है, रंगोली का एक नाम “अल्पना“ भी है और मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में भी मांडी हुई अल्पना के चिन्ह मिलते हैं । अल्पना को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन में कला भवन में अन्य चित्रकला के विषयों के साथ-साथ एक अनिवार्य विषय बनाया था।
रंगोली को भारत के कई स्थानों में बनाया जाता है और ये स्थान प्राचीन काल से ही बनाई जाने वाली पारंपरिक रंगोलियों को बनाते हैं इन्हें देखने से स्थान विशेष की रंगोली को जानने का अवसर प्राप्त होता है। यह लोक कला का ही एक विशिष्ट रूप है अतः इसके तत्व भी “लोक“ से ही लिए गये हैं और सामान्य भी हैं । रंगोली के लिए शुभ प्रतीकों का चयन किया जाता है विभिन्न जाति-धर्मों में प्रतीकों का अपना ही महत्व है इन प्रतीकों को स्थान विशेष की रंगोलियों में देखा जा सकता है । नई पीढ़ी इन्हें परम्परा के बतौर अपनाती है और इन्ही छोटे-छोटे प्रयासों से संस्कृति तत्व आज हमारे समाज में जीवित हैं और मैं आशा जताता हॅू कि भारत जिसे त्यौंहारों का देश कहा जाता है उसी में समाज को एक-दूसरे से जुड़ने और एक दूसरे के धर्म विचारों को समझने विचारने सहमत होकर अपनाने जैसी भावना निहीत रहेगी। आमतौर पर प्रतीकों में कमल का फूल इसकी पत्त्तियां, आम, मंगल कलश, मछलियां, भांति-भांति के पक्षी जिनमें हंस, मोर, तोते, चिडि़यां आदि सम्पूर्ण भारत की रंगोली कला में देखे जा सकते हैं । अवसर विशेष पर बनाई जाने वाली रंगोली में विभिन्न आकृतियां भी जुड़ जाती हैं जैसे दीपावली पर बनाई जाने वाली रंगोली में दीप, गणेश या लक्ष्मी को रंगावली पर उकेरा जाता है। मुख्य द्वार की देहरी घर के बरामदों अथवा बागीचों में रंगोली बनाने की परंपरा है, भगवान के आसन, दीप के आधार, पूजा की चैकी और यज्ञ की वेदी पर भी रंगोली सजाने की परंपरा है बरसों से चली आ रही है ।
वैसे तो आजकल अतिथि सत्कार और पर्यटन पर भी इस कला का विशेष प्रभाव देखा जा सकता है, निश्चित तौर पर इन्हें होटलों आदि में विदेशी मेहमानों की आवभगत के समय बनाया जाता है और निश्चित तौर पर वे इन्हें देखकर खुश होते है। पहले इन्हें घर के फर्श पर बनाया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इनमें भी कलात्मकता आने लगी है और कई कलाकार पानी पर भी विशेष तौर पर तैयार रंगों की मदद से बड़ी ही संजीदगी के साथ रंगोली बनाते हैं। विभिन्न विद्यालयों और काॅलेज जैसे संस्थानों में समय-समय पर होने वाली रंगोली प्रतियोगिताओं के कारण भी इसका महत्व आज भी बरकरार है । भारत में रंगमंच एवं ललित कलाओं को समर्पित संस्था संस्कार भारती भी समय-समय पर बड़े आयोजन कर रंगोली प्रतियोंगिताएं करवाती रहती हैं जिनमें विभिन्न स्थानों की कला, रंग, चित्रण, आकार आदि का समावेश बखूबी देखा जा सकता है और इन्हीं प्रयासांे से भारत की सांस्कृतिक लोक कला आज भी जीवंत है। रंगोली जिसे रंगावली भी कह सकते हैं भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग नामों से जानी जाती है राजस्थान में “मांडणा“, बिहार में “अरिपन“, बंगाल में “अल्पना“, महाराष्ट्र में “रंगोली“, कर्नाटक में “रंगवल्ली“, तमिलनाडु में “कोल्लम“, उत्तरांचल में “ऐपण“, आंध्र प्रदेश में “मुग्गु“ या “मुग्गुलु“, हिमाचल में “अदू्रपना“, कुमाउं में “लिखथाप“ या “थापा“ केरल में “कोलम“ आदि नामों से जानी जाती है।
रंगोली को बनाये जाने का समय भी सुबह को ही शुभ माना गया है कहते हैं इससे लक्ष्मी और नव-मंगल समाचारों का आगमन होता है। दक्षिण भारत में रंगोली को हजारों वर्षों से बनाया जाता रहा है घर के मुख्य द्वार के आगे मेहमानों के स्वागत, अच्छे सुमंगल समाचारों की प्राप्ति और किस्मत के लिए इसे बनाया जाता है दक्षिण भारत में ऐसी मान्यता है कि रंगोली बनाने से चींटियां घर में नहीं आती । इस मान्यता में किसी भी प्रकार का अंध विश्वास नहीं जुड़ा हुआ है बल्कि इसमें भी विज्ञान है पुराने समय में जब रंगों के स्थान पर चावल का आटा आदि इस्तेमाल किया जाता था जिसे चींटियां भोजन के तौर पर ग्रहण कर बाहर से ही चली जाती थी तो इस प्रकार घरों के बाहर बनाई जाने वाली रंगोली के पीछे एक कारण यह भी कहा जा सकता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को यदि ध्यान में रखें तो ज्ञात होगा कि काम के बोझ, दबाव, क्रोध आदि को कम करने का भी यह एक बहुत अच्छा उपाय है, विभिन्न प्रकार के रंग और उनसे बनाये जाने वाली आकृतियां मानव मस्तिष्क को शांति और तरोताजगी का अहसास करवाती है। उदाहरण के तौर पर रंगों के महत्व को जानने के लिए मैं यहां आधुनिक रंग विज्ञान का उल्लेख करना चाहुंगा। आज के समय में जब कार्य का बोझ ज्यादा है तो कर्मचारियों की कार्य प्रणाली को निरंतर एवं उत्तरोत्तर बनाये रखने के लिए आधुनिक कार्यालयों में रंगों का चयन मनोविज्ञान को आधार बनाकर किया जा रहा है। विभिन्न कंपनियां अपने काॅरपोरेट आॅफिसों को बनाते समय रंग विशेषज्ञों की सलाह ले रही हैं । ये रंग मानव के लिए विभिन्न प्रकार का प्रभाव डालते हैं जैसे नीला रंग ठंडक प्रदान करता है, लाल रंग तेजता प्रदान करने वाला हैै । तो जाहिर सी बात है रंगोली में समाविष्ट किये जाने वाले रंगो का हमारे मस्तिष्क विज्ञान से भी सीधा संबंध है और इसको बनाने से शांति मिलती है और आशाओं का सृजन होता है।
रंगोली मुक्तहस्त और बिंदुओं को मिलाकर दोनों प्रकार से बनाई जा सकती है पहले फर्श पर सफेद रंग या चाॅक से बिंदु बनाये जाते हैं फिर उन बिंदुओं को मिलाते हुए आकृति बनाई जाती है। आकृति बनाने के बाद उसमे सुंदर रंग भरे जाते है। वहीं मुक्तहस्त रंगोली में सीधे जमीन पर आकृति ही बना दी जाती है और फिर रंग भर दिया जाता है, लकड़ी के महीन बुरादे को अलग-अलग रंगों में रंगकर उससे भी रंगोली बनाई जाने लगी है क्योंकि इन्हें हाथों से पकड़कर रेखाएं बनाने में आसानी रहती है इसके अलावा विभिन्न पुष्पों को रंगोली बनाने में प्रयोग किया जाता है। सूखे और गीले दोनोें प्रकार के रंगों से रंगोली बनाई जाती है सूखे रंगो का उल्लेख पूर्व में वर्णित है और गीले रंगों में मुख्यतः खड़ी मिट्टी का घोल मुख्य होता है जो आसानी से मिटाया-धोया जा सकता है अधिक समय तक रंगोली को रखने के लिए अब आॅयल पंेट का भी प्रचलन बढ़ने लगा है। वर्तमान में दीपावली आदि त्यौंहारों पर तो बाजार में रंगोली बनी बनाई मिलती है । इस प्रकार मिलने वाली रेडिमेड रंगोली में छपे-छपाये स्टिकर्स मिलते हैं जिनपर रंगोली के पैटर्न होते हैं आप उन्हें फर्श और घर के बरामदों में चिपकाकर सजावट भी कर सकते हैं।
रंगोली कला का अपना ही महत्व है इसे आज अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के तौर पर भी देखा जा रहा है कई आयोेजनों में देश-विदेश से जुड़े मसलों और समस्याओं केे रंग आसानी से देखे जा सकते हैं ये चित्र और रंग अनायास ही आप का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं और व्यक्ति एक बार सोचने पर विवश हो जाता हैं । वैसे महिलाओं में इस कला के प्रति अतीव लगाव रहता है जिसके चलते वे नये-नये प्रयोग करके इसमें बदलाव भी करती रहती हैं जिससे नवीनता बनी रहती है । लेकिन आधुनिक दौर में जहां कला ने किसी भी बंदिश को अस्वीकारा है पुरूष भी रंगोली कला में सिद्धहस्त होने लगे हैं पानी पर तैरते रंगो से बनाई जाने वाली रंगोली देखते ही बनती है और आपका मन जीत लेती है। भारत में रंगोली बनाने जैसी छोटी-बड़ी कई लोक कलाएं हैं जो संास्कृतिक महत्व रखती हैं आज जरूरत बस इतनी है कि उसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी जन साधारण को उपलब्ध करवाई जा सके, ऐसे विषय समूह चर्चा का विषय बने, इन्हें राष्ट्रीय महत्व से जोड़कर देखा जाए, आयोजनों को सफल बनाने के लिए महिलाएं आगे आयें रंगोली ही नहीं वरन् इसके जैसी कई लोक-कलाओं को संजोकर रखा जाना चाहिए ताकि इसे हम आने वाली पीढि़यों को अवगत करा सकें ।
815,बल्ल्भ कुंज नानक मार्ग गांधी काॅलोनी,
जैसलमेर,(राज.)

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