विशेष आलेख : मध्याह्न भोजन से नहीं भर रहा बच्चों का पेट - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 20 अगस्त 2014

विशेष आलेख : मध्याह्न भोजन से नहीं भर रहा बच्चों का पेट

1995 में जब बिहार में मध्यान्ह भ¨जन य¨जना की शुरुआत की गई त¨ इसका उद्देश्य  बच्च¨ं क¨ प©ष्टिक आहार उपलब्ध करवाने के साथ-साथ स्कूल आने में उनकी रुचि बढ़ाना भी था।निसंदेह इस योजना की वजह से ही स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है। लेकिन धीरे-धीरे इस य¨जना का भी वही हश्र हुआ ज¨ बाकी अन्य य¨जनाअ¨ं का ह¨ता है। बल्कि यहां मामला ज्यादा संवेदनशील बना क्य¨ंकि यहां पर मासूम बच्च¨ं की जिंदगिय¨ं का सवाल था। लेकिन जल्द पैसा कमाने की चाह में भ्रष्टाचार में आकंठ में डूबे ल¨ग¨ं ने इसका भी ध्यान रखे बिना य¨जना क¨ वहां पहुंचा दिया जहां उनका एक भ्रष्टाचार से कमाया गया एक रुपया मासूम¨ं के खून से रंगा जाने लगा। कालिख बर्तन, थाली, मैले-कुचैली किचेन सामग्रियां, खुले आसमान  के नीचे बनता मध्याह्न भोजन आदि, आदि, मौत को दावत दे रहे हैं। 
         
बिहार के स्कूलों में अनियमितता के कारण कई बड़े हादसे हुए हैं। साल 2013 के जुलाई के महीने में जिले के अन्तर्गत आने वाले धर्मसती गंडामन प्राथमिक विद्यालय में मिड डे मील का जहरीला खाना खाने से 23 बच्च¨ं की जान चली गई थी। इस घटना ने न सिर्फ बिहार बल्कि देश भर के ल¨ग¨ं के मन आक्र¨श भर दिया था। सरकार ने इस हादसे के बाद कई ठोस रणनीतियां बनायी। घटना के बाद पौष्टिकता व गुणवता में व्यापक सुधार करने के लिए सभी अधिकारियों समेत स्कूल प्रधान को कड़ा आदेश दिया था। सालभर तक स्कूलों में मध्याह्न भोजन की हालत अपेक्षाकृत सुधार की ओर थी। लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया और अधिकारी व शिक्षा समिति सुस्त होते गयें। और मिड-डे-मील की हालत ‘‘पुनः मुषको भवः’’ हो गयी। 
    
मुजफ्फरपुर जिले के चांदकेवारी व हुस्सेपुर पंचायत के आधा दर्जन स्कूलों में रसोई घर की व्यवस्था नहीं होने की वजह से खुले आसमान के नीचे भोजन पकाने की मजबूरी है। मेन्यु के अनुसार बच्चों को खिचड़ी नहीं मिल रही है। रसोईघर के इर्द-गिर्द कचरेे का अंबार लगा हुआ है। तदर्थ शिक्षा समिति के अध्यक्ष, सचिव व सदस्य केवल नाममात्र के समिति से जुड़े हुए हैं। अधिकतर मध्याह्न भोजन जमीन पर कम कागज पर ज्यादा दिखता है। हुस्सेपुर उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक कहते हैं कि भवन नहीं रहने के कारण भोजन का निर्माण खुले आसमान के नीचे हो रहा है। वहीं उर्दू प्राथमिक विद्यालय के प्रधान मो. हसरत अली शिक्षा समिति की उदासीनता को मध्याह्न भोजन के संचालन में अड़ंगा मानते हैं। पंचायत के स्कूलों में शुद्ध पेयजल, भोजन निर्माण, साफ-सफाई, रख-रखाव आदि मध्याह्न भ¨जन के प्रावधान¨ं के अनुसार नहीं चल रहा है। पंचायत समिति अशोक प्रसाद ने कहा कि रजिस्टर में नामांकित बच्चों के हिसाब से राशन का उठाव होता है, लेकिन स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बिल्कुल कम रहती है। अभिभावक की उदासीनता की वजह से भी मध्याह्न भोजन में गड़बडि़यों को बल मिलता  है। 
           
तल्ख सच्चाई है कि प्राथमिक विद्यालयों में मध्याह्न भोजन अनियमित ही रहा है। शिक्षा समिति की वजह से राशन का उठाव समय पर नहीं होता है। प्रखंड से चावल उठाव के दौरान 50 किलो के बैग से 5-10 किलो अनाज कम आवंटित किए जा रहे हैं। शिक्षा समिति पुराने ढर्रे पर चल रही है। इनको नौनिहालों से अधिक चिंता अपने फायदे की है। मध्याह्न भोजन प्रभारी केवल रिपोर्ट बनाने में मशगूल रहते हैं। खाना खाने से लेकर बनाने तक की स्थितियां अत्यंत ही दयनीय हैं। बच्चे गंदगी के बीच खाते हैं। दुर्भाग्य से कोई सांप-छुछूंदर या छिपकली पड़ गयी तो पुनः मशरक वाली घटना जैसी पटकथा तैयार हो जायेगी। 
        
स्कूल की रसोईया सईदा बीबी को मध्यान्ह भ¨जन य¨जना के प्रावधान¨ं का क, ख, ग भी नहीं जानतीं। न उन्हें यह पता है कि भ¨जन बनाते वक्त सफाई के किन-किन पक्ष¨ं का ध्यान रखना है। शारीरिक सफाई से लेकर सफाई की आदतें सभी कुछ भ¨जन के लिए दिक्कततलब है। नाखून उनके बढ़े हुए हैं। डिश वाॅश व हैंड वाॅश का प्रावधान ह¨ेने के बावजूद वे मिट्टी से हाथ ध¨कर खाने की सामग्रियां ध¨ती हैं। उत्क्रमित मध्य विद्यालय, चांदकेवारी (दक्षिणी) में अनियमित मध्याह्न भोजन को लेकर ग्रामीणों एवं शिक्षकों में कई बार ताना-तानी की नौबत भी आयी। पर, सुधरने की बजाय रसोई घर के इर्दगिर्द गंदगी पसरी रही। फिलहाल बच्चों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। वहीं समिति के पदाधिकारी एवं सदस्यों को मध्याह्न भोजन से कुछ लेना-देना नहीं है। हरी सब्जियां बच्चों को नहीं मिल रही हैं। मेन्यु केवल दीवाल पर लिखा दिख रहा है। इस विद्यालय में कक्षा पहली से लेकर 8वीं तक कुल 630 बच्चे हैं जिसमें से 400 बच्चे प्रतिदिन स्कूल आते हैं। बीच के बच्चे विद्यालय नहीं आते पर उनके नाम से आनाज का उठाव होता है। प्रधान शिक्षक इंद्रजीत पासवान कन्नी काटते नजर आयें। उन्होंने कहा कि शिक्षा समिति किसी भी कार्य को पूरा नहीं करने देती। जब-जब बैठक होती है साफ-सफाई को लेकर बात उठती है। 
          
बिहार में विषाक्त मध्यान्ह भोजन से 23 छात्रों की मौत के आलोक में उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र और सभी राज्य सरकारों से इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने और बच्चों को बेहतर भोजन मुहैया कराने के के लिए जवाब तलब किया था। प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया था कि सभी राज्य सरकारें वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट पेश करें। जनहित याचिका में कहा गया है कि मध्यान्ह भोजन योजना के तहत बच्चों को मिल रहे भोजन की गुणवत्ता के आकलन और निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। याचिका के अनुसार 12 लाख से अधिक सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को दोपहर में रोजाना निःशुल्क पका हुआ भोजन मिलता है। लेकिन समुचित सुविधाओं व योजना की निगरानी व्यवस्था के अभाव के कारण बच्चों को घटिया और स्वास्थ्य के लिये खतरनाक भोजन मिलने का खतरा लगातार बना रहता है। छात्रों को कम से कम दो सौ दिन दोपहर के भोजन में रोजाना न्यूनतम 300 कैलोरी और 8 से 12 ग्राम प्रोटीन मुहैया कराना है। 
        
दरअसल अदालत के आदेश के बावजूद सरकार अमल नहीं कर रही है। स्वच्छता की कमी की वजह से बच्चे बीमार पड़ते हैं। इससे बचना मुश्किल नहीं है लेकिन इसके लिए हमेशा ही सुरक्षा और स्वच्छता पर ध्यान देने की जरूरत है। रसोइये और उसके सहायक की विशेष जिम्मेदारी होती है कि भोजन पकाने की प्रक्रिया से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से स्वच्छता और सुरक्षा के उपायों का पालन करना चाहिए। मध्यान्ह भोजन योजना के नियमित रूप से वित्तीय और सामाजिक आॅडिट करने का सरकार को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। हर महीने देश के किसी न किसी हिस्से में बच्चों की मृत्यु या उनके बीमार पड़ने की घटनायें हो रही हैं। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को मध्यान्ह भोजन मुहैया कराने की व्यवस्था में गड़बडयियों का पता लगाने के लिये नये उपायों पर यथाशीध्र ध्यान देने की जरूरत है। महज प्रशासनिक तरीके से निरीक्षण करके इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
     
वस्तुतः मध्याह्न भोजन में तब तक सुधार नहीं हो सकता, जब तक स्थानीय लोगों में योजना को लेकर जागृति नहीं आ जाती। गांव के अधिकांश बच्चों के अभिभावक किसान व मजदूर हैं। इनको स्कूल की चिंता से ज्यादा रोजी-रोटी की रहती है। बाकी संपन्न व सक्षम लोगों के बच्चे सरकारी स्कूल के बनिस्पत प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। इसलिए गांव-समाज के पढ़े-लिखों को स्कूल की चिंता कम रहती है। जरूरत इस बात की है कि हमारे देश के नौनिहालों का सर्वांगीण विकास हो। देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों के माता-पिता की भी जवाबदेही बनती है कि स्कूल में हमारे बच्चे क्या खा रहे हैं? क्या पढ़ रहे हैं? इसका ख्याल रखना बेहद आवश्यक है। जिस दिन स्कूली बच्चों के अभिभावको की नजर बदली, उसदिन से स्कूल से भ्रष्टाचाररूपी राक्षस का सर्वनाश हो जायेगा। 




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अमृतांज इंदीवर
(चरखा फीचर्स)

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