सुप्रीम कोर्ट ने लगाई 'राइट टू रिजेक्ट' पर मुहर. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई 'राइट टू रिजेक्ट' पर मुहर.

सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने मतदाताओं को 'राइट टू रिजेक्‍ट' देने के लिए सरकार से कहा है। यानी वोटर चाहे तो वह किसी भी उम्‍मीदवार को नहीं चुनने का विकल्‍प चुन सकता है। इसके लिए ईवीएम में 'किसी को नहीं' का विकल्‍प जोड़े जाने के लिए कहा है। 

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब केद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला अध्‍यादेश के जरिए पलट दिया है। यह फैसला दागी सांसदों के मुद्दे पर था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार अध्यादेश ले लाई। यह अध्यादेश कैबिनेट की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति की अदालत में है।

गुरुवार शाम भाजपा नेताओं ने राष्ट्रपति से मिलकर इस अध्यादेश को स्वीकृति न देने की गुहार लगाई। भाजपा नेताओं का तर्क था कि यह अध्यादेश गैर कानूनी है और इससे संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी है। इसके बाद सरकार के तीन मंत्री कानून मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा के आरोपों पर राष्ट्रपति को सफाई दी। 

इन मंत्रियों का कहना था कि किसी दोषी या दागी को बचाने की कोशिश सरकार नहीं कर रही है। सरकार सिर्फ यह कोशिश कर रही है कि उस सांसद या विधायक की सदस्यता तब तक न जाए, जब तक ऊपरी अदालत निचली अदालत के फैसले को मान्य न ठहरा दे। सरकार ने राष्ट्रपति से यह भी कहा है कि नियम ८(४) के तहत दोषी सांसद को अपील का अधिकार है और अगर ९० दिन के अंदर उसकी अपील मंजूर कर ली जाती है तो फिर ऊपरी अदालत के फैसले का इंतजार करना पड़ेगा। किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय न हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकार का दायित्व है और अगर निचली अदालत से दोषी साबित हुआ व्यक्ति ऊपरी अदालत से बरी हो जाता है तो उस स्थिति में नियम ८(४) पर संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए सरकार को यह अध्यादेश लाना पड़ा है।

सूत्रों ने बताया है कि सरकार की दलील सुनने के बाद इस विषय पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की बातचीत हो सकती है।वैसे, यह भी स्पष्ट किया है कि संभवत: इस बातचीत के बाद ही राष्ट्रपति अपनी मंजूरी अध्यादेश पर देंगे। कांग्रेस में ही अध्यादेश को लेकर मतभिन्नता: इस अध्यादेश पर भाजपा तो विरोध कर ही रही है, कांग्रेस के अंदर भी इसको लेकर मतभिन्नता है। कांग्रेस नेता अनिल शास्त्री ने कहा है कि इस अध्यादेश से पार्टी को नुकसान हो सकता है। युवा नेता और केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने भी इस अध्यादेश पर आपत्ति उठाई है। ऐसे में, सरकार के अंदर भी इसका विरोध देखने को मिल रहा है। कैबिनेट की बैठक में दो वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों वीरप्पा मोइली और जयराम रमेश ने भी इस पर सवाल उठाए थे। लेकिन, वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने गुरुवार को भी इस अध्यादेश को न सिर्फ जरूरी बताया, बल्कि यह भी कहा कि यह सरकार का सही फैसला है। चिदंबरम ने यह भी कहा कि इस बारे में जब सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी तो भाजपा ने इसका समर्थन किया था, सिर्फ बीजद ने इस पर एतराज जताया था। 

हालांकि, सरकार ने राष्ट्रपति को यह साफ कहा है कि यह अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को और मजबूती देता है और उसी के समर्थन में है। इस तरह से सरकार अपना पक्ष यह साफ कर रही है कि अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता है।

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