आलेख : जब कारपेट इंडस्टी में भूचाल ला दी थी कैलाश सत्यार्थी ने - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

आलेख : जब कारपेट इंडस्टी में भूचाल ला दी थी कैलाश सत्यार्थी ने

  • बंधुआ बच्चों को मुक्त कराने के दौरान कालीन उद्यमियों के हाथों पिट गए थे कैलाश सत्यार्थी 
  • पीटने के बाद से शुरु हुआ था बड़ा आंदोलन, जिसकी चीख गूंजी अमेरिका सहित पूरे यूरोप में 
  • नन्हें-नन्हें हाथों के खूनी पंजों से बनी है कालीने जैसे खूब प्रचलित रहे विदेशों में नारे, परिणाम यह हुआ कि होने लगा था भदोही के कालीनों का बहिष्कार, 50 फीसदी घटा इक्सपोर्ट, कराह उठे थे कालीन कारोबारी 
  • पूर्वांचल के कालीन, ईट-भट्ठा सहित विभिन्न कल-कारखानों, होटलों-ढाबो से 12 हजार से अधिक बधुआ बच्चों का कराया मुक्त 

kailash satyarthi
बात 1992 की है जब बचपन आंदोलन के कर्ताधर्ता कैलाश सत्यार्थी कालीन बेल्ट भदोही-मिर्जापुर में बंधुआ बच्चों को मुक्त कराने के लिए ताबड़तोड़ छापामारी की। उनके इस छापामारी से पूरे कालीन बेल्ट सहित पूर्वांचल के कल-कारखानों, भट्ठा संचालकों, होटल-ढाबों सहित कालीन कंपनियों के संचालकों में भुचाल सा आ गया। उनके इस अभियान से खिसियाएं लोगों ने उनकी पिटाई कर दी। लेकिन वह हिम्मत नहीं हारे और अपने सहयोगी डा लेनिन के साथ मिलकर अभियान जारी रखा। उनका यह अभियान समाचार पत्रों की सुर्खिया बन गई थी। उनके साथ घटित घटनाओं में सर्वाधिक चर्चित अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ के सभागार में कालीन निर्यातकों के हाथों पीटने की रही, जो आज भी कालीन उद्यमियों की जुबान पर है। हालांकि इस घटना के बाद से बचपन बचाओं का आंदोलन इतना तेज हुआ, जिसकी चीख अमेरिका सहित पूरे यूरोप में गूंजने लगा। नन्हें-नन्हें हाथों के खूनी पंजों से बनी है कालीने जैसे नारे खरीददार देशों में खूब प्रचलित रहे। इस नारे का ही प्रभाव रहा कि भदोही के कालीनों का अमेरिका सहित पूरे यूरोप में बहिष्कार किया जाने लगा। 

बहिष्कार के चलते 50 फीसदी से अधिक कारपेट इक्सपोर्ट घट गया। घटते इक्सपोर्ट व गिरती साख से कालीन कालीन कारोबारियों की नींद काफूर हो गयी। उनके खिलाफ कई तरह की साजिसे रची जाने लगी, लेकिन वह हार नहीं मानें और रग मार्क की नींव रखी और कुछ विदेशी कालीन कारोबारी साथ आएं तो रग की मार्क की शुरुवात हुई। बिक्री और निर्यात के लिए तैयार कालीन पर रग मार्क के लेबल का मतलब था कि इसके निर्माण में बाल मजदूरों की हिस्सेदारी नहीं है। बाद में कई राष्टीय व अंतराष्टीय संगठनों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए और रग मार्क की जगह 1994 में गुडवीव इंटरनेशनल का गठन हुआ। बिना गुडवीव चिन्ह लगी कालीनों को दुनियाभर के कालीन खरीददारों ने लेने से इंकार कर दिया। इन सबके अभियान से काफी हद तक कालीन बेल्ट से चाइल्ड लेबर खत्म तो हुआ, लेकिन अभी आशिंक रुप से छापेमारी के दौरान बाल बधुंआ मजदूर कालीन बेल्ट में मिल ही जाते है। इसके लिए और जागरुकता अभियान चलाएं जाने की जरुरत है। सत्यार्थी के सहयोगी रहे डा लेनिन का दावा है कि उस दौरान छापेमारी के दौरान कालीन बेल्ट सहित पूरे पूर्वांचल के कल-कारखानों व होटल-ढाबों आदि से तकरीबन 8 हजार से अधिक बधुआ बच्चों को मुक्त कराया गया। 

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श्री लेनिन के मुताबिक उस दशक में कारपेट इंडस्टी में बड़े पैमाने पर बाल बधुआ मजदूरी कराई जा रही थी। इसकी सूचना जब कैलाश सत्यार्थी को मिली तो वह मेरे साथ भदोही पहुंचे। उन्हें सूचना मिली कि ज्ञानपुर के एक कालीन कारखाने में काफी संख्या में बच्चों से बुनाई का काम लिया जा रहा है। उन्हें बंधुआ बनाकर रखा जाता है। वाजिक मजदूरी नहीं दी जाती। एक बुनकर के ही सूचना पर वे कालीन कारखाने में पहुंच गए। वहां कारखाना मालिक से बच्चों से काम न लेने की बात कहीं। बताया कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेना अपराध हैं। कारखाना मालिक सत्यार्थी नसीहत सुनने के बजाए बरस पड़ा। हाथापाई तक कर लिया। बाद में कैलाश सत्यार्थी आल इंडिया कारपेट मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएसन पहुंचे। वहां आयोजित मीटिंग में कालीन उद्यमियों से बाल मजदूरी न कराने की बात कहीं, तो उन्हें धक्का मारकर बाहर कर दिया गया। फिर भी वह हार नहीं माने और बचपन आदोलन के बच्चों को इंडस्टी से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा। इस दौरान वह अपने सहयोगियों तो कहीं प्रशासन की मदद से बच्चों को कालीन कारखाने से मुक्त कराते रहे। पांच साल की अवधि में उन्होंने अपने सहयोगी लेनिन रघुवंशी की मदद से हजारों बच्चों को कालीन कारखानों से मुक्त कराया। उस दौरान कई समाचार पत्रों की छापामारी सुर्खिया बनी रही। ताबड़तोड छापामारी से कालीन निर्यातकों में हड़कंप मच गया। 

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निर्यातक जहां कही भी सत्यार्थी का नाम सुनते उन्हें मारने के लिए दौड़ा लेते थे। निर्यातकों के फटकार के बाद भी वह अपने आंदोलन में जुटे रहे। बात खरीददार देश अमेरिका तक पहुंच गयी। वहां के मीडिया एवं पत्रिकाओं की बाल बधुंआ मजदूरी सुर्खिया बन गयी। हालात यहां तक पहुंच गए खरीदारों ने कालीन से मना कर दिया। निर्यात दर में लगातार गिरावट के बाद निर्यातकों में हाहाकार मच गया। सरकार के तमाम प्रयास के बाद भी कुछ न हो सका। बाद में सरकार के सुझाव पर ही कैलश सत्यार्थी ने रगमार्ग की स्थापना कराई। शर्त रखा गया कि अब वही कालीन इक्सपोर्ट होगा जिस पर रगमार्ग का लेबल लगा रहेगा। इस लेबल का मतलब होता है कि उक्त कालीन बच्चों के हाथ से नहीं बनी है। इसी दौरान फिर से कालीन जगत में बाल बंधुआ मजदूरी की उठती शिकायतों पर उन्होंने 1993 में जगदीशपुर में स्थित एक कालीन कारखाने में तत्कालीन तहसीलदार के साथ छापेमारी कर गढ़वा बिहार व सोनभद्र के 62 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया। 1996 में ऊंज स्थित एक कारखाने पर छापेमारी कर बिहार के 25 व 1997 में पूरे विश्वनाथ गांव स्थित कारखाने से सात बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के बाद फिर से कालीन कारोबारियों में हड़कंप मच गया। छापामरी का नेतृत्व उन्होने खुद किया। 

डा लेनिन ने बताया कि 1997 में तो बचपन बचाओ आंदोलन की ओर से चलाए गए अभियान से कालीन बेल्ट में हाहाकार मच गया था। बाल शिक्षा अधिकार को लेकर निकाली गई शिक्षा यात्रा का भी उन्होने नेतृत्व किया। आंदोलन में उनके हमसफर बने सुंदरपुर के क्रांतिभूषण, हरिलाल पाल व उत्तम कुमार व अरविन्द कुमार आदि ने  आंदोलन को परवान चढ़ाया। डा लेनिन ने कहा कि हमें वंचित बच्चों की आजादी और अच्छी शिक्षा के लिए लगातार प्रयास करने होंगे। यह विडंबना है कि दुनियाभर में बच्चों के खिलौनों से ज्यादा गोलियां बनती हैं। विश्व शांति के बगैर दुनिया से किसी भी समस्या को खत्म नहीं किया जा सकता। बच्चों को अपना बचपन जीने और करियर संवारने का पूरा हक है चाहे वो दुनिया के किसी भी हिस्से में हों। बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी के बुराड़ी स्थित मुक्ति आश्रम में बंधुआ बाल मजदूरों को उनके बचपन से जोड़ा जाता है। इस आश्रम में बंधुआ मजदूरी से छुड़ाए गए बच्चों को थोड़े समय के लिए रखा जाता है। 

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आश्रम से जुड़ी हुईं अर्चना चतुर्वेदी ने बताया कि इस आश्रम की स्थापना 1990 में हुई थी। शुरू में यहां बंधुआ बाल मजदूरों के पुनर्वास के लिए कार्यक्रम चलाए जाते थे। लेकिन 2007 से यहां अल्प अवधि के पुनर्वास कार्यक्रम चलाए जाते हैं। फिलहाल इस समय आश्रम में 15 बच्चे हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों को उनका खोया बचपन लौटाने की कोशिश की जाती है। बच्चों को आश्रम में शिक्षा का महत्व बताया जाता है। उन्हें इस बात का अहसास कराया जाता है कि बगैर शिक्षित हुए गरीबी से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। डा लेनिन ने कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार हासिल किए जाने बधाई देते हुए कहा जो कालीन निर्यातक उनका विरोध करते थे उन्हें भी मिलकर बधाई देनी चाहिए कि क्योंकि रगमार्क व गुडवीव की स्थापना कर उन्होने इक्सपोर्ट बढ़ाने का ही काम किया है। स्वामी अरविन्द सिंह ने बताया कि कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में वर्ष 1998 में सायकिल ग्लोबल मार्च यात्रा निकाला गया, जो कालीन बेल्ट भदोही-मिर्जापुर, चूड़ी उद्योग आगरा, फिरोजाबाद सहित पूरे यूपी में भ्रमण किया और दिल्ली में समापन किया गया। उस दौरान तत्कालीन सांसद भदोही वीरेन्द्र सिंह व वाराणसी सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल ने कैलाश सत्यार्थी का यह कहकर विरोध किया कि यह लोग उद्योग चैपट करना चाहते है जबकि हमलोग बचपन बचाने की बात कर रहे थे। 

कल थे बंधुआ मजदूर आज संगठन के सहयोगी 
रोहित कभी बंधुआ मजदूर था। लेकिन आज ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के सहयोग व डा लेनिन के साथ जुड़कर वह बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए बच्चों को शिक्षा दे रहा है। उसने ठान लिया है कि वह बंधुआ मजदूरी के खिलाफ काम करेगा और नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी से जुड़कर बचपन बचाएगा। वह बताता है कि 1992 में अपने गांव से कमाने के लिए आए थे। लेकिन उन्हें बंधुआ मजदूर बना लिया गया और कालीन बुनाई में काम करने के लिए झोंक दिया गया। बहुत ही कम मेहनताना पर 12 से 14 घंटे तक काम कराया जाता था। गांव जाने की इजाजत नहीं थी। कैलाश सत्यार्थी के संगठन ने जिला प्रशासन के सहयोग से कारखाना में छापा मारकर उन्हें सहित 80 बच्चों को छुड़ाया। इसी दिन उनकी जिंदगी ने करवट बदली। इसके बाद उन्होंने इंटरमीडिएट की शिक्षा हासिल कर नर्सरी टीचर्स ट्रेनिंग का कोर्स किया। 







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(सुरेश गांधी)

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