फूलन के हत्यारे को सजा, समर्थकों में है खुशी की लहर, कहा, जुर्म का डटकर किया मुकाबला - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

फूलन के हत्यारे को सजा, समर्थकों में है खुशी की लहर, कहा, जुर्म का डटकर किया मुकाबला

  • शेर सिंह राणा दोषी करार, बाकी 10 बरी
  • 25 जुलाई 2001 को उनकी हत्या उनके घर के गेट पर ही कर दी गई थी 
  • वर्ष 1996 व 1999 में भदोही सांसद रही 

pholan murder
बीहड़ की पूर्व दस्यु सुंदरी फूलन देवी की हत्या के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मुख्य आरोपी शेर सिंह राणा को दोषी करार दिया है, जबकि बाकी 10 आरोपियों को बरी कर दिया गया है। शेर सिंह राणा की सजा का ऐलान 12 अगस्त को होगा। 13 साल पहले जुर्म व ज्यादती के खिलाफ संघर्ष करने वाली भदोही की सांसद रही फूलन देवी की 25 जुलाई 2001 को हत्या उनके घर के गेट पर कर दी गई थी। 

इस हत्याकांड में शेर सिंह राणा समेत 12 आरोपी थे, जिसमें से एक की मौत हो गई है। अदालत ने राणा को 307 और 302 धाराओं में दोषी करार दिया, जबकि फर्जीवाड़े, ऑर्म्स ऐक्ट और 120 बी (साजिश) के आरोपों से बरी कर दिया। वर्ष 1996 व में पहली बार भदोही के मतदाताओं ने महिला सांसद फूलन को जीताया था। उन्हें दो बार प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला, तो दो बार हार का भी स्वाद चखना पड़ा। 10 अगस्त 1963 को जालौन के बेहमई में मल्लाह परिवार में जन्मी फूलन 12 साल के उम्र में ही किडनैप व सामूहिक बलात्कार की शिकार होने के बाद बीहड़ की दस्यु सुंदरी बन गयी। इस दौरान तमाम झंझावतों के बीच बदला लेने की गरज से उन्होंने अपनी प्रताड़ना में शामिल 22 क्षत्रियों की सामूहिक हत्या कर देश ही नहीं विश्वभर में मसहूर हो गयी। यूपी और मध्य प्रदेश सरकार ने लंबे समय तक फूलन को पकड़ने में नाकाम रहीं तो साल 1983 में इंदिरा गांधी सरकार ने उनके सामने आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव रखा। फांसी की सजा न दिए जाने की शर्त पर फूलन ने आत्मसमर्पण कर दिया था। 

11 सालों तक जेल में रहने के बाद वह सियासत में अपना कदम रखी। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में सपा के टिकट पर मिर्जापुर-भदोही संसदीय सीट पर चुनाव लड़ी। उनका मुकाबला वर्ष 1991 में जीते भाजपा सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त से हुआ। फूलन के यहां से चुनाव लड़ने से यह क्षेत्र सुर्खियों में आ गया। देशभर के मीडिया व राजनीतिक गलियारों में प्रतिष्ठा का सीट बन गया था। काफी घमासान के बाद अंततः फूलन देवी मस्त को हराकर संसद पहुंच गई। दो साल बाद फिर 1998 में हुए चुनाव में मस्त जीत गए, फूलन हार गयी। लेकिन सालभर बाद 1999 के चुनाव में पुनः बाजी फूलन के हाथ लगी। हार-जीत का अंतर काफी कम था। प्रत्याशी एक-दुसरे पर भारी पड़ रहे थे। 

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