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शनिवार, 23 अगस्त 2014

विशेष आलेख : वैवाहिक जीवन की दरार: तलाक

भारतीय समाज का सबसे बड़ा कोढ़ तलाक है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सेाषल साइंस के अध्ययन के अनुसार आधुनिक जीवनषैली, करियर और बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के कारण तलाक जैसे मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है। वैवाहिक जीवन एक सुहाना व सलोना सफर है। इस सफर में किसी एक पक्ष की नासमझी की वजह से दरारें पड़ जाए, तो वैवाहिक जीवन नरक के यंत्रणाओं में बदल जाता है। वैवाहिक जीवन को स्वर्ग बनाने में पति-पत्नी में समझदारी, सहानुभूति, त्याग, मोहब्बत व व समन्वय होना नितांत आवष्यक होता है। 

मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली रानी ने अपने से ज्यादा उम्र के पति के साथ नहीं रहने का फैसला किया तो समाज व परिवार के लिए कलंक बन गयी। प्रतिदिन की तू-तू, मैं-मैं से तंग आकर रानी ने सारे गांववालों के सामने तलाक ले लिया। पंचायत बैठी लेकिन सभी पंचों ने रानी को ही दोशी करार दिया। कुछ ही दिनों बाद रानी ने पंचायत की अवहेलना कर अपने मायके में एक लड़के से षादी करने का निर्णय किया। इस घटना की भनक जब घर-परिवार वालों को लगी तो उन्होंने रानी को पकड़कर पंचायत बुला ली। पंचायत ने रानी को पहले पति के साथ रहने का फरमान सुनाकर उसे कलंकनी भी कहा। इस पर रानी ने मुखर होकर अपने पहले पति के साथ रहने से इंकार कर दिया। पंचायत के सामने रानी ने हिम्मत जुटाकर कहा कि मैं पिछले दस सालों से षादी के सुख से वंचित हंू क्योंकि मेरे पति अधेड़ उम्र के हैं। उनका षरीर भी ठीक से काम नहीं करता। भला जब, वह मेरी इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा ही नहीं कर सकते तो मैं उनके साथ रहकर अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं होने दूंगी। अब तक मैं मां के सुख से वंचित हंू। समाज और परिवार मुझे बांझ समझता है। मेरे सब्र का बांध टूट चुुका है और मैं अब चुप नहीं रह सकती। भले ही इसके लिए मेरी हत्या ही क्यांे न हो जाए। रानी के इस पर बयान पर पूरी पंचायत सन्न रह गयी और रानी की षादी मनचाहे लड़के के साथ हुई। पंचायत ने महसूस किया कि गरीबी एक लाइलाज बीमारी है। दहेज न देने में असमर्थ बात ने अपनी फूल जैसी बेटी की षादी एक अधेड़ उम्र के आदमी से कर रानी को नर्क में झोंक दिया था।  

परिणयसूत्र में बंधते समय वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर पूरे समाज के सामने सात फेरे लेते हैं। प्रतिज्ञा करते हैं कि सुख-दुःख में जीवन भर एक दूसरे का साथ देंगे। एक लम्हा ऐसा आता है कि जब फूलों की सेज कांटों की सेज बन जाती है। परिणामतः दहेज, पति के घरवालों द्वारा प्रताड़ना, मारपीट, नषाखोरी, यौन व अर्थ संबंधी समस्याएं तलाक जैसे कोढ़ को जन्म दे देती हैं। पुरुश प्रधान समाज स्त्रियों को केवल भोग-विलासिता की वस्तु समझता है। स्त्रियों का दुःख-दर्द सुनने के बजाये उस पर तरह तरह की पाबंदियां लगायी जाती हैं।  दांपत्य जीवन की मधुरता क्षणभर में खत्म हो जाती है। पत्नी समझती है कि मैं किसी के पैर की जूती नहीं कि धौंस सहूं जबकि पति समझता है कि मैं जोरु का गुलाम नहीं कि तुम्हारी सारी ख्वाहिषें पूरी करूं। 

बात और बिगड़ जाती है, जब पति-पत्नी किसी सरकारी या गैर-सरकारी दफ्तरों में कार्यरत हो, तो सहकर्मियों से स्वभाविक रूप से बातचीत, मेल-मिलाप होता है। इस दरम्यान किसी एक पक्ष के षक की सूई, पत्नी-पत्नी के संबंध विच्छेद कर सकती है। लेकिन चष्मदीद बात, तो यह है कि यदि कार्यालयों या स्कूलों में सहकर्मी से मित्रता हो जाए, तो इसका मतलब तो यह नहीं कि उस व्यक्ति से प्रेमसंबंध ही हो गया। कभी-कभार ऐसा दौर भी आता है जब पति या पत्नी किसी पराय पुरुश या स्त्री से काफी करीब हो जाते हैं और दिल दे बैठते हैं। ऐसी स्थिति आने पर सर्वप्रथम आत्म अवलोकन करना चाहिए कि ऐसा तो नहीं कि आप अपने पति-पत्नी को समय न दे पाते हों, आपके जीवन में प्रेम का प्रस्फुटन बंद हो गया हो, जीवनसाथी से अच्छा और कमनीय मिल गया हो, या षराब, ड्रग्स, धुम्रपान आदि की लत लग गयी है। ऐसे ढेर सारे सवाल हैं जो वैवाहिक जीवन को टूटन-घुटन के संत्रास में धकेलकर तलाक जैसी समस्या को पैदा कर रहे है। ऐसा मामला जब कोर्ट पहुंचता है, तो बात और बिगड़ जाती है। अक्सर पुरुश वर्ग अपनी दैनिक जरूरतों जैसे- भोजन, वस्त्रों की धुलाई, साफ-सफाई और बच्चों की देखभाल आदि के लिए किसी न किसी स्त्री पर ही निर्भर रहते हैं। बचपन से जवानी तक दायित्व मां या बहन के कंधें पर रहता है और षादी के बाद अर्धांगिनी पर। 

आजकल भारतीय स्त्रियां भी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़कर तलाक ले रही हैं। भारत में तलाकषुदा में से 6.6 प्रतिषत स्त्रियां स्वयं तलाक ले रही हैं और दूसरे मनचाहा पुरुशों से षादी रचा रही हैं। दूसरी ओर वर्तमान सामाजिक संरचना पुरुशों के लिए तलाक व पुर्नविवाह का मार्ग खुला रखी है। जख्म भरते हीं नया घर बसाना पुरुशों के लिए के लिए आसान होता है, जबकि स्त्रियों के लिए समाज का नजरिया बिल्कुल उलट है। जहां खुबसूरत, षिाक्षित-कुंवारी युवतियों के लिए वर ढूंढ़ने में मां-बाप को लड़केवालों के दरवाजे पर नाक रगड़नी पड़ती है, वहीं तलाकषुदा  स्त्रियों के लिए अच्छा व षिश्ट वर मिलना तो सपने की बात है। पुरुश समाज में तलाकषुदा  स्त्रियों को अपनाने में विधुर भी परहेज करते हैं। पुरूश प्रधान समाज को नारी जाति के प्रति अपने नज़रिए में बदलाव लाना होगा तभी महिलाओं के साथ अत्याचार, घरेलू हिंसा और तलाक पर लगाम लगाया जा सकेगा। 





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अमृतांज इंदीवर
(चरखा फीचर्स)

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