- - शिक्षक स्व. श्रीकृश्ण मिश्र की धर्मपत्नी लीला देवी को किसी प्रकार का लाभ मसलन पारिवारिक पेंशन, उपादान, भविश्य निधि, अंतिम निकासी समेत अन्य सेवांत लाभ नहीं दिया गया है. यहां तक कि उन्हें पेंशन तक उपलब्ध नहीं कराये गये
कुमार गौरव, मधेपुरा. दिन, महीने, साल नहीं बल्कि चार दशक बीत गये लेकिन इसे शिक्षा विभाग की उदासीनता कहें या फिर कुछ और कि चार दशक बीतने के बाद भी एक शिक्षक के परिजन की न तो सुध ली जा रही है और न ही उनके परिजनों को सेवांत लाभ ही दिया गया. जिस कारण आज चार दशक 39 साल बीतने के बाद भी शिक्षक के परिजन को इंतजार है सेवांत के बाद मिलने वाली राशि और अन्य लाभ का. जी हां हम बात कर रहे हैं गम्हरिया प्रखंड के बभनी ग्राम निवासी स्व. श्रीकृश्ण मिश्र की. जो कि बतौर शिक्षक जिले के शंकरपुर प्रखंड स्थित झरकाहा नंबर 02 में पदस्थापित थे और संक्रामक रोग की चपेट में आने से सेवा काल में ही 20 अक्टूबर 1974 को देहावसान हो गया. बाद में परिजनों द्वारा सेवांत लाभ के लिए काफी जद्दोजहद भी की गयी लेकिन नतीजा सिफर रहा. विभागीय बाबू कभी फाइल में कमी का हवाला तो कभी सुविधा शुल्क की बात कह मामले को टरकाते रहे. बता दें कि स्व. श्रीकृश्ण मिश्र की सर्विस बुक में भी इस बात का जिक्र किया गया है कि उन्होंने 20 अक्टूबर 1974 तक अपना योगदान दिया और इसका सत्यापन भी विद्यालय प्रबंधन द्वारा किया गया है. साथ ही कहा गया कि स्व. श्रीकृश्ण मिश्र द्वारा 01 अप्रैल 1973 को मध्य विद्यालय झरकाहा नंबर 02 में बतौर शिक्षक योगदान की शुरूआत की गई और 20 अक्टूबर 1974 को उनका देहावसान हो गया. यही नहीं शिक्षा अधीक्षक सहरसा द्वारा जारी पत्रांक संख्या 1922 दिनांक 05 अगस्त 1959 में उनकी नियुक्ति दर्शायी गयी है और पत्र के आलोक में दिनांक 14 अगस्त 1959 को निम्न प्राथमिक विद्यालय बालाटोल में बतौर सहायक शिक्षक उनकी पहली ज्वाइनिंग हुई.
लेकिन विडंबना यह है कि विभाग इसे मानने को तैयार नहीं जबकि सारे साक्ष्य प्रमाणित नजर आते हैं. हालांकि काफी जद्दोजहद के बाद उनकी फाइल को आगे तो बढ़ायी गयी लेकिन बात जब सेवांत लाभ की आयी तो फाइल को किस वजह से दबा दी गई यह समझ से परे है. बाद में परिजनों ने मामले को हाईकोर्ट तक ले जाने की सोची और वहां भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया गया लेकिन बावजूद इसके आज तक शिक्षक स्व. श्रीकृश्ण मिश्र की धर्मपत्नी लीला देवी को किसी प्रकार का लाभ मसलन पारिवारिक पेंशन, उपादान, भविश्य निधि, अंतिम निकासी समेत अन्य सेवांत लाभ नहीं दिया गया है. यहां तक कि उन्हें पेंशन तक उपलब्ध नहीं कराये गये. बिहार पेंशनर समाज द्वारा मामले में सक्रियता दिखाये जाने के बाद कुछ दिनों तक तो लगा कि शायद बात बन जायेगी लेकिन ऐसा हो न सका. फिर मामले को लेकर 16 नवंबर व 14 दिसंबर 06 के डीएम जनता दरबार में भी गुहार लगायी गयी और तत्कालीन डीएम ने शिक्षा अधीक्षक को इस संबंध में आवश्यक दिशा निर्देश भी दिया था, लेकिन अब तक कार्रवाई के नाम पर सिफर ही है.
कहते हैं विधायक:
इस संबंध में स्थानीय विधायक प्रो चंद्रशेखर का कहना है कि उन्हें इस बारे कोई जानकारी नहीं है. जल्द ही इस दिशा में सार्थक प्रयास किये जायेंगे ताकि उक्त शिक्षक के परिजनों को न्याय मिल सके.
कुमार गौरव,
मधेपुरा.
बिहार

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें