दैवीय आपदा की काल दृष्टि से सकपकाई सरकार ने नंदा राज जात आयोजन से हाथ खींचे. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

दैवीय आपदा की काल दृष्टि से सकपकाई सरकार ने नंदा राज जात आयोजन से हाथ खींचे.

  • समिति ने कहा राज जात नियत तिथि से होगी प्रारम्भ, 
  • ऐतिहासिक दृष्टि में नंदा राज जात और राज छन्तौली का इतिहास


हिमवत राजा की पुत्री नंदा की विदाई का समय ज्यों ज्यों नजदीक आता जा रहा है, राज्य सरकार की दिल की धडकनों में तेजी आनीं शुरू हो गयी है. आनी स्वाभाविक भी हुई अभी वह केदारनाथ सहित पूरे चारधाम क्षेत्र में दैवीय आपदा की त्रासदगी से पूरी तरह निबटी भी नहीं है कि माँ नंदा की कैलाश जाने की तैय्यारी ने उसके हाथ पाँव फुला दिए हैं. मजबूरन सरकारी तंत्र किसी बड़ी अनिष्ट की आशंका को भांप कर इस राज जात के आयोजन में अपनी भागीदारी से पीछे हट गयी है, वहीँ दूसरी ओर श्री नंदा देवी राज जात समिति ने सरकार के माथे पर यह कहकर पसीने की बूंदे ला दी हैं कि यह राजजात होकर रहेगी.

इस दैवीय आपदा ने जो बिघटन का तांडव दिखाया है, जाहिर सी बात है कि इस दैवीय आपदा के हिसाब से नंदा राज जात के आयोजन में भागीदारी करना खौलती कढ़ाई में पैर डालना जैसा ही दीखता है. अब राज जात का लग्न पूर्व ही निर्धारित किया जा चुका है तब इसे टालना भी एक यक्ष प्रश्न है क्योंकि विद्वानों का मत यह भी है कि केदारनाथ के कपाट खुलने में जो लग्न निहित था उसमें कुछ घंटों के फेर बदल के कारण पूरी केदार घाटी में मन्दाकिनी नंदी ने जो तांडव दिखाया वह आज भी तन बदन में सिहरन दौड़ा देता है. वहीँ इन धार्मिक यात्राओं में निषिद्ध वस्तुओं के खुले प्रचलन ने भी प्रकृति एवं देव आत्माओं का मिजाज बदल दिया है जिससे आये दिन दैवीय प्रकोप से मानवीय मूल्यों को दो चार होना पड रहा है. पढ़ी लिखी वर्तमान पीढ़ी ने धर्म आस्था और विश्वास का जो खुला मजाक उडाना शुरू कर दिया है उसका खामियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा. हाल ही में इस चार धाम यात्रा में केदारनाथ की धार्मिक यात्रा पर निकले तीर्थाटको के दो प्रसव होने की भी जानकारी मिली है, जबकि शास्त्रों में रजोगुणी महिला व कन्याओं का भी यात्रा करना निषिद्ध है. यहाँ एक आशंका फिर जन्म लेती नजर आ रही है कि कहीं नंदा राज जात में इन बातों को भी अनदेखा किया गया और कड़ाई से इन बिन्दुओ का अनुपालन नहीं किया गया इस सम्बन्ध में चांदपुर गढ़ी के नजदीक सेम गॉव के मंशा राम सेमवाल बताते हैं कि इतिहास गवाह है कि १४ वीं शताब्दी में कनौज के राजा जसधवल (जसोधर)  ने जब गढ़वाल नरेश के लाख मना करने पर भी अपने शाही शौकों को पूरा करने के लिए अपनी रानी बलम्पा जिसका प्रसव होना था को साथ लेकर दास दासियों और पातरों (नर्तकियों) के साथ पूरे लाव-लस्कर के साथ यात्रा प्रारम्भ की थी और जब यह जात्रा कैलाश पर्वत के उन पवित्र स्थलों पर पहुंची जहाँ कई निषिद्धताएं लागू हैं, ऐसे में राजा जसधवल द्वारा पातरों से नृत्य प्रारम्भ करवाकर सारी विलासिता की हदें पार कर दी तब रुष्ट होकर माँ नंदा ने राजा गढ़वाल को स्वप्न में दर्शन देकर आगाह भी करवा दिया था, इस स्थान का नाम तब से पातर नचैनिया प्रचलित हो गया है. कहा जाता है कि राजा जसधवल को सबक सिखाने के लिए माँ नंदा ने जितनी भी पातर (राज नर्तकियां) थी उन्हें यही काल ग्रास बना डाला.

उनके पूर्वजों से प्र्राप्त जानकारी के अनुसार इस अनिष्ट के तत्काल बाद राजा गढ़वाल ने जात को रोकने का ऐलान कर दिया था लेकिन राजा जसधवल ने राजा को यात्रा जारी रखने का आग्रह किया, अतिथि देवो भवरू की परंपरा निभाने वाले राजा गढ़वाल को मन मसोसकर जात जारी रखनी पड़ी, प्रसव पीड़ा की वेदना झेल रही रानी बलंपा ने स्वीली ओड्यार नामक स्थान पर मृत बच्चा जना जिसके कारण सूतक हो गया, फिर क्या था माँ नंदा क्रुद्ध हो गयी उसने काली रूप धारण कर लिया. नंदा जात जैसे ही वेदनी बुग्याल पहुंची भयंकर ओलावृष्टि शुरू हो गयी, जिसमें दबकर हज़ारों सैनिकों सहित राजा रानी सभी की मौत हो गयी. आज भी रूप कुंड के आस-पास फैले बुग्यालों में तत्कालीन मानव अस्थियाँ सर्वत्र फैली दिखाई देती हैं.

उपरोक्त ऐतिहासिक पहलू को यदि इस राज जात में भी नजर अदांज किया गया तो मुझे लगता है कि किसी बड़े अनिष्ट से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस तरह प्रकृति ने कहर बनकर प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया है उससे हमें यह सबक लेना जरुरी हो गया है. श्री नंदा देवी राज जात मंदिर समिति को इतिहास और धार्मिक तथ्यों का विशेष ध्यान रखकर ही अग्रिम फूंक-फूंककर कदम बढ़ाना होगा, अभी बरसात अपने शुरूआती चरण में है और अगले माह यह अपने पूरे आवेश में रहती है. दूसरी तरफ इस हिमालयी भू-भाग में जिन जिन स्थानों से यात्रा गुजरनी है बर्फीली चादर, बर्फीली हवाएं और कडकडाती ठण्ड से आपका सामना होता है. नंदा राज जात का जो रास्ता निमित है उससे गुजरना भी एक बड़ी बहादुरी का काम है. क्योंकि जिस तरह से नंदा राज जात का प्रचार प्रसार हुआ है उससे पूर्व में यह संभावना जताई जा रही थी कि इस बार लगभग ५-६ लाख जन समुदाय की भीड़ उमड़ेगी लेकिन केदार घाटी की दैवीय आपदा को देखते हुए जो डर वर्तमान में श्रधालुओं के दिलो-दिमाग में घुस गया है उससे यह तय है कि अब यह भीड़ १ लाख तक भी पहुँच पाए तो गनीमत है. शायद आयोजक भी यही चाहते होंगे कि यह भीड़ जितनी कम हो उतना शुकून मिलेगा. अब इस राज जात को पिकनिक समझने वाला युवा वर्ग जरुर कम हो जाएगा क्योंकि टीवी समाचारों ने देश के कोने कोने में हाल ही में आई दैवीय आपदा का जो खाका खींचा है उससे लोग दहशतजद हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि में माँ नंदा राज जात का जो उल्लेख मिलता है वह सभी कि जानकारी में है लेकिन कुछ ऐसे तथ्य भी इस जात की गर्भ की गोद में छुपे हुए हैं जिन्हें उजागर करना जरुरी है. कान्सुआ के कुंवारों के प्रतिनिधित्व से पूर्व इस राज जात की अगुवाई चांदपुर गढ़ी से राजा  (टिहरी नरेश) की अगुवाई में हुआ करती थी लेकिन सन १९८७ की राजजात में टिहरी नरेश मानवेन्द्र शाह ने इसे विधिवत कान्सुआ के कुंवारों को सौंप दिया. यहाँ एक बात कुंवरों के वंशजों के दस्तावेजों से पता लगती है कि राज जात का आयोजन स्थल भले ही चांदपुर गढ़ी था, लेकिन इस जात की अगुवाई हमेशा ही कान्सुआ के कुंवरों द्वारा हुई है, टिहरी राज दरवार उसमें अपनी भागीदारी जरुर निभाता आया है. श्री नंदा देवी राज जात समिति के अध्यक्ष डॉक्टर राकेश कुंवर से प्राप्त जानकारी के आधार पर जो उल्लेख मिलता है वह कान्सुआ के कुंवर जमन सिंह से शुरू होता है जिन्होंने सन १८४३ की राज जात की अगुवाई की थी इसके पश्चात सन १८६३ में कुंवर हयात सिंह, १८८६ में कुंवर शिव सिंह, १९०५ में कुंवर बख्तावर सिंह, १९२५ में कुंवर केसर सिंह, १९५१ में कुंवर ध्यान सिंह, १९६८ में कुंवर रघुनाथ सिंह की अध्यक्षता में कुंवर कुशाल सिंह, १९८७ में कुंवर डॉक्टर राकेश सिंह की अगुवाई में नंदा राज जात का सफलता पूर्वक आयोजन हुआ है लेकिन सन १९५१ में भारी ओलावृष्टि और किसी अनिष्ट की संभावना को देखते हुए यह जात्रा नंदाकिनी नदी के इर्द गिर्द तक ही सिमट कर रह गयी थी. पुनरू सन १९६८ से १९८७ तक अतीत के अंधेरों में गुम माँ नंदा की जात्रा को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने से यह जात विधिवत नहीं हो पायी. कहा जाता है कि ईडा बधाणी के जमन सिंह जधोड़ा माँ नन्दा के परम भक्त थे उनके साथ माँ नंदा एक शिला के रूप में उनके घर विराजमान हुई लेकिन जब वह कार्यवश अपने घर से इधर उधर जाया करते थे तो ग्रामीणों को उनके घर आँगन में एक छोटी सी १०-११ वर्षीय कन्या खेलती नजर आती थी, लोगों का विश्मय का ठिकाना न रहा फिर एक दिन माँ नंदा ने स्वयं जमन सिंह जधोडा को सात्क्षात दर्शन देकर कैलाश जाने की इच्छा जताई और पुनरू यह जात्रा प्रारम्भ हुई. आज भी माँ नंदा का वाहन चै सिंघा खाडू (मेंडा) ईडा बधाणी गॉव के जधोडा गुसाईं परिवारों के यहाँ ही जन्म लेता है. देव मान्यताओं के आधार पर माँ की छन्तौलियों के निर्माण का भी बहुत बड़ा महातम है. बिशन सिंह कुंवर बताते हैं कि राज छन्तौलियों के निर्माण और लाने की व्यवस्था का अधिकार कुंवर परिवारों को ही है, भले ही सिल्गुर और बधाण के सोलह सयानों की भी भेंट स्वरुप छन्तौलियाँ आती हैं. कांसुवा के कुंवर राज छन्तौली का निर्माण गॉव बेडी-छीमटा के रुडिया जाति के लोगों द्वारा द्वारा करवाते हैं जो रिंगाल से निर्मित की जाती है. ये रुडिया १२ छन्तौलियों का निर्माण व साथ में देवी के बटुआ का निर्माण भी करते हैं. कांसुवा से नौटी, नौटी से ईडा-बधाणी, और ईडा बधाणी नौटी वापसी के समय जाख गॉव में  देवी का मंगल स्नान कर पूजा अर्चना के बाद वहां के चैहान ख्शाह, लोगो  द्वारा देवी का श्रृंगार भेंट किया जाता है जिसमें नथ, मांगटीका इत्यादि भेंट स्वरुप चढ़ाए जाते हैं जिसे ये लोग स्वनिर्मित करते हैं. चैसिंघा खाडू के लिए गले में एक स्वनिर्मित बटुआ भी भेंट किया जाता है जिसमें  क्षेत्रीय ग्रामीण अपने अपने घर से माँ के लिए भेंट देता हैं. जाख में माँ के मंगन स्नान के दौरान लगने वाले मंगल गीत इतने भाव विभोर होते हैं कि वहां एकत्रित माँ बहनों की आँखों से आंसू निकलने लगते हैं..

“पैरा-पैरा गौरा तू, नाके की नथुली....पैरा- पैरा गौरा तू गौला की हंसुली’ इस प्रकार जागर और मांगल गीतों से माँ गौरा को दुल्हन स्वरुप सजाया जाता है. माँ नंदा के श्रृंगार के बाद जाख गॉव से दियारकोट,कुकडैई, झुरकंडे,नैनी होकर माँ नंदा की डोली नौटी पहुँचती है. जहाँ से माँ की जात की विधिवत शुरुआत होती है. सन १९८७ से पूर्व यह जात चांदपुर गढ़ी से शुरू की जाती थी, यहीं माँ नंदा की मूर्ती आज भी विद्धमान बताई जाती है, जिसे चंद्रवंशी कनकपाल या फिर सूर्यवंशी राजा भानुप्रताप द्वारा स्थापित बताया जाता है. माँ नंदा की इस प्रतिमा को स्थानीय लोग कैलापीरी देवी या काली माँ की भी मानते हैं.  लेकिन वर्तमान में किन व्यवस्थाओं को मध्य नजर रखते हुए इसे नौटी से शुरू किया गया यह बात अब अतीत हो गयी है. क्योंकि एक ओर जहाँ चांदपुर गढ़ी के कुलपुरोहित सेम के सेमवाल और खंडूडा के खंडूरी अपने को राजा के कुलपुरोहित मानते हैं वहीँ नौटी गॉव के नौटियाल अपने को राज पुरोहित कहते हैं. अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि फिर राज जात का आयोजन नौटी से क्यों होता है. कालांतर में इसका आयोजन कहाँ से होता था यह भूतकाल की गर्त में है लेकिन कुछ प्रश्न जरुर मुंह बाए खड़े हो जाते हैं जिनसे विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है, मेरा मानना है कि ऐसे तथ्यों पर अब पूर्णविराम लग जाना चाहिए ताकि ये प्रश्न उठे ही नहीं. एक और प्रश्न यहाँ खड़ा होता है कि राज छन्तौली को ले जाने का अधिकार सिर्फ डयुन्डी ब्राह्मणों को ही क्यों है...?  डयुन्डी ब्राह्मणों के गॉव रतूडा, ग्वालखेत, कोटि, ऐरवाडी और सेम इत्यादि गॉव में हैं, चांदपुर गढ़ी से पूर्व ही ये राज छन्तौली माद्यो घाट (महादेव घाट) से डयुन्डी ब्राह्मणों के हवाले हो जाती हैं, 

चांदपुर गढ़ी से राज छन्तौली के साथ नंदा भगवती को १२ थोकी ब्राह्मण (नंदा देवी के उपासक/पुजारी) की छन्तौली भी कालांतर से माँ भगवती के साथ कैलाश के लिए प्रस्थान करती है जबकि अल्मोड़ा (कुमाऊ) से भी माँ की छन्तौली व खड़ग माँ राज राजेश्वरी की डोली के साथ ब्भ्म्च्क्ल्न्प्छचेपड्यू (नन्दकेसरी) में आकर मिलती हैं. १२ थोकी ब्राह्मणों में सेम गॉव के सेमवाल,खंडूडा के खंडूरी, नैणी के नैलवाल, गैरोली के गैरोला, चमोला के चमोला, रतूड़ा के रतूड़ी, देवल के देवली, मैठाणा के मैठाणी, थापली के थपलियाल, डिमर के डिमरी, नौटी के नौटियाल, नौना के नौनी (नवानी) इत्यादि प्रमुख हैं. इन छन्तौली में सम्मिलित डिमर के डिमरी बद्रीश छन्तौली लेकर चलते हैं. यह १२ थोकी ब्राह्मणों की १२ छन्तौली १२ वर्षों में नंदा की विदाई के स्वरुप प्रदान करते हैं. मंशा राम सेमवाल का कहना है कि १२ थोकी ब्राह्मण राज दरवार में कुल पुरोहित, सरोला इत्यादि सहित विभिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं, कालांतर से वर्तमान तक यह कार्य यथावत चल रहा है.

ऐतिहासिक पहलु पर यदि गौर किया जाता है तब अधिकतर इतिहासविदों का मानना है कि राजा भानुप्रताप की एक ही पुत्री थी जिसका विवाह धारा नगरी के राजा कनकपाल से हुआ, और राजा कनकपाल ने रणथम्बौर (राजस्थान) से यात्रा पर आये अग्निवंशी राजकुंवर असलपाल चैहान से अपनी पुत्री का विवाह कर उन्हें नागपुर गढ़ी का गढ़पति नियुक्त कर दिया जिसका उनके वंशजों ने दबे स्वर में विरोध भी किया लेकिन राजा कनकपाल ने तत्काल इसे शांत कर दिया. राजघरानों की आपसी ऐंठ में उलझे चांदपुर गढ़ी और नागपुर गढ़ी के राज वंशी परिवारों में धीरे-धीरे खाइयां बढ़नी शुरू हो गई, (राजा भानुप्रताप एक इकलौती पुत्री होने का वर्णन जहाँ इस प्रकार मिलता है-“भानु प्रतापो भूपालरू सुर्यवंश समुदव, गढ़े चान्द्पुरे राजा कन्या मात्र प्रजोभ्यरू”) यह लड़ाई राजा कनंपाल की मृत्यु के बाद और बढ़ गई नागपुर गढ़ी के गढ़पति असलपाल चैहान जो सूर्यवंशी हुआ करते थे यहाँ रहने के पश्चात नागवंशी कहलाने लगे. असलपाल चैहान के वंशज असवाल कहलाये क्योंकि असलपाल नाम का अपभ्रंश होकर असवाल हो गया. और फिर अधो असवाल, अधो गढ़वाल की नींव पड़ी. इन दो गढि़यों की इस आपसी रंजिश ने ही बावन गढि़यों को जन्म दिया. टूटते बिखरते गढ नरेश पर पडोसी राजाओं की वक्र दृष्टि पडनी शुरू हो चुकी थी. अश्व सुसज्जित असवाल अब अस्वारोही भी कहलाने लगे, इन्हें कई इतिहासविदों ने अश्वारोही ही पुकार कर असवाल जाति की उपाधि दे डाली लेकिन सच यह है कि तब आधे गढ़वाल पर असवाल जाति का अधिकार था और आधे पर चंद्रवंशी राजाओं का. कुमाऊं के राजाओं ने जब रूहेला, मराठा सैनिकों के साथ मिलकर जोशीमठ तक कब्ज़ा जमा लिया था तब मजबूरन चंद्रवंशी राजाओं की संततियों ने सन १५०० ई. में श्रीनगर और नागवंशी थोकदार भजन सिंह असवाल ने असवालयूँ में ८४ गॉव की जागीर के साथ नगर गॉव की स्थापना की. कालांतर में माँ नंदा की राज जात का महात्मम यूँ तो राजा हिमवत से माना जाता है जिनका शासन पूरे हिमालयी क्षेत्र पर था लेकिन कब इसकी शुरुआत हुई उसका सम्पूर्ण उल्लेख जुटाना संभव नहीं है.

प्रसंग विस्तृत है और हम मुख्य मुद्दे से भटक रहे हैं. इसलिए मुख्य मुद्दे पर लौटते हुए मेरा कहना यह है कि जिस तरह १२ वर्षों में नंदा देवी राज जात का आयोजन होता आ रहा है और ऐसा भी नहीं है कि हर १२ वर्ष बाद ही इसका आयोजन बहुत जरुरी है. सन २००० के आयोजन के बाद सन २०१२ में इसका आयोजन होना था लेकिन मलमास होने के कारण इसे सन २०१३ में टाल दिया गया. हाल ही में श्री माँ नंदा राज जात समिति की बैठक में आखिर यह तय हो ही गया है कि इस वर्ष सितम्बर माह में हर हाल में माँ नंदा राज जात का आयोजन होना है. इस घोषणा के बाद अब किन्तु परन्तु जैसे शब्द भले ही समाप्त हो गए हैं लेकिन  दैवीय आपदा से जूझ रहे पहाड़ के सभी मूल निवासी अभी भी भयातुर हैं. वहीँ श्री नंदादेवी राज जात समिति ने भले ही सरकार की इस घोषणा के बाद यह कह दिया हो कि अब लग्न निकाल दिया गया है राज जात होकर रहेगी लेकिन डरे हुए तो ये लोग भी होंगे क्योंकि किसी भी अनिष्ट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता और देव योग से ऐसा हो गया तो समिति इसकी भरपाई कैसे कर पाएगी. समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने क्षेत्रीय जनता और पूरे देश विदेश से आने वाली जनता से विनम्र भाव से अनुरोध करते हुए कहा है कि इस धार्मिक राज जात को धर्म और आस्था से जोड़कर ही देखे जो भी जन मानस रजोगुणी/तमोगुणी हों उन्हें इस पवित्र राज जात यात्रा में अपनी भागीदारी से बचना चाहिए., उन्होंने युवावर्ग से भी अनुरोध किया है कि राज जात की महत्तता को समझते हुए इसे पिकनिक स्पॉट न समझे और जरुरी निषिद्धताओं के साथ ही इसमें अपनी अमूल्य भागीदारी दें ताकि इस हिमालयी भू.भाग की धर्म परायण संस्कृति भी जीवित रहे और माँ नंदा का प्रकोप किसी को न झेलना पड़े. पूर्व घटित राजा यशधवल द्वारा की गयी यात्रा के दौरान हुए बिनाश का संस्मरण रखते हुए अपनी प्रवृति में सात्विकता लायें. इस राज जात में माँ नंदा द्वारा मायके की याद आने की जागर सुनकर तन बदन के रोंवे खड़े हो जाते हैं जैसे- 

मेरा रे मैत्युं की क्वी रंत न खबर, 
मेरा रे मैत्युं की क्वी रंत न रैबार.
मैतुडा की याद मी घूरी-घूरी आंदी.
डान्डयूँ की कुयेड़ी क्या गंगाडू मुकीगे..
पयारु बेलूरी स्या पैत़ासाड़ी रैगे.
मैतुडा की याद मी घूरी-घूरी आंदी.

माँ नंदा की राज जात में सन १८०४ के बाद से व्यवधान पड़ा बताया जाता है जिसे सन १८४३ से पुनरू शुरू किया गया, जो सन १८६३, १८८६, १९०५, १९२५ ,१९५१, १९६८, १९८७, २००० में आयोजित की गयी. माँ नंदा देवी के उत्पन्न होने का कौन सा काल रहा होगा लेकिन हम लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व इसका उत्पत्ति काल (उत्तरगुप्त काल) मान सकते हैं क्योंकि तत्कालीन समय के राजाओं ने भी माँ नंदा की स्तुति वंदना और जात का आयोजन किया था. पान्दुकेश्वर से प्राप्त कत्युरी राजवंश के ताम्रपत्रों में माँ नंदा का विवरण इस प्रकार मिलता है-

१-ललितसूरदेव ताम्रपत्र (अनु. समय-नौवीं सदी ई.)
...नंदा भगवती चरण कमालासनाय मूर्ती.../
२.पदमदेव ताम्रपत्र (अनु. समय- दसवीं सदी ई.)
....नंदा देवी चरण कमल लक्ष्मीत....’
३.सुभिक्षराजदेव ताम्रपत्र (अनु. समय- दसवीं सदी ई.) 
....नंदा देवी चरण कमल लक्ष्मीत....

यही नहीं इस युग की पुराण गाथाओं में भी नंदा नाम और उत्पत्ति गाथा का पता चलता है. इस सम्पूर्ण क्षेत में देवी नंदा को भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न नामों का सम्बोदन मिलता गया जिसमें शैलपुत्री, काली (कालरात्रि), कात्यायिनी, विंध्यवासिनी,  पार्वती, चंडी, त्रिनेत्रा इत्यादि नाम सम्मिलित हैं.

यत्र नार्यस्तू पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता..( जहाँ नारी की पूजा होती है वही देवता निवास करते हैं) या किंवदंती आज भी प्रचलित है. सैकड़ों वर्ष पूर्व से नंदा की इस विश्मयकारी यात्रा का अनूठा आकर्षण विश्व भर में रहा. ब्रिटिश राजकाल के दौरान भी कई अंग्रेज अफसरों ने माँ नंदा और उसके ट्रेक पर रिसर्च किया लेकिन हर बार अधूरा ही काम रहा. विगत कई वर्षों से नंदा देवी के विभिन्न पहलुओं पर शोध कर रहे डॉ. विल्लियम एस. सेक्स माँ नंदा की इस धार्मिक राज जात से इतने प्रभावित हुए हैं कि नौटी गॉव के नौटियाल वंशजों के कुनवे में शामिल होकर उन्होंने अपना नाम ही बद्री प्रसाद नौटियाल रख दिया है. ब्रिटिश काल में सन १८८२ से ही नंदा पर्वतशिखर पर पर्वतारोहण शुरू हो गया था लेकिन सन १८३४ ई. में ब्रिटिश पर्वतारोही एरिक शिप्टन  और टिटमैंन ही वह मार्ग खोजने में सफल हो सके जो ऋषि गंगा और द्रोणागिरी गॉव होकर हिम नदों के कगार से बचकर नंदा नन्दा शिखर तक पहुँचता है. माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाला पहला अमेरिकी अन्सोल्ड माँ नंदा की उतुंग शिखर को देख इतना प्रभावित हुआ कि उसने कामना की कि यदि उसकी पुत्री हुई तो वह उसका नाम भी नंदा ही रखेगा. माँ ने उसकी मन्नत पूरी की और उसने अपनी पुत्री का नाम ही नंदा ही रख दिया. सन १९७७ में उसने अपनी पुत्री नंदा के अनुनय विनय पर पुनरू भारत आकर नंदा शिखर का रोहण करना शुरू किया, जहाँ पहुँचकर उनकी पुत्री ने जिसे वह देवी कहकर संवोदित करते थे अचानक गंभीर और शांत हो गयी. भारी बर्फवारी शुरू हुई और वह ठन्डे स्वर में अपने पिता से बोली-“ थ्।ज्भ्म्त् प् ।ड ळव्प्छळ ज्व् क्प्म्” इतना कहने के पश्चात वह मर गयी. इस स्तब्धकारी मर्मान्तक वेदना को विली अन्सोल्ड ने अपनी पुस्तक “अल्पाइन अमेरिकन जनरल-२१, १९७७” में वर्णित किया है.

माँ नंदा की राजजात में पूरी जात के नेतृत्व की अगुवाई चैसिंघा खाडू करता है. उसके पश्चातलाटू देवता का निशाण (ध्वज), तीसरे स्थान पर राज छन्तौली व नौटी गॉव की डोली छन्तौली, चैथे स्थान पर अन्य देवी देवताओं रिंगाल वाली छन्तौली के वाहक, और अंत में भोजपत्र निर्मित छन्तौलियों के साथ यात्री जात्रा करते हैं. १९ पडावों से गुजरने वाली यह यात्रा २८० किलोमीटर की एक साहसिक जात्रा है जिसे पूरा करना एक स्वप्न पूरा होने जैसा है. हिमवत पुत्री की इस कारुणिक विदाई में सम्मिलित होने वाले हर नर नारी की आँखें भर आती हैं. वर्तमान में नौटी से शुरू होने वाली यह विदाई १९ पड़ाव पार कर त्रिशूली कांठे की जड़ होमकुंड में चैसिंघा खाडू माँ नंदा को अर्पित भेंट के साथ सम्पन्न होती है.






---मनोज इष्टवाल---

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