अपनी क्षमताओं के अनुरूप लक्ष्य का निश्चय करना चाहिए और लक्ष्य के अनुरूप योजनाबद्ध प्रयासों के साथ मेहनत करने की जरूरत होती है। ऎसा होने पर ही हमारा जीवन सफलता पा सकता है और खुद के लिए भी आत्मसंतुष्टि तथा औरों के लिए भी यादगार सिद्ध हो सकता है।
आज लक्ष्य बनाने से लेकर लक्ष्य पाने और पूर्णता तक का हमारा सारा सफर गड़बड़ाया हुआ है और यही कारण है कि हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों में अपेक्षित सफलता पाने की बजाय कई बार असफलता और हताशा ही हाथ लगती है।
बात हमारी पीढ़ी की ही नहीं है बल्कि नई पीढ़ी की भी है। सामाजिक प्राणी के रूप में हमने अपनी सारी विशेषताओें को भुला दिया है और कबीलाई संस्कृति की ओर डग बढ़ाने लगे हैंं। हमारे पुरखों ने अपनी काबिलियत के बूते भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया था।
आक्षितिज पसरे हुए विराट विश्व को नाप डाला था और वे जमीन से लेकर आसमाँ तो क्या पूरे ब्रह्माण्ड तक की खबर रखने का माद्दा रखते थे। उन्हीं के वंशजों के रूप में हम आज कहाँ जा रहे हैं, किसी को कुछ कहने-सुनने या सुनाने की आवश्यकता नहीं है।
खासकर नई पीढ़ी के सामाजिक और परिवेशीय संस्कारों को देखा जाए तो हमें यह समझना चाहिए कि हम निरन्तर सिमटते जाने की स्थिति में आ गए हैं। हमारी यह पीढ़ी कम्प्यूटर, इंटरनेट, टीवी, मोबाइल, डिब्बाई गेम्स, ईयरफोन और महीन तारों के जंजाल और ऎसे इलेक्ट्रॉनिक डिब्बों में उलझ कर रह गई है कि लगता है जैसे मकड़ी कल्चर हमारे जीवन में घर कर गई है।
हम सारे के सारे अपने-अपने दड़बों में घुस कर बैठे रहने और भोग-विलासिता का आनंद पाने को ही अपने सम्पूर्ण जीवन का लक्ष्य मानकर जीने के लिए मर-मर कर सारे काम कर रहे हैैं। बात घर की हो, किसी सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यक्रम की अथवा किसी भी तरह के सफर की। हर तरफ आजकल लड़के-लड़कियों से लेकर प्रौढ़ों, अधेड़ों आदि को मोबाइल चलाते, कानों में ईयर फोन लगाए गाने, भजन या बातें सुनने, गेम्स या फिल्म्स देखते रहने और उन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में रमे रहने को देखा जा सकता है जो आजकल हर हाथ में खिलौनों की तरह हो गए हैंं।
आदमी किसी समय बचपन में खिलौनों से खेलने का आदी रहा है लेकिन आज का इंसान अब मरते दम तक इन खिलौनों से खेलता रहता है और उसी में मस्त रहता है। आजकल हम किसी सफर में हों या किसी फंक्शन में, तब भी हम बाहर की हलचलों से अनभिज्ञ रहकर या मुंह मोड़कर अपने इन्हीं छोटे डिब्बों में या तारों के जंजाल में घुसे रहते हैं कि बस। हम घर में रहते हैं तब भी हमें पता नहीं रहता कि हमारे मां-बाप या घरवाले क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं और क्या चाह रहे हैं।
हमने आपको इतना कछुवा छाप बना डाला है कि हमें कोई खबर नहीं है। हम इन डिब्बों में ही घुसे रहते हैं और इन डिब्बों ने हमें डिब्बा छाप बना डाला है। हम सारे के सारे इतने कछुवा छाप आदमी हो गए हैं कि हम स्वभाव तो रेंगने का बना चुके हैं मगर आसमान में छलांग लगाने और उड़ने को मचलते रहे हैं।
हमें यह पता होना चाहिए कि कछुवाछाप बने रहकर आसमाँ की ऊँचाई न कोई आज तक पा सका है, न कभी संभव है। आसमाँ की ऊँचाई पाने के लिए जरूरी है हौंसले और मजबूत पंख। कछुवाछाप इंसान बनने से बचें और जानें अपने आस-पास को, समाज और देश को।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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