दिल्ली या मुंबई के नए पौध जब मानव अधिकार की बात अपने लिए करते हैं तो बात हास्यास्पद भी नहीं लगता है, विकिपीडिआ से इतर मानव के अधिकार के झंझावत को समझने की कोशिश महानगरीय बच्चे ने शायद ही कभी की हो, कर्तव्य से इतिश्री कर लेने वाले पीढ़ी को अब मानवाधिकार का अर्थ केवल अपने अधिकार में सिमट कर रह गया है जिसमें से कर्तव्य गौण है !!!
मानवाधिकार ने हमेशा मुझे द्वंद्व में डाला है जब नक्सल प्रभावित इलाका छत्तीसगढ़ के धमतरी बस्तर जगदलपुर की सीधी सड़क यात्रा की......
जर जंगल जमीन से जुड़ा वो स्थानीय मूल निवासी आदिवासी जो अपने पहचान के लिए ही संघर्ष कर रहा है या फिर उस पर जबरिया शहरी विकास थोपने वाला व्यवसायी व्यापारी का मित्र सरकार या फिर तंत्र के लिए शहीद होते जवान या फिर अपने जर जंगल के लिए बन्दूक उठाने वाला आदिवासी !!!!
मूल निवासी को शहरी विकास नहीं चाहिये जो उसके जमीन से उसे जुदा कर दे, उसे तो बस वो विकास चाहिए जो उसके जंगल को यथास्थिति में तंत्र उसके हक़ को मुहैया करवाए.....जंगल के लोगों को रोजाना की इतनी कमाई नहीं चाहिए जिस से वो दो हजार के जींस और चार हजार के जूते खरीद सके, वस्तुतः आधुनिकी व्यवस्था ही उसे नहीं चाहिए मगर तंत्र अपने शहरी विकास की परिभाषा को जंगल पर थोपना चाहे हित स्पष्टतः व्यवसाई वर्गों का और सरकार के व्यवसाई मित्रों के हितों की रक्षा के लिए शहीद होता जवान........
मानव अधिकार मानों आधुनिकीकरण के भेष में वास्ताविकीकरण का निवाला बन गया हो !!!
---रजनीश के झा---
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